जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।
बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।
बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।
तब पासे का खेल था, अब गोली-बन्दूक।
मदद माँगती द्रौपदी, सभा आज भी मूक।।
देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।
कोस रहे हैं देश को, बात-बात पर क्रुद्ध।
'आज़ादी' के नाम पर, बैठे हुए 'प्रबुद्ध'।।
कल तक बैठे साथ जो, आज हुए उस ओर।
कितनी मैली हो गयी, राजनीति की डोर।।
किये बहाना ठण्ड का, साहब पड़े अचेत।
फत्तू फटी कमीज़ में, जोत रहा है खेत।।
वोटतंत्र ने जड़ दिया, लोकतंत्र पर कील।
हंसों का हक़ ले उड़े, बाज़ गिद्ध औ' चील।।
सुधरेंगे हालात कब, पूरे होंगे स्वप्न।
कुर्सी का मुख बन्द था, जब-जब पूछा प्रश्न।।
छीना मुख का कौर फिर, जंगल और ज़मीन।
अब कुर्सी बतला रही, हलधर बेबस दीन।।
ज़ालिम उनके हाथ से, रहे निवाला छीन।
जिनके बल पर हो गये, सत्ता पर आसीन।।
देखे महलों की तरफ़, आते हुए किसान।
कील ठोंककर छिप गये, सभी सियासतदान।।
मगन रहे हम जश्न में, सिर पर चद्दर तान।
दुविधा में जीते मिले, पल-पल यहाँ किसान।।
फन्दे में फिर चढ़ गया, बेबस एक किसान।।
सूदख़ोर ने जब धरे, गिरवी खेत-मकान।।
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, कहीं तुषारापात।
मौसम भी अक्सर करे, हलधर के सँग घात।।
काश गेह के वास्ते, ला सकता परचून।
हरिया खाकर सो गया, फिर से रोटी-नून।।
हल से हलधर ने लिखे, जीवन के उत्कर्ष।
संकल्पों के सामने, बौने सब संघर्ष।।
बेमौसम बारिश हुई, फ़सल हुई बेकार।
टूट सगाई फिर गयी, बिटिया की इस बार।।
पीतवसन में देखकर, दुनिया समझे भक्त।
अत्याचारी पी रहा, निर्दोषों का रक्त।।
जिया अभावों में सदा, रहा उगाता अन्न।
लाश झूलती देखकर, हुए पड़ोसी सन्न।।
हलधर क़ीमत वोट की, शायद पायें जान।
पाँच बरस पूरे हुए, बँटा नहीं अनुदान।।
जैसे कोई भीख हो, देते यों अनुदान।
सत्ता करती मसख़री, हम रहते अंजान।।
वोटतंत्र ने फिर किये, वादे एक हज़ार।
कृषक ठगे-से रह गये, बनी नयी सरकार।।
उधर सड़क पर लाठियाँ, इधर प्रीत के बोल।
समाधान के नाम पर, केवल टाल-मटोल।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com
Monday, 29 December 2025
जैसे फिरकी नाचती/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे
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