इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है।
यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम।
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।"
एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"
अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान।
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"
गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"
शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"
छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है-
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल।
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"
दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"
पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग।
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"
दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।"
किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"
कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर।
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"
या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान।
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।
ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"
एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात।
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।
अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094


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