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Sunday, 3 September 2023

झंझावातों के मध्य खिला हूँ : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

जीवन की व्यथा-कथा लिखता हूँ
नवगीत कहो 
या गीत।

हारे मन को सम्बल देता हूँ
निर्बल को भुजबल देता हूँ 
पीड़ा के स्वर में घुला-मिला 
उद्घोष कहो 
या जीत।

मिली प्रीति तो प्रीति बुना मैंने
संसृति का झंकार गुना मैंने 
झंझावातों के मध्य खिला 
उल्लास कहो
या प्रीत।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
मोबाइल- 9839942005
veershailesh@gmail.com

Wednesday, 22 March 2023

चलें कौन-सा दाँव : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

नहीं रही क्यों 
कहाँ गयी अब
गुलमोहर की छाँव,
इसी प्रश्न पर 
मौन साध कर 
बैठा सारा गाँव।

गांधारी हो गयी अस्मिता 
धृतराष्ट्र न्याय के पैमाने
नतमस्तक हो कर सत्य-शील 
बैठे दुर्योधन पैताने,
अंगराज-सा
भाग्य विवश है
कटे हुए हैं पाँव।

इधर चेतना के सर पर
कुछ काले बादल मँडराये
उधर बवंडर हुआ माफ़िया
कट्टा-बन्दूकें लहराये,
भयाक्रांत 
रोटी के सपने
चलें कौन-सा दाँव।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
वार्तासूत्र- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Wednesday, 23 March 2022

बाथिंग टब में मौज : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

बूँद-बूँद की क़ीमत जानो
भाषण में
कल बोल रहे थे
नेता रामधनी।

जिनके घर के कुत्ते करते
बाथिंग टब में मौज
पूल नहाने जाते लेकर 
नौकर-चाकर फ़ौज,
पानी पेरिस से मँगवाते
कोरा ज्ञान 
बाँटते हर क्षण 
सपना हनी-मनी।

दोनो मीटिंग पानी मिलना
जिस बस्ती में ख़्वाब 
आलीशान खड़ा है बँगला
पाट दिया तालाब,
ऊपर तक है पहुँच मुकम्मल
न्यूज़ बताती
उनके दम से
फिर सरकार बनी।

जिनके कारण प्यासे तड़पें
आती तनिक न शर्म 
पानी-पानी ख़ुद पानी है
ऐसे जिनके कर्म, 
शोषित पूछ रहे प्रश्न मगर
वे क्या देंगे उत्तर 
जिनकी
आँखें ख़ून सनी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
veershailesh@gmail.com

Monday, 18 May 2020

पाई-पाई जोड़ रहे थे

अच्छा है अब चुप रहना।

तुम मगन रहो अपनी दुनिया में
हम मगन रहें अपनी दुनिया में
अपनी-अपनी
दुनिया सबकी
चलते-चलते क्या कहना।

तुम उलझे हरदम गुणा-भाग में
हम रचे-बसे थे सत्य-राग में
अपना-अपना
दृष्टिकोण है
सबको इक दिन है ढहना।

तुम पाई-पाई जोड़ रहे थे
क्षण-क्षण सम्बन्ध मरोड़ रहे थे
जोड़-घटाना
दुनियादारी
संग समय के सब बहना।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com


Sunday, 5 April 2020

चलो सजनी दीप बालो : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चलो सजनी
दीप बालो।।

आसुरी शक्तियों ने
फिर से रचा है
षड़यंत्र भीषण,
घुला विष हवाओं में
है हर क्षण यहाँ
इति का निमंत्रण।

बाती बनाओ
घृत-तेल डालो,
चलो सजनी
दीप बालो।।

हम करेंगे संहार
अपने शत्रु का
लेंगे जीत रण,
अपेक्षित संग सबका
सम्भव है यहाँ
श्वासों का वरण।

उर में अलौकिक
संकल्प पालो,
चलो सजनी
दीप बालो।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

Friday, 27 March 2020

जाने कैसा संकट छाया : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

क़ैद गेह में
दुनिया सारी,
जाने कैसा
संकट छाया।
कहो!
चुपचाप
कटेंगे दिन कैसे
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

अनजाना भय
खा डालेगा,
घोर निराशा
में मत डूबो।
सुनो!
हँसो अलि
फिर से रस घोलो।
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

Thursday, 19 December 2019

आत्मतत्व का चिन्तन कहता - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

आओ हर लूँ पीर तुम्हारी
बैठो मेरे पास।

जूही चम्पा गुलबहार तुम
लैला जुलियट हीर,
तुम ही चंदा तुम वसुंधरा
देती मन को धीर,
तुम जीवन की आशा सजनी
तुम निर्मल विश्वास।

मैं गाता हूँ तुम होकर जब
तुम हो जाती वीर,
मन पावन हो जाता ऐसे
ज्यों गंगा का नीर,
मत उदास तुम रहो सहेली
तुम मेरी हर आस।

आत्मतत्व का चिन्तन कहता
मिट्टी सकल शरीर,
नेह प्रीति की गढ़े कहानी
चुप रहती शमशीर,
पार लगायें राधाकिशना
सब उनके ही दास।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com