दूध में पानी मिलाते हैं,
और फिर
दूध का दूध
पानी का पानी
चाहते हैं!
□
उत्कोच में डूबी व्यवस्था
निकम्मों कों
कर्मठता का पर्याय
बता रही है,
जनता
अपने फ़ैसले पर
पछता रही है!
□
बड़ी उम्मीदों के साथ
जनता ने अपना
जनप्रतिनिधि चुना,
जनप्रतिनिधि
मालपुआ खाकर
उड़ता बना!
□
जो कभी क्लासरूम नहीं गये
बच्चों का हक़ खा गये,
शिक्षक दिवस के अवसर पर
वे भी पुरस्कार पा गये!
□
वह ताउम्र बॉस को
रिश्वत देता रहा,
बॉस उसे
सहूलियत
देता रहा!
□
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

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