Tuesday, 21 April 2026

दोहों में ढला युगबोध: 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' का समीक्षात्मक पाठ/समीक्षक- डॉ. नीलू अग्रवाल

इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है। 

यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम। 
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।" 

एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।" 

अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान। 
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"

गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"

शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है- 
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल। 
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"

दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
 
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"

पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग। 
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"

दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।" 

किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"

कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर। 
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"

या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान। 
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।

ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"

एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात। 
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।

अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094

Wednesday, 25 February 2026

मेरी प्यारी बिटिया रानी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

दीवारों पर चित्र बनाये,
मुझको अपना मित्र बताये।
बातें करती बनकर नानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

तुतली बोली मन को भाती,
गोदी में आ प्यार जताती।
फ्रॉक पहनती अक्सर धानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

जाती रहती सर्कस-मेला,
ख़ूब मज़े से खाती केला।
मुझसे सुनती रोज़ कहानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता

सुबह-सुबह उठ जाती बिटिया। 
घर-आँगन महकाती बिटिया।
फूली नहीं समाती धरती, 
हँसकर जब बतियाती बिटिया।

उर में आस जगाती बिटिया।
कोयल जैसा गाती बिटिया।
परियों की शहज़ादी लगती, 
मन को बहुत लुभाती बिटिया।

दुख में सुख भर लाती बिटिया।
दो-दो कुल की थाती बिटिया।
ख़ुशियों का संसार बसा कर,
सबकी प्रिय बन जाती बिटिया।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
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फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता


पापा बोले बिटिया से,
जीवन में ख़ुश रहना है।
सोच समझकर बतलाओ,
जो कुछ तुमको बनना है।

प्यारा देश हमारा है,
सीमा पर मैं जाऊँगी।
बिटिया बोली पापा से,
फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी।

दुश्मन आँख तरेरेगा,
उसको मार भगाऊँगी।
मैं भारत की बेटी हूँ,
परचम फिर लहराऊँगी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Sunday, 15 February 2026

मालपुआ खाकर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ


वे 
दूध में पानी मिलाते हैं,
और फिर
दूध का दूध 
पानी का पानी 
चाहते हैं!

उत्कोच में डूबी व्यवस्था 
निकम्मों कों
कर्मठता का पर्याय 
बता रही है,
जनता 
अपने फ़ैसले पर
पछता रही है!

बड़ी उम्मीदों के साथ
जनता ने अपना
जनप्रतिनिधि चुना,
जनप्रतिनिधि
मालपुआ खाकर
उड़ता बना!

जो कभी क्लासरूम नहीं गये 
बच्चों का हक़ खा गये,
शिक्षक दिवस के अवसर पर 
वे भी पुरस्कार पा गये!

वह ताउम्र बॉस को 
रिश्वत देता रहा, 
बॉस उसे 
सहूलियत 
देता रहा!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
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Tuesday, 20 January 2026

मही मिली यों व्योम से/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे


धूप गुनगुनी कर रही, यादों से संयुक्त।
मन सरसों के बाग़ में, घूम रहा उन्मुक्त।।

ऋतुपति के सान्निध्य में, नयन करें संवाद। 
आहट अन्तर में हुई, एक सदी के बाद।।

दृष्टि पड़ी ऋतुराज की, उर ने गाये गीत।
पृष्ठ-पृष्ठ अनुभूति का, हुआ गुलाबी मीत।।

मही मिली यों व्योम से, मुस्काये रतिराज।
उर में गहरी प्रीति के, उड़ने लगे जहाज।।

कहे प्रिया से 'वीर' कब, अपने मन की बात।
जादू किया वसंत ने, प्रति पल हुआ प्रभात।।

कुसुमाकर कौतुक करे, चले अनोखी चाल।
छुआ नहीं हमने उन्हें, हुए गुलाबी गाल।।

पीतवसन धरती हुई, धवल हुआ आकाश।
पिकानन्द की छाँव में, थिरक रहे भुजपाश।।

जीवन रहते कब हुआ, इच्छाओं का अंत।
उमड़े बादल नेह के, छाया हृदय वसंत।।

धूप सुहानी पूछती, बीते कल की बात।
छेड़ रहा मधुमास फिर, देकर नया प्रभात।।

परिवर्तन की चाह में, आया है मधुमास।
धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
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Monday, 29 December 2025

जैसे फिरकी नाचती/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।

बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।

बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।

तब पासे का खेल था, अब गोली-बन्दूक।
मदद माँगती द्रौपदी, सभा आज भी मूक।।

देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।

कोस रहे हैं देश को, बात-बात पर क्रुद्ध।
'आज़ादी' के नाम पर, बैठे हुए 'प्रबुद्ध'।।

कल तक बैठे साथ जो, आज हुए उस ओर।
कितनी मैली हो गयी, राजनीति की डोर।।

किये बहाना ठण्ड का, साहब पड़े अचेत।
फत्तू फटी कमीज़ में, जोत रहा है खेत।।

वोटतंत्र ने जड़ दिया, लोकतंत्र पर कील।
हंसों का हक़ ले उड़े, बाज़ गिद्ध औ' चील।।

सुधरेंगे हालात कब, पूरे होंगे स्वप्न।
कुर्सी का मुख बन्द था, जब-जब पूछा प्रश्न।।

छीना मुख का कौर फिर, जंगल और ज़मीन।
अब कुर्सी बतला रही, हलधर बेबस दीन।।

ज़ालिम उनके हाथ से, रहे निवाला छीन।
जिनके बल पर हो गये, सत्ता पर आसीन।।

देखे महलों की तरफ़, आते हुए किसान।
कील ठोंककर छिप गये, सभी सियासतदान।।

मगन रहे हम जश्न में, सिर पर चद्दर तान।
दुविधा में जीते मिले, पल-पल यहाँ किसान।।

फन्दे में फिर चढ़ गया, बेबस एक किसान।।
सूदख़ोर ने जब धरे, गिरवी खेत-मकान।।

कहीं बाढ़ सूखा कहीं, कहीं तुषारापात।
मौसम भी अक्सर करे, हलधर के सँग घात।।

काश गेह के वास्ते, ला सकता परचून।
हरिया खाकर सो गया, फिर से रोटी-नून।।

हल से हलधर ने लिखे, जीवन के उत्कर्ष।
संकल्पों के सामने, बौने सब संघर्ष।।

बेमौसम बारिश हुई, फ़सल हुई बेकार। 
टूट सगाई फिर गयी, बिटिया की इस बार।।

पीतवसन में देखकर, दुनिया समझे भक्त।
अत्याचारी पी रहा, निर्दोषों का रक्त।।

जिया अभावों में सदा, रहा उगाता अन्न।
लाश झूलती देखकर, हुए पड़ोसी सन्न।।

हलधर क़ीमत वोट की, शायद पायें जान।
पाँच बरस पूरे हुए, बँटा नहीं अनुदान।।

जैसे कोई भीख हो, देते यों अनुदान।
सत्ता करती मसख़री, हम रहते अंजान।।

वोटतंत्र ने फिर किये, वादे एक हज़ार।
कृषक ठगे-से रह गये, बनी नयी सरकार।।

उधर सड़क पर लाठियाँ, इधर प्रीत के बोल। 
समाधान के नाम पर, केवल टाल-मटोल।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com