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Tuesday, 20 January 2026

मही मिली यों व्योम से/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे


धूप गुनगुनी कर रही, यादों से संयुक्त।
मन सरसों के बाग़ में, घूम रहा उन्मुक्त।।

ऋतुपति के सान्निध्य में, नयन करें संवाद। 
आहट अन्तर में हुई, एक सदी के बाद।।

दृष्टि पड़ी ऋतुराज की, उर ने गाये गीत।
पृष्ठ-पृष्ठ अनुभूति का, हुआ गुलाबी मीत।।

मही मिली यों व्योम से, मुस्काये रतिराज।
उर में गहरी प्रीति के, उड़ने लगे जहाज।।

कहे प्रिया से 'वीर' कब, अपने मन की बात।
जादू किया वसंत ने, प्रति पल हुआ प्रभात।।

कुसुमाकर कौतुक करे, चले अनोखी चाल।
छुआ नहीं हमने उन्हें, हुए गुलाबी गाल।।

पीतवसन धरती हुई, धवल हुआ आकाश।
पिकानन्द की छाँव में, थिरक रहे भुजपाश।।

जीवन रहते कब हुआ, इच्छाओं का अंत।
उमड़े बादल नेह के, छाया हृदय वसंत।।

धूप सुहानी पूछती, बीते कल की बात।
छेड़ रहा मधुमास फिर, देकर नया प्रभात।।

परिवर्तन की चाह में, आया है मधुमास।
धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Monday, 29 December 2025

जैसे फिरकी नाचती/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।

बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।

बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।

तब पासे का खेल था, अब गोली-बन्दूक।
मदद माँगती द्रौपदी, सभा आज भी मूक।।

देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।

कोस रहे हैं देश को, बात-बात पर क्रुद्ध।
'आज़ादी' के नाम पर, बैठे हुए 'प्रबुद्ध'।।

कल तक बैठे साथ जो, आज हुए उस ओर।
कितनी मैली हो गयी, राजनीति की डोर।।

किये बहाना ठण्ड का, साहब पड़े अचेत।
फत्तू फटी कमीज़ में, जोत रहा है खेत।।

वोटतंत्र ने जड़ दिया, लोकतंत्र पर कील।
हंसों का हक़ ले उड़े, बाज़ गिद्ध औ' चील।।

सुधरेंगे हालात कब, पूरे होंगे स्वप्न।
कुर्सी का मुख बन्द था, जब-जब पूछा प्रश्न।।

छीना मुख का कौर फिर, जंगल और ज़मीन।
अब कुर्सी बतला रही, हलधर बेबस दीन।।

ज़ालिम उनके हाथ से, रहे निवाला छीन।
जिनके बल पर हो गये, सत्ता पर आसीन।।

देखे महलों की तरफ़, आते हुए किसान।
कील ठोंककर छिप गये, सभी सियासतदान।।

मगन रहे हम जश्न में, सिर पर चद्दर तान।
दुविधा में जीते मिले, पल-पल यहाँ किसान।।

फन्दे में फिर चढ़ गया, बेबस एक किसान।।
सूदख़ोर ने जब धरे, गिरवी खेत-मकान।।

कहीं बाढ़ सूखा कहीं, कहीं तुषारापात।
मौसम भी अक्सर करे, हलधर के सँग घात।।

काश गेह के वास्ते, ला सकता परचून।
हरिया खाकर सो गया, फिर से रोटी-नून।।

हल से हलधर ने लिखे, जीवन के उत्कर्ष।
संकल्पों के सामने, बौने सब संघर्ष।।

बेमौसम बारिश हुई, फ़सल हुई बेकार। 
टूट सगाई फिर गयी, बिटिया की इस बार।।

पीतवसन में देखकर, दुनिया समझे भक्त।
अत्याचारी पी रहा, निर्दोषों का रक्त।।

जिया अभावों में सदा, रहा उगाता अन्न।
लाश झूलती देखकर, हुए पड़ोसी सन्न।।

हलधर क़ीमत वोट की, शायद पायें जान।
पाँच बरस पूरे हुए, बँटा नहीं अनुदान।।

जैसे कोई भीख हो, देते यों अनुदान।
सत्ता करती मसख़री, हम रहते अंजान।।

वोटतंत्र ने फिर किये, वादे एक हज़ार।
कृषक ठगे-से रह गये, बनी नयी सरकार।।

उधर सड़क पर लाठियाँ, इधर प्रीत के बोल। 
समाधान के नाम पर, केवल टाल-मटोल।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Wednesday, 28 August 2024

दंग सिनेमाहाल था/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

दंग सिनेमाहाल था, ख़ुद दोनो थे दंग।
पिया और के संग था, प्रिया और के संग।।

बढ़ी आँख की रोशनी, फूले पिचके गाल। 
बेटे ने परदेस से, पूछा माँ का हाल।।

बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।

जब-जब जागी अस्मिता, तिनके बने पहाड़।
चूहों ने हड़ताल की, बिल्ली गयी तिहाड़।।

देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।

नये दौर में हो गये, मैले सभी चरित्र।
बेटे की जो मित्र थी, अब पापा की मित्र।।

वही प्रेम का आवरण, वही नीम की छाँव।
बहुत दिनों के बाद मैं, लौटा अपने गाँव।।

अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर।
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।

बैठ 'किचन' में आज फिर, आँसू रही उलीच।
अपनापन है ढूँढ़ती, घर-दफ़्तर के बीच।।

कलुष कहीं होगा नहीं, होगी केवल प्रीत।
लिखती रहना लेखनी, मानवता के गीत।।

सम्पर्क-
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Monday, 19 February 2024

सर पर स्वर्ण किरीट : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

मन जब से फागुन हुआ, रहा तालियाँ पीट।
मानो कोई रख गया, सर पर स्वर्ण किरीट।।

गाया करता हूँ प्रिये, लिखे तुम्हारे गीत।
शायद आये लौट फिर, गया समय जो बीत।।

ढले कभी जो प्रीत में, गीत और नवगीत।
रचे-बसे हैं आज भी, मन में मेरे मीत।।

बातें मधुवन-सी लगें, मन में छाये मेह।
नेह नगर के अंक में, संकल्पों का गेह।।

नयन झुके, सपने सजे, जगी हृदय क़ंदील।
मन बौराया हो गया, सागर, झरना, झील।।

मिले मीत जब अंक भर, बचे न मन में भीति।
यही प्रीति की नीति है, यही प्रीति की रीति।।

चैट हुई, फिर जुड़ गये, जुड़े होम टू होम।
मन बातें करने लगा, भारत से अब रोम।।

जीवन का सुर-ताल तुम, तुम हो मेरी गीति।
धन्य स्वयं को मानता, मिली तुम्हारी प्रीति।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
veershailesh@gmail.com

Thursday, 2 March 2023

उस फागुन की चैट- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

दृग सिग्नेचर कर रहे, एक हुए सब भाव।
फागुन ने जादू किया, पास हुआ प्रस्ताव।।

फागुन मन बादल हुआ, इच्छाएँ आकाश।
इन्द्रधनुष उर में उगे, टूट गये सब पाश।।

फागुन ने आँचल छुआ, संग लिये संकल्प।
नहीं प्रेम का लोक में, कोई और विकल्प।।

नयनकोर पर बन रहे, सुस्मृतियों के फ़्लैट।
इस फागुन में पढ़ रहा, उस फागुन की चैट।।

फागुन का त्यौहार था, मिलने की मनुहार।
पढ़ा पत्र पर विवश था, टपके अश्रु हज़ार।।

आँख मिलीं तो मिल गया, सहसा मुझे जवाब।
गुझिया उसके हाथ थी, मेरे हाथ गुलाब।।

मन गुब्बारे-सा हुआ, पढ़ा शब्द 'प्राणेश'।
मैसेंजर में दिख गया, गुझिया का संदेश।।

मिलन हुआ, बाँछें खिलीं, विरह गया वनवास।
फागुन आया लिख गया, रोम-रोम उल्लास।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
veershailesh@gmail.com 

Friday, 2 December 2022

लिखता हूँ जब प्रेम पर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

मौसम ने जादू किया, हुई अनोखी बात।
सूरज के 'मैसेज़' पढ़े, चंदा आधी रात।।

उनके मीठे बोल से, मिलता पल-पल क्षेम।
सावन के आग़ोश में, बढ़ता जाता प्रेम।।

वे शायद नाराज़ हैं, नहीं करेंगी 'रीड'।
ढूँढ़ रहे 'इनबॉक्स' में, 'मैसेज़' हैं 'अनरीड'।।

श्वास-श्वास निःश्वास-सी, शब्द-शब्द निःशब्द।
लिखता हूँ जब प्रेम पर, चुक जाते क्यों शब्द।।

बातें उसकी रसभरी, देतीं मिसरी घोल।
मन झंकृत हो नाचता, शब्द-शब्द अनमोल।।

सदियों से बेचैन हूँ, कब आओगे पास?
आज मही ने जब कहा, मौन हुआ आकाश।।

रचे-बसे जब प्रेम में, मुखर हुआ विश्वास।
धड़कन तब पी से कहे, आओ मेरे पास।।

दर्द बँटाती 'माँ' सदा, दर्द बँटाती 'हीर'।
नेह मिले ममता तले, घट जाती है पीर।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Sunday, 16 October 2022

बिल्ली गयी तिहाड़ : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

जब-जब जागी अस्मिता, तिनके बने पहाड़।
चूहों ने हड़ताल की, बिल्ली गयी तिहाड़।।

कहें भेड़िये तो कहें, सोलह दूनी आठ।
पढ़ते हैं अब मेमने, गिनतारा के पाठ।।

हवा मुड़ी तो मुड़ गये, रँगे-पुते किरदार।
टूटा पत्ता अडिग था, चुना गया सरदार।।

मुख में कालिख पोतकर, भागा उल्टे पाँव।
आज सत्य ने झूठ का, चित्त किया हर दाँव।।

आयी हिरनी सामने, रख दी अपनी बात।
गया भेड़िया जेल में, बदल गये हालात।।

दीवारों से क्यों लड़ूँ, हर खिड़की स्वच्छन्द।
हाथ लिये हूँ चाबियाँ, कर दूँगा पट बन्द।।

बड़े हुए, तुम कह रहे, बेच-बेचकर इत्र।
होगा पर्दाफ़ाश तो, क्या बोलोगे मित्र।।

छोड़ा कभी न हौसला, लगा न जीवन भार।
कंटक पग-पग थे बिछे, फिर भी पहुँचा पार।।

अविचल था जलधार में, 'वीर' धीर था छत्र।
बहे वेग के संग सब, दुर्बल-निर्बल पत्र।।

चार घड़ी की बात है, दुनिया लेगी नाम।
आया आधी रात में, सूरज का पैग़ाम।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Tuesday, 29 March 2022

पीड़ा जीवन-दृष्टि है : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

पल-पल भारी हो गये, दुख सहते दिन-रात। 
जोड़े हमने उम्र भर, पर न जुड़े जज़्बात।। 

कैसा यह संत्रास है, कटे-कटे से हाथ। 
पीड़ा-आँसू रात दिन, केवल अपने साथ।। 

चीखूँ जितना दर्द में, होती उतनी टीस। 
ख़ुशियों में मेरे रही, पीर हमेशा बीस।। 

कभी निकलती आह है, कभी निकलती चीख। 
चार पलों का मोद मन, माँग रहा है भीख।।

सब कुछ मेरे पास है, पीड़ा, दुख, संत्रास। 
जब मैंने सुख से कहा, लौटा बहुत उदास।। 

दुख संगी ताउम्र है, सुख पल दो पल साथ। 
बहुत सोचकर दर्द का, थाम लिया है हाथ।। 

पीड़ा जीवन-दृष्टि है, सुख है संगी क्षुद्र। 
अविरल आँसू-वृष्टि से, निकला महासमुद्र।। 

सुख के आगे दुख बसा, दुख के आगे जीत। 
जो उलझा सुख-फेर में, वह रहता भयभीत।। 

भरी सभा में आज मैं, फूँक रहा हूँ शंख। 
दुख का परचम है सदा, सुख चिड़िया के पंख।। 

नज़र फेरकर हैं गये, जबसे वे बेदर्द। 
दरिया आँखों से बहे, और देह से दर्द।। 

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Wednesday, 4 November 2020

गंगा शुभ की सुगति है - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

जल जिसका अमरित सदा, तट ज्यों पावन धाम।
भवायनी भागीरथी, सुरसरि गंगा नाम।।

देती जीवन दृष्टि है, देती नेह अनूप।
गंगा संस्कृति बोध है, गंगा माँ का रूप।। 

चलें कुपथ की राह जो, लाती उन्हें सुमार्ग।
गंगा निर्मल भावना, गंगा सत् का मार्ग।।

पाती संसृति चेतना, पाता जीवन अर्थ।
माँ गंगा की छाँह में, मिटते सभी अनर्थ।।

करती शुभ प्रत्यक्ष है, देती पुण्य परोक्ष।
पापरहित गंगा करे, गंगा देती मोक्ष।।

गंगा पावन भावना, संकल्पों की हेतु।
गंगा शुभ की सुगति है, धर्म-कर्म की सेतु।।

जन-जीवन की चेतना, संस्कृति का आधार।
गंगा शुभ की कामना, देती पुण्य अपार।।

माँ गंगा की शक्ति ने, खड़े किये उद्योग।
हमने कूड़ा फेंक कर, दिये हज़ारों रोग।।

गंगा देती सुख हमें, करती प्रेम अपार।
युगों-युगों से है रही, भव सागर से तार।।

पूर्ण मनोरथ हों सभी, हो वैभव शुभ नाम।
हे गंगा मैया तुम्हें, बारम्बार प्रणाम।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
पिन कोड- 212601
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Sunday, 20 September 2020

रात चाँदनी ने लिखे : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे


अधरों पर मुस्कान थी, बाँहों में मनमीत।
रात चाँदनी ने लिखे, सदियों लम्बे गीत।।

अदा सुनहरी प्रेम की, चॉकलेट-सा टोन।
‘चल झूठे’ उसने कहा, काट दिया फिर फ़ोन।।

कैसे प्रिय से बात हो, व्यर्थ गये सब ‘वर्क’।
लाख कोशिशें कर चुकी, बैरी है ‘नेटवर्क’।।

रहे बदलते करवटें, जागे सारी रात।
पहले उनसे फ़ोन पर, हो जाती थी बात।।

महुआरे-से दो नयन, बाँते हैं शहतूत।
सरस प्रकृति का रूप वो, मैं वसंत का दूत।।

तुम मीरा तुम राधिके, तुम कान्हा की वेणु।
तन हूँ मैं तुम आत्मा, तुम बिन मैं, जस रेणु।।

मिले आज जब ‘बीच’ में, नैन हुए तब चार।
दिल मेरा बैंजो हुआ, मन हो गया गिटार।।

प्रियतम आओ हम रँगें, धरती से आकाश।
बोल रही है भावना, सच हो सकता काश।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Monday, 27 July 2020

बाबा तुलसीदास : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'


शब्द-शब्द नव चेतना, छन्द भरें उल्लास। 
कवियों में सिरमौर हैं, बाबा तुलसीदास।।

कालजयी है लेखनी, अतुल शब्द विन्यास।  
रचे अनूठे छन्द जो, बाबा तुलसीदास।।

मिले अनोखी शान्ति तब, फैले मधुर सुवास।
हमने जब भी पढ़ लिया, बाबा तुलसीदास।।

मानस की चौपाइयाँ, हरतीं दुख-संत्रास।
दिये हमें संजीवनी, बाबा तुलसीदास।।

राम नाम का मन्त्र है, जीवन का विश्वास। 
शब्द-शब्द में कह गये, बाबा तुलसीदास।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com 
27/07/2020

Wednesday, 31 July 2019

एक 'पूस की रात' - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

अमर कथाएँ दी हमें, गढ़े अमर किरदार।
मुंशी जी साहित्य के, हैं सच्चे सरदार।।

कथाकार सिरमौर वे, उपन्यास सम्राट।
प्रेमचंद बस एक हैं, जैसे व्योम विराट।।

लिखे लेखनी सच सदा, याद रहे यह बात।
सदियों पर भारी पड़ी, एक 'पूस की रात'।।

हरी नोट में ढूँढ़ता, अन्न-वसन भरपूर।
मिला माॅल में कल मुझे, फिर हामिद मज़बूर।।

क़दम हमारे चन्द्र पर, पड़ने को तैयार।
होरी बेबस आज भी, धनिया भी लाचार।।

दुनिया के दुख-दर्द का, जब-जब ढूँढ़ा छोर।
होरी-हल्कू तब यहाँ, मिले मुझे हर ओर।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
31/07/2019

Monday, 17 June 2019

जग ने कहा कबीर - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

कोई बोले फक्कड़ी, कोई कहे कबीर।
एक रूप में सब छिपे, साधू, संत, फ़कीर।।

ढाई आखर बाँचता, हरता जग की चीख।
कहते उसे कबीर हैं, देता अनुपम सीख।।

इधर-उधर भटका बहुत, बाक़ी बचा न धीर।
जब मन मुट्ठी में धरा, जग ने कहा कबीर।।

छल-प्रपंच से जो परे, करे झूठ पर चोट।
जग में वही कबीर है, मन में तनिक न खोट।।

पीड़ा सबकी मेटता, देता सच्ची राह।
उसका नाम कबीर है, जिसे न कोई चाह।।

चिन्तन अमर कबीर का, देता ज्ञान अखंड।
जिसके आगे हो गया, खंड-खंड पाखंड।।

पाकर थोड़ी बुद्धि मैं, बन बैठा हूँ 'वीर'।
समझदार होता अगर, कहते लोग कबीर।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
15/06/2019