Wednesday, 21 October 2026

लघुकथा में हर शब्द सैनिक है- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(लघुकथाकार डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' से निशा भास्कर की बातचीत)

[डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर']

[निशा भास्कर]

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद में जन्मे डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि, दोहाकार तथा लघुकथाकार हैं। उनकी रचनाओं का केन्द्रीय स्वर सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विद्रूपता, भ्रष्टाचार, ग्रामीण जीवन का विघटन और मानवीय मूल्यों के ह्रास पर तीखा प्रहार है। वे लघुकथा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का हथियार मानते हैं। उनकी लघुकथाओं का नायक आम आदमी है। उन्होंने कोई नाम न दो और इस दुनिया में तीसरी दुनिया जैसे लघुकथा संकलनों का सम्पादन किया है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान हेतु उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। लघुकथा दर्पण साहित्य मंच की संचालिका और लघुकथाकार निशा भास्कर ने समकालीन लघुकथा के विभिन्न पहलुओं पर उनसे बातचीत की। यह महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार यहाँ ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:

1. 
निशा भास्कर-
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, फिर भी हम इनसे रूबरू होने के लिए इन्हीं के द्वारा इनकी पारिवारिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि जानेंगे।

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
परिचय तो पाठकों के प्रेम से बनता है। मेरा जन्म एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। घर में पुस्तकों का वातावरण था। मेरे पिता सेवानिवृत्त शिक्षक हैं और माँ को साहित्य में विशेष अभिरुचि रही है। परिवार से मिले संस्कारों ने मुझे मनुष्य और समाज को निकट से देखने की दृष्टि दी। आगे चलकर अध्ययन, साहित्यिक मित्रता, पत्र-पत्रिकाओं से जुड़ाव और निरन्तर लेखन ने मेरी रचनात्मक चेतना को विकसित किया। मैं जब आठवीं का विद्यार्थी था, तभी से साहित्य लेखन में रुचि पैदा हो गयी। प्रारम्भ कविताओं से हुआ था जो आज भी जारी है। गद्य की ओर झुकाव बाद में हुआ। साहित्य में लघुकथा ने मुझे इसलिए खींचा क्योंकि इसमें कम शब्दों में अधिकतम और प्रभावी बात कही जा सकती है। पृष्ठभूमि के क्रम में मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी भी रचनाकार का परिचय उसकी प्रकाशित पुस्तकों या प्राप्त सम्मानों से पूरा नहीं होता। उसके पीछे उसका परिवार, संस्कार, परिवेश, संघर्ष, अध्ययन और जीवनानुभव भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। मैंने कविता, दोहा, क्षणिका, लघुकथा, समीक्षा और सम्पादन—इन सभी क्षेत्रों में काम किया है। मेरे लिए विधाओं का विभाजन उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना मनुष्य, समाज और समय की सच्चाइयों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करना। 

2. 
निशा भास्कर-
क्या अब तक लघुकथा के लिए ऐसा समय आया है, जिसे लघुकथा का स्वर्ण युग कहा जा सके।

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
जी नहीं। लघुकथा का विकास एक सतत प्रक्रिया है। इसे किसी एक कालखंड में सीमित करके 'स्वर्ण युग' घोषित करना आसान नहीं है। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि आज लघुकथा को व्यापक पाठकीयता, अनेक पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन मंचों और साहित्यिक आयोजनों का लाभ मिल रहा है। लघुकथा का स्वर्ण युग तभी माना जायेगा — जब रचनाओं की संख्या के साथ उनकी गुणवत्ता भी बढ़े। लघुकथा अपने समय की जटिलताओं को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करे। लेखक विधा के शिल्प और मूलभूत तत्त्वों का गम्भीर अध्ययन करें। आलोचना, संपादन और पाठकीय विवेक का विकास हो। लघुकथा पूर्ण रूप से सामाजिक और मानवीय चेतना का माध्यम बने। वर्तमान संभावनाओं से भरा हुआ है; इसे स्वर्ण युग बनाने की जिम्मेदारी रचनाकारों, संपादकों, आलोचकों और पाठकों—सभी की है।

3. 
निशा भास्कर-
आपके अनुसार लघुकथा पर चर्चा, परिचर्चा और साक्षात्कार जैसे कार्यक्रमों के द्वारा इस विधा पर क्या विशेष प्रभाव पड़ा है?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
किसी भी साहित्यिक विधा का विकास केवल लेखन से नहीं, बल्कि संवाद से भी होता है। चर्चा और परिचर्चा से रचनाकारों को अपने वीक प्वाइंट्स और पासबिल्टीज को समझने का अवसर मिलता है। साक्षात्कार के माध्यम से लेखक की रचना-दृष्टि, अनुभव-संसार और रचना-प्रक्रिया पाठकों के सामने आती है। इन कार्यक्रमों से लघुकथा पर कई सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। यथा- विधा की पहचान और स्वीकार्यता बढ़ी है। लघुकथा के इतिहास, शिल्प और सरोकारों पर विमर्श हुआ है। नये रचनाकारों को मार्गदर्शन मिला है। लघुकथाओं की आलोचनात्मक समीक्षा सम्भव हुई है। विभिन्न पीढ़ियों के रचनाकारों के बीच संवाद बना है। लेकिन चर्चा केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्वस्थ आलोचना, तर्कपूर्ण असहमति और रचना के गुण-दोषों पर स्पष्ट बातचीत ही लघुकथा को समृद्ध बनायेगी।

4. 
निशा भास्कर-
लघुकथा के इतिहास पर विस्तार से बात करने के पश्चात् लघुकथा से क्या अपेक्षाएँ की जा सकती हैं?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
लघुकथा का इतिहास हमें यह समझाता है कि लघुकथा ने किन परिस्थितियों में जन्म लिया, किन पड़ावों से गुज़री और किस प्रकार अपने वर्तमान स्वरूप तक पहुँची। इतिहास का अध्ययन केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का माध्यम भी है। लघुकथा से वर्तमान में अपेक्षा है कि उसमें विषयगत नवीनता हो। पूर्व में लिखी गयी लघुकथाओं के कथ्य का अनुकरण न हो। आज की लघुकथा समाज के ज्वलंत मुद्दे - शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानवीय सम्बन्धों- को नये कोण से छुए क्योंकि लघुकथा को दर्पण बनकर वास्तविकता भी दिखाना है और दीप बनकर मार्ग भी प्रशस्त करना है। इसलिए लघुकथा जीवन की वास्तविक समस्याओं से जुड़े। उसमें कथ्य के साथ कलात्मकता भी हो और वह उपदेश देने के बजाय पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करे। लघुकथा आकार में छोटी अवश्य है, लेकिन उसकी दृष्टि छोटी नहीं होनी चाहिए।

5. 
निशा भास्कर-
लघुकथा की रचना प्रक्रिया क्या है? इस बिन्दु पर हमेशा चर्चा करना ज़रूरी है। इस विषय पर आप क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
निश्चित रूप से यह एक अति आवश्यक प्रश्न है। लघुकथा की रचना किसी घटना को छोटा करके लिख देने से नहीं होती। उसके लिए अनुभव, संवेदना, चयन, भाषा और शिल्प—इन सभी का संयोजन आवश्यक है। लघुकथा में हर शब्द सैनिक है। अनावश्यक विस्तार हटा देना चाहिए। लघुकथा का अन्त प्रभावशाली होना चाहिए जो पाठक को सोचने पर विवश कर दे। अन्त को इस प्रकार रचा जाना चाहिए कि वह पूरी रचना को नया अर्थ दे। लघुकथा में उपदेशात्मकता से बचना चाहिए। लघुकथा में लेखक को बहुत कुछ कहने के बजाय सही संकेत देना होता है। पाठक की सक्रियता और कल्पना के लिए भी कुछ स्थान बचा रहना चाहिए। साथ ही लघुकथा लेखन में लेखकीय प्रवेश से बचना चाहिए।

6. 
निशा भास्कर-
आज लघुकथा को नये विषयों के साथ नवीन संस्कार की ज़रूरत है। उसे सुसंस्कृत करना और लघुकथा के लेखकों को पढ़ने की आदत डालकर उसके मूलभूत तत्व से परिचित करवाना कितना आवश्यक है? इस सन्दर्भ में आपसे विस्तृत चर्चा चाहूँगी।

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
आज लघुकथा को नये विषयों की आवश्यकता है, पर केवल नये विषय पर्याप्त नहीं हैं। विषय के साथ नवीन दृष्टि और सुसंस्कृत अभिव्यक्ति भी चाहिए। मोबाइल, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बदलते पारिवारिक सम्बन्ध, वृद्धावस्था, पर्यावरण संकट, लैंगिक समानता और उपभोक्तावाद जैसे विषय लघुकथा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ एक बात का ध्यान और रखना होगा कि नवीनता का अर्थ केवल आधुनिक शब्दों या तकनीकी प्रसंगों का प्रयोग नहीं है। लेखक को यह समझना होगा कि लघुकथा में कथानक, वातावरण, चरित्र, संकेत, संवाद, तनाव और अंत की क्या भूमिका है। इसके लिए व्यापक और गम्भीर पठन आवश्यक है। पठन से भाषा समृद्ध होती है, दृष्टि व्यापक होती है और रचना रूढ़ियों से मुक्त होती है। लघुकथा में उपलब्ध आलोचनात्मक सामग्री का अध्ययन भी इस सन्दर्भ में सहायक है।

7. 
निशा भास्कर-
उद्देश्यविहीन रचनाओं का लेखन दिशा भ्रम पैदा करने वाला लेखन होता है। इसलिए लघुकथा में एक उद्देश्य लेकर लेखन करना आपके विचार से कितना आवश्यक है?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'- 
समकालीन सन्दर्भों में लघुकथा सृजन के दृष्टिकोण से यह प्रश्न भी अति महत्त्वपूर्ण है। उद्देश्यविहीन लेखन किसी भी विधा के लिए हानिकारक है। लघुकथा में भी उद्देश्य होना आवश्यक है। हर अच्छी रचना अपने भीतर कोई मानवीय प्रश्न, संवेदना या मूल्य लेकर चलती है। यही उसका अंतर्निहित उद्देश्य है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यह उद्देश्य उपदेश में परिवर्तित न हो जाये। यदि लेखक पहले से निष्कर्ष थोप देता है और पात्रों को केवल उपदेश का माध्यम बना देता है, तो रचना बोझिल हो जाती है। लघुकथा का उद्देश्य कथा और चरित्रों के स्वाभाविक विकास से उभरना चाहिए। एक लघुकथाकार के लिए उद्देश्य इस प्रकार से हो सकते हैं– सामाजिक विसंगति पर प्रश्न उठाना, मानवीय संवेदना को जाग्रत करना, रूढ़ियों और अन्याय का प्रतिरोध करना, पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना, किसी उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को सामने लाना आदि। उद्देश्यपूर्ण समकालीन लघुकथा पाठक को आदेश या उपदेश नहीं देती। वह उसके भीतर प्रश्न और अकुलाहट पैदा करती है।

8. 
निशा भास्कर-
लघुकथा के विकास यात्रा में एक निरन्तर प्रयोगधर्मिता बनी रहे, इसके लिए क्या प्रयोजन करना चाहिए?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
प्रयोगधर्मिता साहित्य की जीवन-शक्ति है। साहित्य में प्रयोग सदैव से होते रहे हैं। जो प्रयोग समय के साथ ढल गये, वे प्रयोग आगे चलते रहे। विधा के विकास के लिए यह एक आवश्यक प्रक्रिया है। किन्तु प्रयोग का अर्थ केवल शिल्प को बदल देना या चौंकाने वाला अंत लिखना नहीं है। कई बार कुछ लोग स्वयं को विधा विशेष या शैली विशेष का मसीहा घोषित करने के लिए कुछ अनावश्यक प्रयोग करते हैं। प्रयोग कथ्य, संरचना, भाषा, दृष्टिकोण, समय-क्रम, संवाद और प्रस्तुति—हर स्तर पर हो सकता है। प्रयोग के बाद हमें यह भी देखना चाहिए कि वह लघुकथा को अधिक समर्थ कर रहा है या केवल चमत्कार पैदा कर रहा है। कोई भी प्रयोग तभी सार्थक है, जब वह कथ्य को अधिक प्रभावी बनाये और पाठक तक सम्प्रेषण को बेहतर करे।

9. 
निशा भास्कर-
लघुकथा के रचनाकार के पास हमेशा एक विवाद रहता है इसके शब्द सीमा को लेकर, मैं जानना चाहूँगी कि लघुकथा का पाठक रचना के शब्द सीमा पर ध्यान देता है या उसके सम्प्रेषण पर?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
लघुकथा की कोई ऐसी कठोर शब्द-सीमा नहीं होनी चाहिए, जिसे हर रचना पर यांत्रिक रूप से लागू किया जाये। शब्द-संयम लघुकथा का आवश्यक गुण है, पर शब्द-संख्या ही उसकी गुणवत्ता का अन्तिम मानदण्ड नहीं हो सकती। पाठक सबसे पहले रचना का प्रभाव, कथ्य, विश्वसनीयता और सम्प्रेषण देखता है। यदि रचना कम शब्दों में अपना अर्थ पूरी तरह पहुँचा देती है, तो वह सफल है। यदि वही बात अनावश्यक विस्तार में कही गयी है, तो वह लघुकथा की संक्षिप्तता को कमज़ोर कर देती है। लघुकथा की संरचना कथा को सघन और गतिशील बनाती है। इसलिए शब्द-सीमा को लक्ष्य नहीं, अनुशासन मानना चाहिए। वास्तविक कसौटी यह है कि रचना कम से कम शब्दों में अधिकतम प्रभाव उत्पन्न करे। यद्यपि वरिष्ठ लघुकथाकार और सुधी समीक्षक एक मंच पर आकर यदि लघुकथा की कोई शब्द सीमा निर्धारित करते हैं तो ऐसी पहल का स्वागत होना चाहिए और उस पर तर्कपूर्ण विचार किया जाना चाहिए। 

10.
निशा भास्कर-
आत्मकथात्मक शैली एवं प्रथम पुरुष में लिखी गयी लघुकथाओं में क्या भेद है?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
देखिए, यह भेद समझना बहुत आवश्यक है और यहीं पर लघुकथाकार को सावधानीपूर्वक कार्य करना पड़ता है। लघुकथा 'स्व' की नहीं 'सर्व' की कथा है। यदि 'मैं' केवल आत्म-प्रलाप तक सीमित रह गया तो वह लघुकथा न होकर डायरी का पन्ना बन जायेगी।

11.
निशा भास्कर-
लघुकथा के संवादों में पात्रानुकूलता लाने के उद्देश्य से लघुकथाकार अशिक्षित पात्रों के संवाद में प्रायः देशज शब्दावली का प्रचुरता से प्रयोग करते हैं। हमारे देश के हिन्दीभाषी क्षेत्र में एक राज्य से दूसरे राज्य में यह देशज शब्दावली अक्सर दुर्बोधता का कारण बन जाती है तथा लघुकथा की सार्वभौमिकता को संकुचित कर देती है। इनसे बचने के लिए एक लघुकथाकार को क्या प्रयास करने चाहिए?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
लघुकथाकार को पात्रानुकूलता और पाठक-सुलभता के बीच संतुलन बनाना चाहिए। देशज शब्द पात्र को जीवन्त और स्थानीय सन्दर्भ को प्रामाणिक बनाते हैं, पर उनका अंधाधुंध प्रयोग कथा को क्षेत्रविशेष तक सीमित कर देता है। पात्रानुकूलता के नाम पर अंचल की शब्दावली को ज्यों का त्यों रख देना भाषा की साधना से बचना है। अति आवश्यक देशज शब्द ही रखे जायें। जहाँ शब्द अनिवार्य न हो, वहाँ हिन्दी के व्यापक रूप या सहज समानार्थी शब्द का प्रयोग करें। एक लघुकथाकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे क्षेत्र या राज्य का सामान्य हिन्दी पाठक बिना शब्दकोश के कथा का भाव पकड़ पा रहा है या नहीं।

12.
निशा भास्कर-
सामयिक प्रसंगों को कालजयी कैसे बनाएँ?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'- 
सामयिकता तभी कालजयी बनती है जब लघुकथा लेखक घटना के पीछे छिपे स्थायी मानवीय प्रश्न को पकड़े। सामयिक प्रसंग समय के साथ बदल सकते हैं, पर उनके भीतर का लोभ, अहंकार, अन्याय, अकेलापन, नैतिक पतन या मानवता के प्रश्न शाश्वत रहते हैं। सामयिकता के बहाने लघुकथा समाचार मात्र बनकर न रह जाये। लघुकथा को बिम्बों एवं प्रतीकों के समुचित प्रयोग से उसे दीर्घकालिक बनाया जा सकता है।

13. 
निशा भास्कर-
लघुकथा के नवरचनाकारों के लिए आपका क्या संदेश होगा?

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'-
नये लघुकथा-लेखकों से मेरा पहला आग्रह है कि वे जल्दबाज़ी में लेखक बनने के बजाय पहले गम्भीर पाठक बनें। लघुकथा लिखना सरल दिखायी देता है, लेकिन अच्छी लघुकथा लिखना कठिन कार्य है। मैं देखता हूँ कि सोशल मीडिया के दौर में सतही लोकप्रियता अर्जित करने की अभिलाषा में अनेक लोग बस लिखना शुरू कर देते हैं। अपने प्लेटफॉर्म पर उसे प्रकाशित कर देते हैं और झूठी वाहवाही में झूमने लगते हैं। हमें यह भी देखना चाहिए कि विधा के विशेषज्ञों में से कितने लोगों ने उस पर अर्थपूर्ण टिप्पणी की है। आलोचनाओं को सहजता से स्वीकार किया जाना चाहिए। सुनी-सुनायी घटनाओं को तुरन्त लघुकथा का रूप न दे दें। रचना को परिमार्जित करने में संकोच नहीं होना चाहिए। मौलिकता, ईमानदारी और निरन्तर अभ्यास अति आवश्यक है। लघुकथा जीवन के किसी छोटे-से क्षण में छिपे बड़े सत्य को सामने लाने की कला है। इसलिए लेखक को घटना से अधिक उसके भीतर छिपे मानवीय अर्थ को पहचानना चाहिए।

■ सम्पर्क :
● साक्षात्कारदाता-
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिनकोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- editorsgveer@gmail.com

● साक्षात्कारकर्ता-
निशा भास्कर
आर जेड एफ- 41A/26
साधनगर -2, पालम कॉलोनी 
नयी दिल्ली- 110045
मोबाइल- 9868533100
ईमेल- nisha.bhaskar71@gmail.com

Wednesday, 7 October 2026

मुखौटे में आदमी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता


यद्यपि वह नहीं है आम आदमी
तो भी करता है हर प्रयास
आम आदमी जैसा दिखने की 
खड़े होकर खिंचवाता है फोटो
लेता है कई कोणों से सेल्फ़ी
कभी चाय की गुमटी पर
कभी चाट के ठेले पर
कभी भेलवाले के पास।

वह अक्सर बनाता है रील्स
गाँव की पगडंडियों पर 
चलते हुए
धान रोपते हुए 
या फिर मोची की दूकान पर बैठे हुए 
फिर पोस्ट कर देता है
सोशल मीडिया के अनेक प्लेटफॉर्म्स पर
एआई से बटोरे हुए टैगलाइन्स के साथ।

यद्यपि उसके पास हैं
लग्ज़री कारें
विदेशी घड़ियाँ
महँगे गॉगल्स
ब्रांडेड शूज
लेकिन तस्वीरों में नज़र आता है
अपनी नाप से बड़ी शर्ट और पैंट में
हवाई चप्पलों में
और कभी पुरानी बाइक में 
या फिर सायकिल या किसी बैटरी रिक्शे में बैठे हुए
बिल्कुल आम आदमी की तरह।

आम आदमी जैसा दिखने का उसका शौक़
बटोरता है सुर्ख़ियाँ
हज़ारों की तादाद में आये
कमेंट पढ़कर हो जाता है
वह गद्गद।
कोई लिखता है, "कितने शालीन हैं साहब"
तो कोई कहता है, "डाउन टू अर्थ हैं सर"
कोई बताता है, "मैं जानता हूँ इन्हें बचपन से,
अहंकार तो छू नहीं गया रत्ती भर"
कुछ पत्तलकारों के
मक्खन-मलाई में लिपटे हुए
और भी लज़ीज़ कमेंट कि
शरमा जाते होंगे साहब भी।

आम आदमी को चूस-चूसकर 
इस शहर से उस शहर तक
अरबों-खरबों की प्रॉपर्टी बनाकर 
कैसे नाटक कर पाते हैं
ऐसे लोग
ओढ़कर
झूठ का लबादा।

काश कि ये लोग देखते
एक दिन सचमुच 
जी कर आम आदमी की ज़िन्दगी 
जब होते ज़लील
करते समझौता
दो जून की रोटी के लिए 
अस्तित्व और अस्मिता से
ख़ुद की झोंपड़ी की उम्मीद में
रोते ख़ून के आँसू
तो डूब मरते 
चुल्लू भर पानी में।
□

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005

Wednesday, 17 June 2026

कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता (सरसी और सार छन्द)

ज्ञान बाँटने जो बैठे थे, बाँट रहे पाखंड।
महिमामंडन अंधकार का, मिलना तय है दंड।
कामी कपटी ढोंगी लोभी, ख़ुद को कहें महंत।
जातिवाद का ज़हर घोलते, झूठे हैं ये संत।।

कुछ तो कहते ख़ुद को ईश्वर, कोई भूत भगाये।
कुछ सत्ता के गलियारों में, बैठे धुनी रमाये।
बीज विषमता के कुछ बोते, करते हेराफेरी।
कुछ विनाश की काली छाया, फूँक रहे रणभेरी।।

कोई यहाँ कबीर नहीं है, और नहीं है दादू।
कोई कथा झूठ की बाँचे, करता कोई जादू।
कुछ शासन के एजेंडे की, खिला रहे हैं गोली।
घूम रहे कुछ राज भवन में, कुछ की बिगड़ी बोली।।

झूठी टीका करें शास्त्र की, नहीं जानते मर्म।
ख़ुद को कहते हैं संन्यासी, करते सदा कुकर्म।
करें अधर्मी रोज़ धर्म को, सरेआम बदनाम।
नोटों की गड्डी से जिनके, भरे पड़े गोदाम।।

इधर-उधर की बातें करते, तर्क गढ़ें मनमानी।
छुआछूत को प्रश्रय देते, कहते ख़ुद को ज्ञानी।
उजले वस्त्र पहनकर बैठे, लेकिन मन है काला।
समरसता के शत्रु घूमते, लेकर कंठी माला।।

भेदभाव का पाठ पढ़ाते, चौड़ी करते खाई।
ख़ुद को कहते पर्वत लेकिन, बाकी सबको राई।
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है, सबमें वही समाया।
एक रक्त है हर प्राणी का, एक सभी की काया।।

● डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Thursday, 14 May 2026

'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : अनकहे प्रश्नों को शब्द देता दोहा-संग्रह/समीक्षक- गरिमा सक्सेना


डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' दोहा छन्द के लिए प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने वाले रचनाकार और सम्पादक हैं। 'नयी सदी के दोहे', 'समकालीन दोहा', 'प्रतिरोध के दोहे' तथा 'सोनचिरैया मौन है' जैसे साझा संकलनों के सम्पादन के साथ उन्होंने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का भी सम्पादन किया है। दोहा लेखन और सम्पादन के साथ दोहा-संग्रहों की समीक्षा और आलोचना की तरफ़ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन सभी चीज़ों में जो बातें महत्त्वपूर्ण है, वह है दोहा छन्द के विकास के लिए कार्य और साहित्य एवं समाज के प्रति अपने कर्त्वयों का निर्वहन। अब प्रश्न उठता है कि वे साहित्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कैसे कर रहे हैं? तो इसका उत्तर है- 'समाज की धमनियों में दौड़ते रक्त के तापमान, उसकी टूटन, उसकी विसंगतियों और उसके भीतर पल रहे अनकहे प्रश्नों को शब्द देकर'। जब सत्ता और समाज के गलियारों में एक सोची-समझी चुप्पी ओढ़ ली जाती है, जब प्रश्नों को पूछना देशद्रोह और सच को देखना अपराध मान लिया जाता है, तब कविता प्रतिरोध का सबसे मुखर और स्थायी स्वर बनकर उभरती है। दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' इसी ध्येय को साधकर लिखे गये दोहों का संग्रह है। यह संग्रह अपने समय का एक ज्वलंत दस्तावेज़ है, एक ऐसी चार्जशीट है जो व्यवस्था के हर उस स्तम्भ पर बड़ी बेबाकी से चस्पाँ की गयी है, जो लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में एक धधकता हुआ प्रश्न है—'कब टूटेंगी चुप्पियाँ?' यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस आम आदमी का है जो व्यवस्था के शोर में अपनी आवाज़ खो चुका है। यह उस किसान की पीड़ा का प्रश्न है जिसकी चीख़ें फाइलों में दब जाती हैं, उस युवा का आक्रोश है जिसकी डिग्रियाँ बेकारी की दीमक चाट रही है, उस स्त्री का मौन है जो सम्मान और सुरक्षा के बीच हर रोज़ एक लक्ष्मण रेखा पर चलती है, और उस बुद्धिजीवी का अंतर्द्वंद्व है जो सच बोलने की क़ीमत और चुप रहने के अपराध के बीच पिस रहा है। दोहाकार शैलेष गुप्त 'वीर' इस एक प्रश्न के माध्यम से समूचे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरते हैं। वे उत्तर नहीं देते, बल्कि पाठक को उत्तर खोजने की प्रक्रिया में शामिल कर लेते हैं। वे व्यंग्य की चुटीली ज़ुबान से झकझोरते हैं और कड़वे प्रश्नों से निदान के लिए प्रेरित करते हैं। 

यह संग्रह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि यह जीवन और समाज के लगभग हर उस पहलू को स्पर्श करता है, जहाँ चुप्पी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। शैलेष जी के दोहे एक विशाल कैनवास पर बिखरे हुए हैं, लेकिन जब उन्हें एक साथ पढ़ा जाता है, तो हमारे समय की एक भयावह और यथार्थपरक तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर का सबसे प्रबल और मुखर स्वर राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना का है। शैलेष जी ने समकालीन भारतीय राजनीति के हर पाखंड, हर प्रपंच और हर गिरावट पर निर्मम प्रहार किया है। उनकी दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। चुनावों का पाखंड, नेताओं का दलबदल, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, और लोकतंत्र के नाम पर 'भीड़तंत्र' का बढ़ता प्रभाव; सब कुछ उन्होंने अपने इन दोहों में समेट लिया है। चुनाव, जो लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, शैलेष जी की नज़रों में महज़ एक प्रपंच और छलावा बनकर रह गया है। नेता शेर, बाज़, गिद्ध के रूप में शिकारी हैं और भोली-भाली जनता भेड़, बकरी, हिरनी, चिड़िया के रूप में उनका शिकार। यह प्रतीक योजना पूरे संग्रह में बार-बार लौटकर आती है और राजनीतिक शोषण के तंत्र को उजागर करती है-
"आहट हुई चुनाव की, बिछने लगी बिसात।
भेड़ों के घर शेर अब, लगा बिताने रात।"

"करतब ग़ज़ब चुनाव के, अजब वक़्त का फेर।
बकरी के घर बैठ कर, भोजन करता शेर।।"

चुनाव के समय नेताओं द्वारा दलितों और वंचितों के घर भोजन करने का जो नाटक खेला जाता है, उस पर इससे सटीक और तीखा व्यंग्य क्या हो सकता है? वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि कैसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग 'भीड़तंत्र की रेस' जीतकर व्यवस्था पर क़ाबिज़ हो रहे हैं-
"हत्या डाका रेप के, जिन पर ढेरों केस।
वही जीतते अब यहाँ, भीड़तंत्र की रेस।।"

राजनीति में नैतिकता और सिद्धान्तों के पतन पर वे गहरी चिन्ता व्यक्त करते हैं। दलबदल और अवसरवादिता आज की राजनीति का पर्याय बन चुकी है। एक टिकट कटते ही कैसे निष्ठा और नीतियाँ बदल जाती हैं, इसका चित्रण देखिए-
"अपने दल ने तोड़ दी, टिकट काटकर आस।
झट विपक्ष की नीतियाँ, उनको आयीं रास।।"

"टिकट कटा यह जानकर, हाल हुए बेहाल।
झण्डा बैनर टोपियाँ, बदल गये तत्काल।।"

शैलेष जी की क़लम उस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर भी चोट करती है जहाँ सत्ताधारी दल हर आवाज़ को ख़ामोश कर देना चाहता है और मीडिया भी उसके सामने नतमस्तक है। यह चुप्पी ही उनके संग्रह का केन्द्रीय बिन्दु है-
"डरे हुए हैं लोग क्यों, क्यों छाया है मौन?
डरा हुआ है मीडिया, प्रश्न करेगा कौन?"

वे सत्ता को 'गान्धारी' और तंत्र को 'अन्धा' कहते हैं, जो एक शक्तिशाली पौराणिक रूपक के माध्यम से वर्तमान की भयावहता को उजागर करता है। 

राजनीति से इतर शैलेष जी की दृष्टि सामाजिक विसंगतियों पर भी उतनी ही पैनी है। वे देखते हैं कि कैसे आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में हमारे नैतिक मूल्य बौने हो गये हैं और मानवीय सम्बन्ध यांत्रिक हो चले हैं-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारिकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"

इस पतन का सबसे त्रासद प्रभाव पारिवारिक सम्बन्धों पर, विशेषकर वृद्धों की स्थिति पर पड़ा है। संग्रह में अनेक दोहे वृद्ध माता-पिता की पीड़ा, उनकी उपेक्षा और उनके अकेलेपन को मार्मिक अभिव्यक्ति देते हैं। नयी पीढ़ी, जो अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की दौड़ में अंधी हो चुकी है, उन्हें 'पैरों की ज़ंजीर' समझती है। शहरों के छोटे होते फ्लैटों में बूढ़ी माँ के लिए जगह नहीं है, भले ही 'डॉगी या फिर कैट' के लिए हो। यह पीड़ा जब असहनीय हो जाती है तो दो बेटों का बाप स्वयं वृद्धाश्रम की राह पकड़ लेता है। ये दोहे केवल दोहे नहीं, हमारे समाज के हृदय पर लगे गहरे घाव हैं-
"तन उनका लन्दन हुआ, मन पेरिस की शाम।
इधर पड़ी माँ खाट पर, उधर छलकते जाम।।"

शैलेष जी आधुनिक जीवनशैली, पश्चिमीकरण और उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों पर भी प्रहार करते हैं। 'लिव-इन' सम्बन्ध, 'बर्गर-पिज़्ज़ा' वाली खाद्य संस्कृति और 'हिप्पीकट' तथा 'बाली पहने मर्द' वाली फैशन-परस्ती उन्हें चिन्तित करती है। वे इसे 'नयी सभ्यता' कहते हैं, जो हमें 'मटियामेट' कर रही है। यह कोई प्रगतिविरोधी सोच नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने की पीड़ा है।

यदि इस संग्रह की आत्मा को किसी एक चरित्र में खोजना हो, तो वह 'हलधर' या 'किसान' है। 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' में किसान की त्रासदी एक ज़रूरी आवाज़ बनकर बार-बार लौटती है। शैलेष जी ने भारतीय किसान के जीवन के हर दुखते पहलू को छुआ है। वे कर्ज़ का बोझ, साहूकार का शोषण, मौसम की मार, सरकारी उदासीनता और अन्ततः आत्महत्या की विवशता; सब को शब्द प्रदान करते हैं-
"पूछा हमने जब कभी, क्यों हलधर लाचार।
चुप्पी ओढ़े मीडिया, मौन मिली सरकार।।"

"फन्दे पर हलधर मिला, उड़े न्याय के होश।
बादल पाला बिजलियाँ, हुए सभी ख़ामोश।।"

नारी विमर्श शैलेष जी की कविता का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। वे स्त्री के प्रति समाज के दोहरे मापदंडों और पाखंड पर कठोर प्रहार करते हैं। एक ओर पोस्टरों पर 'नारी बड़ी महान' लिखा जाता है, तो दूसरी ओर 'बाग़ में बेटियाँ, मिलतीं लहूलुहान'। एक ओर नेता भाषणों में 'नारी हित की बात' करता है, तो दूसरी ओर 'नशे में पीटता, पत्नी को हर रात'। यह पाखंड शैलेष जी को सालता है। वे स्त्री के शोषण के विभिन्न रूपों, यथा- घरेलू हिंसा, दहेज़, वासनापूर्ण दृष्टि आदि को उजागर करते हैं-
"जिनके मन में वासना, वे क्या जानें नेह।
मलिन नयन हैं खोजते, हर नारी में देह।।"

लेकिन शैलेष जी केवल स्त्री की पीड़ा का गायन नहीं करते। वे उसकी शक्ति, उसके सामर्थ्य और उसके बदलते स्वरूप को भी रेखांकित करते हैं। आज की नारी अबला नहीं है। वह पढ़-लिखकर रूढ़ियों को तोड़ रही है। जब व्यापार में डूबे पिता अवसादग्रस्त हो जाते हैं, तो बेटी 'तारणहार' बनकर सामने आती है। वह अब सीता की तरह चुपचाप अपमान नहीं सहती, क्योंकि जब राम, राम नहीं रहे तो सीता क्यों सीता रहे-
"मार-पीट सहती नहीं, लगी कमाने दाम।
सीता क्यों सीता रहे, राम नहीं जब राम।।"

यह स्त्री चेतना का नया और सशक्त स्वर है। शैलेष जी नारी को जीवन का आधार मानते हैं, वह 'दया-धर्म की खान' है, 'शुभ की मित्र है, और शोक की शत्रु'। वे उसके समग्र रूप को चित्रित करते हैं। एक माँ, एक बेटी, एक पत्नी और एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में नारी उनके दोहों में स्थान पाती है।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है शैलेष जी ने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का सम्पादन किया है। यह कार्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति बढ़ता संकट वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चिन्ता का एक प्रमुख विषय है। ऐसे में वे औरों को प्रेरित करने के साथ स्वयं भी इस विषय पर दोहे लिखकर लोगों को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि 'विकास' के नाम पर कैसे विनाश को आमंत्रित किया जा रहा है। जंगल, झीलें, तालाब और पहाड़; सब बिक रहे हैं। तालाबों को पाटकर मॉल बनाये जा रहे हैं और शहर इसका कोई जवाब नहीं देता। वह बस ज़हरीले परिवेश में रहने के लिए हमें बाध्य करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

शैलेष जी की कविता में प्रकृति एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव इकाई है, जिसकी अपनी भावनाएँ हैं। वे चेतावनी देते हैं कि प्रकृति से यह छेड़छाड़ अन्ततः सभ्यता के विनाश का कारण बनेगी-
"क़ुदरत को मत छेड़िए, ठीक नहीं यह रोग।
डूब मरेगी सभ्यता, नहीं बचेंगे लोग।।"

उनके पर्यावरण-सम्बन्धी दोहे आज के युग के लिए एक गम्भीर चेतावनी हैं, एक अपील हैं कि हम समय रहते चेत जायें, अन्यथा भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। 

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की काव्य-कला की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सादगी और संप्रेषणीयता है। उनकी भाषा आम आदमी की भाषा है। वे पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि अपनी बात को सीधे और स्पष्ट रूप से कहते हैं। वे 'मॉल', 'शिफ्ट', 'चैट', 'ईमेल', 'फ़िल्टर फ़ोटो', 'लाइव डिबेट' जैसे आज के शब्दों को दोहे के पारम्परिक अनुशासन में इतनी सहजता से पिरोते हैं कि छन्द की गरिमा भी बनी रहती है और दोहे अपने समय से कटते भी नहीं। यह उनकी काव्य-कला का प्रमाण है। उदाहरण के लिए इस दोहे को देखें-
"आते हैं जब सामने, करें न कोई बात।
मोबाइल से भेजते, सन्देशे दिन-रात।।" 

यह दोहा आज के डिजिटल युग में मानवीय सम्बन्धों के खोखलेपन को जितनी सरलता और गहराई से व्यक्त करता है, वह अत्यन्त प्रभावी है। 
उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है सटीक और धारदार बिम्बों का प्रयोग। वे अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए शक्तिशाली प्रतीक चुनते हैं, जो तुरन्त पाठक के मन में एक स्पष्ट चित्र उकेर देते हैं। राजनीति के जंगल में 'शेर', 'भेड़िये', 'गिद्ध', 'बाज' और 'मगरमच्छ' जैसे हिंसक जीव शोषक वर्ग के प्रतीक हैं, तो 'भेड़', 'बकरी', 'हिरनी', 'चिड़िया' और 'मीन' जैसी निरीह प्रजातियाँ शोषित और आम जनता की प्रतीक हैं। यह प्रतीकात्मकता उनके दोहों को एक सार्वभौमिक और कालातीत अपील प्रदान करती है।

अन्त में इस समीक्षा का सार प्रस्तुत करते हुए मैं इतना ही
कहूँगी कि शैलेष जी के दोहे हमें बेचैन करते हैं, हमें क्रोधित करते हैं, हमें दुखी करते हैं, लेकिन वे हमें निराश नहीं करते। हर दोहे के अन्त में एक अनकहा विश्वास छिपा है कि यह चुप्पी टूटेगी। यह संग्रह स्वयं उस चुप्पी को तोड़ने की दिशा में एक साहसिक और शक्तिशाली क़दम है। यह एक सवाल नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। मैं पूरे विश्वास के साथ इस महत्त्वपूर्ण कृति का स्वागत करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि यह हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनायेगी।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
गरिमा सक्सेना
(संपादक-दोहे के सौ रंग)
ई-109 श्री बालाजी सरीन अपार्टमेंट, अनन्तपुरा रोड, यलहंका, बेंगलुरु (कर्नाटक)
पिन कोड- 560064
मोबाइल- 7694928448

Tuesday, 21 April 2026

दोहों में ढला युगबोध: 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' का समीक्षात्मक पाठ/समीक्षक- डॉ. नीलू अग्रवाल

इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है। 

यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम। 
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।" 

एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।" 

अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान। 
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"

गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"

शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है- 
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल। 
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"

दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
 
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"

पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग। 
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"

दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।" 

किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"

कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर। 
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"

या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान। 
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।

ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"

एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात। 
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।

अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094

Wednesday, 25 February 2026

मेरी प्यारी बिटिया रानी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

दीवारों पर चित्र बनाये,
मुझको अपना मित्र बताये।
बातें करती बनकर नानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

तुतली बोली मन को भाती,
गोदी में आ प्यार जताती।
फ्रॉक पहनती अक्सर धानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

जाती रहती सर्कस-मेला,
ख़ूब मज़े से खाती केला।
मुझसे सुनती रोज़ कहानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता


सुबह-सुबह उठ जाती बिटिया। 
घर-आँगन महकाती बिटिया।
फूली नहीं समाती धरती, 
हँसकर जब बतियाती बिटिया।

उर में आस जगाती बिटिया।
कोयल जैसा गाती बिटिया।
परियों की शहज़ादी लगती, 
मन को बहुत लुभाती बिटिया।

दुख में सुख भर लाती बिटिया।
दो-दो कुल की थाती बिटिया।
ख़ुशियों का संसार बसा कर,
सबकी प्रिय बन जाती बिटिया।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com