Thursday, 14 May 2026

'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : अनकहे प्रश्नों को शब्द देता दोहा-संग्रह/समीक्षक- गरिमा सक्सेना


डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' दोहा छन्द के लिए प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने वाले रचनाकार और सम्पादक हैं। 'नयी सदी के दोहे', 'समकालीन दोहा', 'प्रतिरोध के दोहे' तथा 'सोनचिरैया मौन है' जैसे साझा संकलनों के सम्पादन के साथ उन्होंने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का भी सम्पादन किया है। दोहा लेखन और सम्पादन के साथ दोहा-संग्रहों की समीक्षा और आलोचना की तरफ़ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन सभी चीज़ों में जो बातें महत्त्वपूर्ण है, वह है दोहा छन्द के विकास के लिए कार्य और साहित्य एवं समाज के प्रति अपने कर्त्वयों का निर्वहन। अब प्रश्न उठता है कि वे साहित्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कैसे कर रहे हैं? तो इसका उत्तर है- 'समाज की धमनियों में दौड़ते रक्त के तापमान, उसकी टूटन, उसकी विसंगतियों और उसके भीतर पल रहे अनकहे प्रश्नों को शब्द देकर'। जब सत्ता और समाज के गलियारों में एक सोची-समझी चुप्पी ओढ़ ली जाती है, जब प्रश्नों को पूछना देशद्रोह और सच को देखना अपराध मान लिया जाता है, तब कविता प्रतिरोध का सबसे मुखर और स्थायी स्वर बनकर उभरती है। दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' इसी ध्येय को साधकर लिखे गये दोहों का संग्रह है। यह संग्रह अपने समय का एक ज्वलंत दस्तावेज़ है, एक ऐसी चार्जशीट है जो व्यवस्था के हर उस स्तम्भ पर बड़ी बेबाकी से चस्पाँ की गयी है, जो लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में एक धधकता हुआ प्रश्न है—'कब टूटेंगी चुप्पियाँ?' यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस आम आदमी का है जो व्यवस्था के शोर में अपनी आवाज़ खो चुका है। यह उस किसान की पीड़ा का प्रश्न है जिसकी चीख़ें फाइलों में दब जाती हैं, उस युवा का आक्रोश है जिसकी डिग्रियाँ बेकारी की दीमक चाट रही है, उस स्त्री का मौन है जो सम्मान और सुरक्षा के बीच हर रोज़ एक लक्ष्मण रेखा पर चलती है, और उस बुद्धिजीवी का अंतर्द्वंद्व है जो सच बोलने की क़ीमत और चुप रहने के अपराध के बीच पिस रहा है। दोहाकार शैलेष गुप्त 'वीर' इस एक प्रश्न के माध्यम से समूचे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरते हैं। वे उत्तर नहीं देते, बल्कि पाठक को उत्तर खोजने की प्रक्रिया में शामिल कर लेते हैं। वे व्यंग्य की चुटीली ज़ुबान से झकझोरते हैं और कड़वे प्रश्नों से निदान के लिए प्रेरित करते हैं। 

यह संग्रह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि यह जीवन और समाज के लगभग हर उस पहलू को स्पर्श करता है, जहाँ चुप्पी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। शैलेष जी के दोहे एक विशाल कैनवास पर बिखरे हुए हैं, लेकिन जब उन्हें एक साथ पढ़ा जाता है, तो हमारे समय की एक भयावह और यथार्थपरक तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर का सबसे प्रबल और मुखर स्वर राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना का है। शैलेष जी ने समकालीन भारतीय राजनीति के हर पाखंड, हर प्रपंच और हर गिरावट पर निर्मम प्रहार किया है। उनकी दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। चुनावों का पाखंड, नेताओं का दलबदल, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, और लोकतंत्र के नाम पर 'भीड़तंत्र' का बढ़ता प्रभाव; सब कुछ उन्होंने अपने इन दोहों में समेट लिया है। चुनाव, जो लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, शैलेष जी की नज़रों में महज़ एक प्रपंच और छलावा बनकर रह गया है। नेता शेर, बाज़, गिद्ध के रूप में शिकारी हैं और भोली-भाली जनता भेड़, बकरी, हिरनी, चिड़िया के रूप में उनका शिकार। यह प्रतीक योजना पूरे संग्रह में बार-बार लौटकर आती है और राजनीतिक शोषण के तंत्र को उजागर करती है-
"आहट हुई चुनाव की, बिछने लगी बिसात।
भेड़ों के घर शेर अब, लगा बिताने रात।"

"करतब ग़ज़ब चुनाव के, अजब वक़्त का फेर।
बकरी के घर बैठ कर, भोजन करता शेर।।"

चुनाव के समय नेताओं द्वारा दलितों और वंचितों के घर भोजन करने का जो नाटक खेला जाता है, उस पर इससे सटीक और तीखा व्यंग्य क्या हो सकता है? वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि कैसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग 'भीड़तंत्र की रेस' जीतकर व्यवस्था पर क़ाबिज़ हो रहे हैं-
"हत्या डाका रेप के, जिन पर ढेरों केस।
वही जीतते अब यहाँ, भीड़तंत्र की रेस।।"

राजनीति में नैतिकता और सिद्धान्तों के पतन पर वे गहरी चिन्ता व्यक्त करते हैं। दलबदल और अवसरवादिता आज की राजनीति का पर्याय बन चुकी है। एक टिकट कटते ही कैसे निष्ठा और नीतियाँ बदल जाती हैं, इसका चित्रण देखिए-
"अपने दल ने तोड़ दी, टिकट काटकर आस।
झट विपक्ष की नीतियाँ, उनको आयीं रास।।"

"टिकट कटा यह जानकर, हाल हुए बेहाल।
झण्डा बैनर टोपियाँ, बदल गये तत्काल।।"

शैलेष जी की क़लम उस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर भी चोट करती है जहाँ सत्ताधारी दल हर आवाज़ को ख़ामोश कर देना चाहता है और मीडिया भी उसके सामने नतमस्तक है। यह चुप्पी ही उनके संग्रह का केन्द्रीय बिन्दु है-
"डरे हुए हैं लोग क्यों, क्यों छाया है मौन?
डरा हुआ है मीडिया, प्रश्न करेगा कौन?"

वे सत्ता को 'गान्धारी' और तंत्र को 'अन्धा' कहते हैं, जो एक शक्तिशाली पौराणिक रूपक के माध्यम से वर्तमान की भयावहता को उजागर करता है। 

राजनीति से इतर शैलेष जी की दृष्टि सामाजिक विसंगतियों पर भी उतनी ही पैनी है। वे देखते हैं कि कैसे आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में हमारे नैतिक मूल्य बौने हो गये हैं और मानवीय सम्बन्ध यांत्रिक हो चले हैं-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारिकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"

इस पतन का सबसे त्रासद प्रभाव पारिवारिक सम्बन्धों पर, विशेषकर वृद्धों की स्थिति पर पड़ा है। संग्रह में अनेक दोहे वृद्ध माता-पिता की पीड़ा, उनकी उपेक्षा और उनके अकेलेपन को मार्मिक अभिव्यक्ति देते हैं। नयी पीढ़ी, जो अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की दौड़ में अंधी हो चुकी है, उन्हें 'पैरों की ज़ंजीर' समझती है। शहरों के छोटे होते फ्लैटों में बूढ़ी माँ के लिए जगह नहीं है, भले ही 'डॉगी या फिर कैट' के लिए हो। यह पीड़ा जब असहनीय हो जाती है तो दो बेटों का बाप स्वयं वृद्धाश्रम की राह पकड़ लेता है। ये दोहे केवल दोहे नहीं, हमारे समाज के हृदय पर लगे गहरे घाव हैं-
"तन उनका लन्दन हुआ, मन पेरिस की शाम।
इधर पड़ी माँ खाट पर, उधर छलकते जाम।।"

शैलेष जी आधुनिक जीवनशैली, पश्चिमीकरण और उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों पर भी प्रहार करते हैं। 'लिव-इन' सम्बन्ध, 'बर्गर-पिज़्ज़ा' वाली खाद्य संस्कृति और 'हिप्पीकट' तथा 'बाली पहने मर्द' वाली फैशन-परस्ती उन्हें चिन्तित करती है। वे इसे 'नयी सभ्यता' कहते हैं, जो हमें 'मटियामेट' कर रही है। यह कोई प्रगतिविरोधी सोच नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने की पीड़ा है।

यदि इस संग्रह की आत्मा को किसी एक चरित्र में खोजना हो, तो वह 'हलधर' या 'किसान' है। 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' में किसान की त्रासदी एक ज़रूरी आवाज़ बनकर बार-बार लौटती है। शैलेष जी ने भारतीय किसान के जीवन के हर दुखते पहलू को छुआ है। वे कर्ज़ का बोझ, साहूकार का शोषण, मौसम की मार, सरकारी उदासीनता और अन्ततः आत्महत्या की विवशता; सब को शब्द प्रदान करते हैं-
"पूछा हमने जब कभी, क्यों हलधर लाचार।
चुप्पी ओढ़े मीडिया, मौन मिली सरकार।।"

"फन्दे पर हलधर मिला, उड़े न्याय के होश।
बादल पाला बिजलियाँ, हुए सभी ख़ामोश।।"

नारी विमर्श शैलेष जी की कविता का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। वे स्त्री के प्रति समाज के दोहरे मापदंडों और पाखंड पर कठोर प्रहार करते हैं। एक ओर पोस्टरों पर 'नारी बड़ी महान' लिखा जाता है, तो दूसरी ओर 'बाग़ में बेटियाँ, मिलतीं लहूलुहान'। एक ओर नेता भाषणों में 'नारी हित की बात' करता है, तो दूसरी ओर 'नशे में पीटता, पत्नी को हर रात'। यह पाखंड शैलेष जी को सालता है। वे स्त्री के शोषण के विभिन्न रूपों, यथा- घरेलू हिंसा, दहेज़, वासनापूर्ण दृष्टि आदि को उजागर करते हैं-
"जिनके मन में वासना, वे क्या जानें नेह।
मलिन नयन हैं खोजते, हर नारी में देह।।"

लेकिन शैलेष जी केवल स्त्री की पीड़ा का गायन नहीं करते। वे उसकी शक्ति, उसके सामर्थ्य और उसके बदलते स्वरूप को भी रेखांकित करते हैं। आज की नारी अबला नहीं है। वह पढ़-लिखकर रूढ़ियों को तोड़ रही है। जब व्यापार में डूबे पिता अवसादग्रस्त हो जाते हैं, तो बेटी 'तारणहार' बनकर सामने आती है। वह अब सीता की तरह चुपचाप अपमान नहीं सहती, क्योंकि जब राम, राम नहीं रहे तो सीता क्यों सीता रहे-
"मार-पीट सहती नहीं, लगी कमाने दाम।
सीता क्यों सीता रहे, राम नहीं जब राम।।"

यह स्त्री चेतना का नया और सशक्त स्वर है। शैलेष जी नारी को जीवन का आधार मानते हैं, वह 'दया-धर्म की खान' है, 'शुभ की मित्र है, और शोक की शत्रु'। वे उसके समग्र रूप को चित्रित करते हैं। एक माँ, एक बेटी, एक पत्नी और एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में नारी उनके दोहों में स्थान पाती है।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है शैलेष जी ने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का सम्पादन किया है। यह कार्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति बढ़ता संकट वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चिन्ता का एक प्रमुख विषय है। ऐसे में वे औरों को प्रेरित करने के साथ स्वयं भी इस विषय पर दोहे लिखकर लोगों को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि 'विकास' के नाम पर कैसे विनाश को आमंत्रित किया जा रहा है। जंगल, झीलें, तालाब और पहाड़; सब बिक रहे हैं। तालाबों को पाटकर मॉल बनाये जा रहे हैं और शहर इसका कोई जवाब नहीं देता। वह बस ज़हरीले परिवेश में रहने के लिए हमें बाध्य करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

शैलेष जी की कविता में प्रकृति एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव इकाई है, जिसकी अपनी भावनाएँ हैं। वे चेतावनी देते हैं कि प्रकृति से यह छेड़छाड़ अन्ततः सभ्यता के विनाश का कारण बनेगी-
"क़ुदरत को मत छेड़िए, ठीक नहीं यह रोग।
डूब मरेगी सभ्यता, नहीं बचेंगे लोग।।"

उनके पर्यावरण-सम्बन्धी दोहे आज के युग के लिए एक गम्भीर चेतावनी हैं, एक अपील हैं कि हम समय रहते चेत जायें, अन्यथा भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। 

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की काव्य-कला की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सादगी और संप्रेषणीयता है। उनकी भाषा आम आदमी की भाषा है। वे पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि अपनी बात को सीधे और स्पष्ट रूप से कहते हैं। वे 'मॉल', 'शिफ्ट', 'चैट', 'ईमेल', 'फ़िल्टर फ़ोटो', 'लाइव डिबेट' जैसे आज के शब्दों को दोहे के पारम्परिक अनुशासन में इतनी सहजता से पिरोते हैं कि छन्द की गरिमा भी बनी रहती है और दोहे अपने समय से कटते भी नहीं। यह उनकी काव्य-कला का प्रमाण है। उदाहरण के लिए इस दोहे को देखें-
"आते हैं जब सामने, करें न कोई बात।
मोबाइल से भेजते, सन्देशे दिन-रात।।" 

यह दोहा आज के डिजिटल युग में मानवीय सम्बन्धों के खोखलेपन को जितनी सरलता और गहराई से व्यक्त करता है, वह अत्यन्त प्रभावी है। 
उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है सटीक और धारदार बिम्बों का प्रयोग। वे अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए शक्तिशाली प्रतीक चुनते हैं, जो तुरन्त पाठक के मन में एक स्पष्ट चित्र उकेर देते हैं। राजनीति के जंगल में 'शेर', 'भेड़िये', 'गिद्ध', 'बाज' और 'मगरमच्छ' जैसे हिंसक जीव शोषक वर्ग के प्रतीक हैं, तो 'भेड़', 'बकरी', 'हिरनी', 'चिड़िया' और 'मीन' जैसी निरीह प्रजातियाँ शोषित और आम जनता की प्रतीक हैं। यह प्रतीकात्मकता उनके दोहों को एक सार्वभौमिक और कालातीत अपील प्रदान करती है।

अन्त में इस समीक्षा का सार प्रस्तुत करते हुए मैं इतना ही
कहूँगी कि शैलेष जी के दोहे हमें बेचैन करते हैं, हमें क्रोधित करते हैं, हमें दुखी करते हैं, लेकिन वे हमें निराश नहीं करते। हर दोहे के अन्त में एक अनकहा विश्वास छिपा है कि यह चुप्पी टूटेगी। यह संग्रह स्वयं उस चुप्पी को तोड़ने की दिशा में एक साहसिक और शक्तिशाली क़दम है। यह एक सवाल नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। मैं पूरे विश्वास के साथ इस महत्त्वपूर्ण कृति का स्वागत करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि यह हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनायेगी।
--------------------------------
कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
--------------------------------


■ समीक्षक सम्पर्क-
गरिमा सक्सेना
(संपादक-दोहे के सौ रंग)
ई-109 श्री बालाजी सरीन अपार्टमेंट, अनन्तपुरा रोड, यलहंका, बेंगलुरु (कर्नाटक)
पिन कोड- 560064
मोबाइल- 7694928448

Tuesday, 21 April 2026

दोहों में ढला युगबोध: 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' का समीक्षात्मक पाठ/समीक्षक- डॉ. नीलू अग्रवाल

इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है। 

यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम। 
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।" 

एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।" 

अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान। 
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"

गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"

शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है- 
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल। 
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"

दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
 
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"

पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग। 
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"

दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।" 

किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"

कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर। 
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"

या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान। 
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।

ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"

एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात। 
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।

अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
---------------------------------------------------
कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
---------------------------------------------------

■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094

Wednesday, 25 February 2026

मेरी प्यारी बिटिया रानी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

दीवारों पर चित्र बनाये,
मुझको अपना मित्र बताये।
बातें करती बनकर नानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

तुतली बोली मन को भाती,
गोदी में आ प्यार जताती।
फ्रॉक पहनती अक्सर धानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

जाती रहती सर्कस-मेला,
ख़ूब मज़े से खाती केला।
मुझसे सुनती रोज़ कहानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता

सुबह-सुबह उठ जाती बिटिया। 
घर-आँगन महकाती बिटिया।
फूली नहीं समाती धरती, 
हँसकर जब बतियाती बिटिया।

उर में आस जगाती बिटिया।
कोयल जैसा गाती बिटिया।
परियों की शहज़ादी लगती, 
मन को बहुत लुभाती बिटिया।

दुख में सुख भर लाती बिटिया।
दो-दो कुल की थाती बिटिया।
ख़ुशियों का संसार बसा कर,
सबकी प्रिय बन जाती बिटिया।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता


पापा बोले बिटिया से,
जीवन में ख़ुश रहना है।
सोच समझकर बतलाओ,
जो कुछ तुमको बनना है।

प्यारा देश हमारा है,
सीमा पर मैं जाऊँगी।
बिटिया बोली पापा से,
फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी।

दुश्मन आँख तरेरेगा,
उसको मार भगाऊँगी।
मैं भारत की बेटी हूँ,
परचम फिर लहराऊँगी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Sunday, 15 February 2026

मालपुआ खाकर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ


वे 
दूध में पानी मिलाते हैं,
और फिर
दूध का दूध 
पानी का पानी 
चाहते हैं!

उत्कोच में डूबी व्यवस्था 
निकम्मों कों
कर्मठता का पर्याय 
बता रही है,
जनता 
अपने फ़ैसले पर
पछता रही है!

बड़ी उम्मीदों के साथ
जनता ने अपना
जनप्रतिनिधि चुना,
जनप्रतिनिधि
मालपुआ खाकर
उड़ता बना!

जो कभी क्लासरूम नहीं गये 
बच्चों का हक़ खा गये,
शिक्षक दिवस के अवसर पर 
वे भी पुरस्कार पा गये!

वह ताउम्र बॉस को 
रिश्वत देता रहा, 
बॉस उसे 
सहूलियत 
देता रहा!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Tuesday, 20 January 2026

मही मिली यों व्योम से/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे


धूप गुनगुनी कर रही, यादों से संयुक्त।
मन सरसों के बाग़ में, घूम रहा उन्मुक्त।।

ऋतुपति के सान्निध्य में, नयन करें संवाद। 
आहट अन्तर में हुई, एक सदी के बाद।।

दृष्टि पड़ी ऋतुराज की, उर ने गाये गीत।
पृष्ठ-पृष्ठ अनुभूति का, हुआ गुलाबी मीत।।

मही मिली यों व्योम से, मुस्काये रतिराज।
उर में गहरी प्रीति के, उड़ने लगे जहाज।।

कहे प्रिया से 'वीर' कब, अपने मन की बात।
जादू किया वसंत ने, प्रति पल हुआ प्रभात।।

कुसुमाकर कौतुक करे, चले अनोखी चाल।
छुआ नहीं हमने उन्हें, हुए गुलाबी गाल।।

पीतवसन धरती हुई, धवल हुआ आकाश।
पिकानन्द की छाँव में, थिरक रहे भुजपाश।।

जीवन रहते कब हुआ, इच्छाओं का अंत।
उमड़े बादल नेह के, छाया हृदय वसंत।।

धूप सुहानी पूछती, बीते कल की बात।
छेड़ रहा मधुमास फिर, देकर नया प्रभात।।

परिवर्तन की चाह में, आया है मधुमास।
धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com