Sunday, 15 February 2026
मालपुआ खाकर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
Wednesday, 29 January 2025
तुम गुम थी कहीं और : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
माना, तुम कहीं और थी
मैं कहीं और
पर गुम रहा
तुम्हारे ही ख़यालों में,
यादों का कारवाँ
जब तक पहुँचा
तुम्हारे पते पर,
तुम गुम थी कहीं और।
□
एक ओर आशाओं की
ऊँची पर्वत शृंखला
दूसरी ओर अवरोधों की
गहरी घाटियाँ,
दोनो के मध्य
जूझती है अनवरत्
मेरी इच्छा शक्ति।
□
शीत युद्ध जारी है
धरा और
अम्बर के बीच,
बुलाया है क्षितिज ने
अवलोकनार्थ।
□
खेत-मकान बेचकर
रामधनी का बेटा
शहर में रहता है,
गाँव नर्क है
बात-बात पर
कहता है।
□
पुश्तैनी मकान
पाँच बीघा ज़मीन
बेचकर
बहुत ख़ुश है फुल्लू,
कल उसने ख़रीद लिया है
पॉश एरिया में
नया
टू बीएचके फ़्लैट।
□
दस बिसुवे के मकान में
रहने वाला
गयादीन
दस बाई दस के
फ़्लैट में गुज़ारा करता है,
"महानगर में रहता हूँ"
शान से कहता है।
□
विकास के रास्ते पर
एक नयी किरण
दिखायी दी है,
आशान्वित हूँ
चुनाव पश्चात् भी
बना रहेगा
अस्तित्व।
□
झरोखों के पार भी
है कोई दुनिया,
चूल्हा-चौका करते
सोच रही
मुनिया।
□
आज बेटे को
मिली है
पहली किताब,
ख़ुश है अनपढ़ माँ
जैसे जीत लिया हो
उसने
ओलम्पिक में
स्वर्ण पदक।
□
त्रिज्या और जीवा के
झगड़े में
खो गयी परिधि
नहीं बचा
वृत्त का अस्तित्व।
□
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- editorsgveer@gmail.com
Wednesday, 28 August 2024
बुधिया फिर 'विक्रम' है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
Sunday, 3 September 2023
नैतिकता के गुलाब : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
Sunday, 6 November 2022
समय के प्राचीर पर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Friday, 11 February 2022
'हाँ' में 'हाँ' कह दिया : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
Sunday, 22 August 2021
रोटियाँ सेंक रही है/डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की दस क्षणिकाएँ
Wednesday, 12 May 2021
संकल्पों के गुलाबी संवेग/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
अम्बर के प्रणय-निवेदन पर
लजा गयी धरती,
मुख से निकला
एक शब्द- "अहा!"
और तब से स्वीकृति का
एक पर्याय
अहा भी
हो गया।
□
उसकी चुप्पी में
पढ़े मैंने
उसके मन के भाव,
एक थी हृदय की वेदना
एक थे नयनों के बोल,
ओढ़ लिया धरा ने
हया का घूँघट,
रह गया मुस्कुरा कर
नभ।
□
देह के आसपास
देह से कोसों दूर
एक-दूसरे की चेतना में
रमे दो पक्षी,
लिख रहे-
अनकहे प्रेम की
यशोगाथा,
साक्षी है समय।
□
मिलूँगा तुमसे
एक दिन
किसी निर्जन स्थान पर,
और देखूँगा उसे
निश्छल मुस्कान के सानिध्य में
साथ तुम्हारे
हरा-भरा होते हुए।
□
विराम मत दो
संवाद को,
शायद-
हो जाये कोई कविता
पी लेना चाय
फिर कभी।
□
कुछ बोलती क्यों नहीं
बस देख रही
एकटक तुम मुझे
और मैं तुम्हें
गोया कोई तस्वीर हो तुम
और मैं कोई बुत।
□
मुस्कुरा दी तुम-
बिखरने लगीं स्वर्ण-किरणें
करने लगी जादू-
नथ की आभा,
और फिर कान में
फुसफुसाया सूरज-
"सुनो! यही है महारानी
तुम्हारे सपनों की।"
□
दुनिया दर्द/तुम मरहम,
दुनिया अश्कों का सैलाब
तुम ख़ुशी का समन्दर,
तुम संग
जीवन में रंग ही रंग।
□
तुम्हारा आना
मेरे हाथ से लिफ़ाफ़ा लेना
और मुस्कराकर चली जाना,
उर अन्तर में- तुम ही तुम,
सुनो! लौट कर आना-
इन्हीं वादियों में,
मैं प्रतीक्षा करूँगा सदियों।
□
भिन्न से अभिन्न
द्वैत से अद्वैत
वाद न विवाद,
कल्पनाओं से परे है
मन और यथार्थ का संवाद।
□
भरकर दृगों में
प्रीति का महासमुद्र
सूर्य की एक-एक किरण
फिर बिखरेगी,
बेशक!
धूप निखरेगी।
□
सुनकर/प्रीति के जादुई बोल
और गाढ़ी हो गयी
उसके हाथों की मेहन्दी,
हया ने/ओढ़ लिया घूँघट,
पानी-पानी
हो गया चाँद।
□
"जा रही हूँ, बाॅय"
और फ़ोन कट...,
मस्तिष्क ऊहापोह में
मन सपनों में
उसके मधुर स्वर से
आकाश गुलाबी हो गया।
□
दृष्टि के समक्ष
उसकी
मुस्कुराती हुई तस्वीर,
पीड़ा छूमन्तर!
मुझे गहन अनुभूति हुई
सृष्टि के सामर्थ्य की।
□
उसने ओढ़ ली चुप्पी
मैं पढने लगा मौन की भाषा,
वह हँसी
कह गयी बहुत कुछ
इशारों में,
मैं ढूँढने लगा
अनुभूति में शब्द,
और वह गढ़ रही थी स्वयं
अलौकिक प्रीति का यथार्थ-लोक।
□
मैं उसके हृदय में
वह मेरे हृदय में
हम दोनो ज्यों नदी के दो तट
हम दोनो ज्यों धरती-आकाश
हम दोनो ज्यों चंदा-सूरज
प्रसन्न हैं-
एक-दूसरे को निहार कर।
□
दुनियाभर के दुराग्रहों से दूर
दो अपृथक आत्माएँ
कर रहीं संवाद,
सदियों ने प्रस्तुत किये
एकीकृत संवेदनाओं के साक्ष्य,
तब प्रति पृष्ठ में दोनो ने पढ़ा-
अपने संकल्पों के गुलाबी संवेग।
□
"अलविदा मत कहना कभी",
इतना ही कहा धरा ने
और
जीत लिया-
आकाश।
□
कहा उसने-
"मत करना कभी
छोड़कर जाने की बात,
कहो - सॉरी।",
आशंकाओं से पनपे पौधे
हो गये विनष्ट,
खड़ा हो गया-
नेह का वटवृक्ष।
□
प्रतीक्षा में सूरज
बिखेर रहा किरणें
आ जाना तुम
अस्तगामी होने से पूर्व,
न आ सको तो-
मत आना,
सूरज, फिर मिलेगा कल
पूर्व से पश्चिम तक
भोर से सन्ध्या तक।
□
तुमसे मिलकर
जान पाया-
प्रीत ही जीत,
सजनी!
मैं गीत/तुम संगीत,
बस! यों ही चलती रहें
अपृथक श्वासें,
नहीं चाहिए भूमण्डल।
□
बहुत देर से
ठहरा हुआ हूँ
इनबाॅक्स में,
शायद तुम लिखोगी कुछ
या फिर भेजोगी कोई इमोजी,
मौन टूटता ही नहीं,
तुम भी सोच रही होगी
मुझे ही,
जानता हूँ।
□
असंख्य सपनों के साये में
झंकृत है रोम-रोम,
स्मृतियाँ/कूक रहीं कोयल-सी,
चुप्पियों की सघन छाँव में
महक उठा है-
संवेगों का घरौंदा,
तुम्हें आना ही होगा।
□
मैंने महसूस किया
उतर गयी
दिन भर की थकान,
भेजी उसने
मैसेंजर में
हाथों में चाय का कप थामे
एक क्यूट-सी सेल्फ़ी।
□
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
Saturday, 19 December 2020
रेत में घर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(क्षणिकाएँ)
समय की
टेढ़ी चाल ने
अंकुश लगाया,
महल
सपनों का-
भरभराया।
□ □
आँखों ने बुने सपने
ओझल हो गयी
हृदयस्थ गौरैया,
नहीं बनाऊँगा
अब कभी
रेत में घर।
□ □
मौसम काफ़ी सर्द है
और हवाओं में नमी है
जानता हूँ-
बदलेगा यह
आयेगा/जायेगा,
पर टूट जायेगा
सपनों का नीड़
जानता हूँ यह भी।
□ □
खिड़की खुली तो रहेगी
धूप जब चाहे
आये-जाये,
बची रहेगी मुस्कान
तो अवश्य मुस्कुरायेगा-
घरौंदा
आशाओं का।
□ □
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
[क्षणिका]
Monday, 19 October 2020
सेफ़्टी पिन लगा कर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(3 क्षणिकाएँ)
जब उसने भेजी
एक क्यूट मुस्कान वाली तस्वीर
और लिखा कि-
"रख लो इसे बायीं ज़ेब में
सेफ़्टी पिन लगा कर।"
तब गलबहियाँ करते,
मैंने साक्षात् देखा-
धरा को अम्बर से मिलते।
□ □
उसने कहा मुझसे
"अच्छे लगते हो तुम।"
ऐसा लगा
जैसे किसी ने सौंप दिया
मेरे हाथों में
ख़ुशियों का महाकाश।
□ □
तब बादलों ने
समन्दर की स्याही से
गगन के भाल पर
लिख दिया-
जन्म-जन्मान्तर का साथ,
जब उसने रख दिया
मेरे धड़कते दिल पर
अपना जादुई हाथ।
□ □
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
[क्षणिका]
Saturday, 19 September 2020
आधी चॉकलेट : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(7 क्षणिकाएँ)
1-
प्रेम में तुम्हारा
मुझसे बतियाना
मेरे भीतर भर देता है
आनन्द का असीम सागर,
मन निर्मल तरंगों में
खोकर
हो जाता है
आकाश।
2-
मेरी बाँहों में
आकर तुम
महसूस करती हो
जितना सुरक्षित ख़ुद को,
तुम्हारे नेह की
परिधि में
मैं भी
महसूस करता हूँ
यही।
3-
तुम्हारी पीड़ा- मेरी
मेरी पीड़ा- तुम्हारी
आओ! तुम्हारी हथेली में
अपनी पलकों से
रचा दूँ
अपने नाम की
मेंहदी।
4-
आमने-सामने
मैं और तुम,
मध्य में-
प्रबल अनुभूतियाँ
निष्काम प्रेम की,
मुस्कुराती रहो तुम बस,
मैं निहारता रहूँ।
5-
हाँ, उड़ो जी भर अम्बर में
मेरे हाथ
पंख बनकर
रहेंगे तुम्हारे साथ,
निराश पलों में
देख लेना मेरी ओर
बिखेर कर
चुटकी भर मुस्कान।
6-
आज तुमने दी
अपने हिस्से से
आधी चॉकलेट मुझे
असमंजस में मैं
खाऊँ/या सहेज लूँ
अलौकिक है-
यों तुम्हारा चॉकलेट देना।
7-
फिर तुम्हें देखा आज
गोटेदार लहँगे में
तुम्हारा अनुपम सौन्दर्य
देखकर लजा रही थीं
अप्सराएँ,
और तुम्हारी क्यूट मुस्कान
फिर अन्तर्निहित हो गयी
हृदय में मेरे।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
Saturday, 15 February 2020
तुम मेरी राधा : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Monday, 6 January 2020
Wednesday, 27 November 2019
फिर गैलरी में तुम्हारे चित्र : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(10 क्षणिकाएँ)
----------------------------
1-
आओ लिख दो
मेरे हृदय पर
संकल्पों का लेखा-जोखा
और टाँक दो
मासूमियत के धागे से
नेह के मधुर पल!
2-
मेरे और तुम्हारे
होने का यथार्थ
नहीं टाँक सकेगी
समय की स्याही
उन पलों की
चुप्पी का साम्राज्य
देता है काल की
असीमित परिधि को
चुनौती!
3-
तुम्हारे प्रत्येक आलेख में
अंकित होगा
मेरा अस्तित्व,
किन्तु आने वाली पीढ़ी
नहीं बाँच सकेगी
हमारी प्रीति के अभिलेख!
4-
तुम मेरे हृदय में हो
तुम मेरी चेतना में हो
जानकार यह
मौन है आकाश
कि तुम्हारी स्मृतियाँ
अधिक हैं
उसके विस्तार से!
5-
मोबाइल की 'टोन' बजी
'इनबॉक्स' से 'काॅल-डिटेल्स' तक
खँगाला सब कुछ
मैसेज़/मिस्ड-काॅल
कुछ भी नहीं।
जाकर 'गैलरी' में
फिर से देखे
तुम्हारे हृदयस्थ चित्र!
6-
सम्भावना समय की
गति यथार्थ की
मैं खोजता हूँ
स्वयं में तुम्हें!
7-
यकायक
छलक उठते हैं
हृदय में असंख्य भाव
तुम पढ़ लेती हो सब,
मौन विवशता है
जानता हूँ मैं!
8-
विमर्श का प्रत्येक कोण
हमें देता है
नयी ऊर्जा,
भावों का अतिरेक
ऊर्जा के समानुपात में
हृदय में समानान्तर
भर देता है
नेह की पोटली!
9-
तुम आयी और चली गयी
यह कहकर कि
"तुम प्रबल प्रवाहित भाव भरे"
और मैं तुम्हारे
वापस आने की प्रतीक्षा में
पिरोता रहा क्षणिकाओं में
अपने मन की बात!
10-
तुम अप्सरा नहीं
प्रेरणा हो
तुम्हारे होने का अर्थ
भलीभाँति
समझती हैं
ये क्षणिकाएँ
जैसे समझती हो
मेरे होने का अर्थ तुम!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
27/11/2019
Hindi Micropoetry of
Dr. Shailesh Gupta Veer
Email: doctor_shailesh@rediffmail.com
Saturday, 14 September 2019
हिन्दी दिवस : दस क्षणिकाएँ - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
हिन्दी के नाम पर
चाँदी काटते हैं,
वे भी अब
अपने बच्चों को
अंग्रेज़ी में
डाँटते हैं!
2-
अंग्रेज़ी का रुतबा
कब घटा है,
बस उत्तर धड़ा
दक्षिण धड़ा
आपस में
बँटा है!
3-
हिन्दी के कवि को
पत्नी रोज़ तोलती है,
जब अंग्रेज़ी में
'शटअप' बोलती है!
4-
हम प्रतिवर्ष
हिन्दी दिवस
मनाते हैं,
और फिर
सालभर
अंग्रेज़ी की
बंसी बजाते हैं!
5-
नयी पीढ़ी के लोग
सुबह से शाम तक
अंग्रेज़ी में बड़बड़ाते हैं,
ये बात और है
आधा ख़ुद ही नहीं
समझ पाते हैं!
6-
वे/हिन्दी में सोचते हैं
हिन्दी में हँसते-गुस्साते हैं,
विदेशी अनुभव
अंग्रेज़ी में सुनाते हैं!
7-
दादी भी जब से
सी फॉर कैट
और डी फॉर डॉग
जानने लगी है,
अंग्रेज़ी में बतियाने लगी है!
8-
देश का उत्तरोत्तर
विकास हो रहा है,
यह बात और है
हिन्दी का ह्रास हो रहा है!
9-
अंग्रेज़ी के कद्रदान
अपना भाषण
हिन्दी में
दूसरों से लिखा रहे हैं,
हिन्दी दिवस
मना रहे हैं!
10-
अगले वर्ष हम
फिर हिन्दी दिवस मनायेंगे,
और चद्दर तानकर
साल भर के लिए
फिर सो जायेंगे!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Monday, 15 April 2019
मैं ऑफ़लाइन ज़रूर था : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(7 क्षणिकाएँ)
---------------------------
1-
देखो न
मैं चल रहा कब से
तुम्हारे साथ-साथ
परछाई की तरह,
और तुम
ढूँढ़ रही मुझे
यहाँ-वहाँ!
2-
मैं ऑफ़लाइन ज़रूर था
पर ख़यालों में तुम थी
फुल नेटवर्क की भाँति,
तुम मन के मैसेन्जर में
रची-बसी हो
यों,
जैसे-
चन्द्र के साथ चन्द्रिका!
3-
लिख-लिख कर
मत मेटो
मन की गाढ़ी
अनुभूतियाँ,
आने दो हृदय के
उस पार से
इस पार तक
शब्दों की नाव में
नेह के परिन्दे!
4-
राधा
मत कहना
मैया से कुछ भी
इन पलों को जी लो
आओ
एक इन्द्रधनुष
रच दें
अन्तर में
हम-तुम!
5-
"अभी आयी मैं"
कहकर
चली गयी,
मैं ढूँढ़ता रहा
नदी की धार में
चन्द्रमुखी का प्रतिबिम्ब!
6-
मैंने पुकारा
आ गयी मही
निहारा फिर
बारम्बार
उस पार धरा
इस पार बेचैन आकाश!
7-
सहेली ने कहा-
हर शब्द कविता
संवेदना लबालब
चलो
एक साथ निहारें
एक-दूजे को,
और तुम
फिर लिखना एक नज्म
मेरी ख़ूबसूरती पर!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
15/04/2019
Hindi Micropoetry of
Dr. Shailesh Gupta Veer
Email: doctor_shailesh@rediffmail.com
Monday, 25 March 2019
क्षणिका/बारिश चली आयी : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
और तुम
देखो न मौसम का जादू
आओ बैठते हैं
गंगा के तट पर
ढेर सारी बातें करेंगे
हम-तुम!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
25/03/2019















