Thursday, 14 May 2026

'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : अनकहे प्रश्नों को शब्द देता दोहा-संग्रह/समीक्षक- गरिमा सक्सेना


डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' दोहा छन्द के लिए प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने वाले रचनाकार और सम्पादक हैं। 'नयी सदी के दोहे', 'समकालीन दोहा', 'प्रतिरोध के दोहे' तथा 'सोनचिरैया मौन है' जैसे साझा संकलनों के सम्पादन के साथ उन्होंने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का भी सम्पादन किया है। दोहा लेखन और सम्पादन के साथ दोहा-संग्रहों की समीक्षा और आलोचना की तरफ़ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन सभी चीज़ों में जो बातें महत्त्वपूर्ण है, वह है दोहा छन्द के विकास के लिए कार्य और साहित्य एवं समाज के प्रति अपने कर्त्वयों का निर्वहन। अब प्रश्न उठता है कि वे साहित्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कैसे कर रहे हैं? तो इसका उत्तर है- 'समाज की धमनियों में दौड़ते रक्त के तापमान, उसकी टूटन, उसकी विसंगतियों और उसके भीतर पल रहे अनकहे प्रश्नों को शब्द देकर'। जब सत्ता और समाज के गलियारों में एक सोची-समझी चुप्पी ओढ़ ली जाती है, जब प्रश्नों को पूछना देशद्रोह और सच को देखना अपराध मान लिया जाता है, तब कविता प्रतिरोध का सबसे मुखर और स्थायी स्वर बनकर उभरती है। दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' इसी ध्येय को साधकर लिखे गये दोहों का संग्रह है। यह संग्रह अपने समय का एक ज्वलंत दस्तावेज़ है, एक ऐसी चार्जशीट है जो व्यवस्था के हर उस स्तम्भ पर बड़ी बेबाकी से चस्पाँ की गयी है, जो लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में एक धधकता हुआ प्रश्न है—'कब टूटेंगी चुप्पियाँ?' यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस आम आदमी का है जो व्यवस्था के शोर में अपनी आवाज़ खो चुका है। यह उस किसान की पीड़ा का प्रश्न है जिसकी चीख़ें फाइलों में दब जाती हैं, उस युवा का आक्रोश है जिसकी डिग्रियाँ बेकारी की दीमक चाट रही है, उस स्त्री का मौन है जो सम्मान और सुरक्षा के बीच हर रोज़ एक लक्ष्मण रेखा पर चलती है, और उस बुद्धिजीवी का अंतर्द्वंद्व है जो सच बोलने की क़ीमत और चुप रहने के अपराध के बीच पिस रहा है। दोहाकार शैलेष गुप्त 'वीर' इस एक प्रश्न के माध्यम से समूचे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरते हैं। वे उत्तर नहीं देते, बल्कि पाठक को उत्तर खोजने की प्रक्रिया में शामिल कर लेते हैं। वे व्यंग्य की चुटीली ज़ुबान से झकझोरते हैं और कड़वे प्रश्नों से निदान के लिए प्रेरित करते हैं। 

यह संग्रह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि यह जीवन और समाज के लगभग हर उस पहलू को स्पर्श करता है, जहाँ चुप्पी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। शैलेष जी के दोहे एक विशाल कैनवास पर बिखरे हुए हैं, लेकिन जब उन्हें एक साथ पढ़ा जाता है, तो हमारे समय की एक भयावह और यथार्थपरक तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर का सबसे प्रबल और मुखर स्वर राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना का है। शैलेष जी ने समकालीन भारतीय राजनीति के हर पाखंड, हर प्रपंच और हर गिरावट पर निर्मम प्रहार किया है। उनकी दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। चुनावों का पाखंड, नेताओं का दलबदल, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, और लोकतंत्र के नाम पर 'भीड़तंत्र' का बढ़ता प्रभाव; सब कुछ उन्होंने अपने इन दोहों में समेट लिया है। चुनाव, जो लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, शैलेष जी की नज़रों में महज़ एक प्रपंच और छलावा बनकर रह गया है। नेता शेर, बाज़, गिद्ध के रूप में शिकारी हैं और भोली-भाली जनता भेड़, बकरी, हिरनी, चिड़िया के रूप में उनका शिकार। यह प्रतीक योजना पूरे संग्रह में बार-बार लौटकर आती है और राजनीतिक शोषण के तंत्र को उजागर करती है-
"आहट हुई चुनाव की, बिछने लगी बिसात।
भेड़ों के घर शेर अब, लगा बिताने रात।"

"करतब ग़ज़ब चुनाव के, अजब वक़्त का फेर।
बकरी के घर बैठ कर, भोजन करता शेर।।"

चुनाव के समय नेताओं द्वारा दलितों और वंचितों के घर भोजन करने का जो नाटक खेला जाता है, उस पर इससे सटीक और तीखा व्यंग्य क्या हो सकता है? वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि कैसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग 'भीड़तंत्र की रेस' जीतकर व्यवस्था पर क़ाबिज़ हो रहे हैं-
"हत्या डाका रेप के, जिन पर ढेरों केस।
वही जीतते अब यहाँ, भीड़तंत्र की रेस।।"

राजनीति में नैतिकता और सिद्धान्तों के पतन पर वे गहरी चिन्ता व्यक्त करते हैं। दलबदल और अवसरवादिता आज की राजनीति का पर्याय बन चुकी है। एक टिकट कटते ही कैसे निष्ठा और नीतियाँ बदल जाती हैं, इसका चित्रण देखिए-
"अपने दल ने तोड़ दी, टिकट काटकर आस।
झट विपक्ष की नीतियाँ, उनको आयीं रास।।"

"टिकट कटा यह जानकर, हाल हुए बेहाल।
झण्डा बैनर टोपियाँ, बदल गये तत्काल।।"

शैलेष जी की क़लम उस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर भी चोट करती है जहाँ सत्ताधारी दल हर आवाज़ को ख़ामोश कर देना चाहता है और मीडिया भी उसके सामने नतमस्तक है। यह चुप्पी ही उनके संग्रह का केन्द्रीय बिन्दु है-
"डरे हुए हैं लोग क्यों, क्यों छाया है मौन?
डरा हुआ है मीडिया, प्रश्न करेगा कौन?"

वे सत्ता को 'गान्धारी' और तंत्र को 'अन्धा' कहते हैं, जो एक शक्तिशाली पौराणिक रूपक के माध्यम से वर्तमान की भयावहता को उजागर करता है। 

राजनीति से इतर शैलेष जी की दृष्टि सामाजिक विसंगतियों पर भी उतनी ही पैनी है। वे देखते हैं कि कैसे आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में हमारे नैतिक मूल्य बौने हो गये हैं और मानवीय सम्बन्ध यांत्रिक हो चले हैं-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारिकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"

इस पतन का सबसे त्रासद प्रभाव पारिवारिक सम्बन्धों पर, विशेषकर वृद्धों की स्थिति पर पड़ा है। संग्रह में अनेक दोहे वृद्ध माता-पिता की पीड़ा, उनकी उपेक्षा और उनके अकेलेपन को मार्मिक अभिव्यक्ति देते हैं। नयी पीढ़ी, जो अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की दौड़ में अंधी हो चुकी है, उन्हें 'पैरों की ज़ंजीर' समझती है। शहरों के छोटे होते फ्लैटों में बूढ़ी माँ के लिए जगह नहीं है, भले ही 'डॉगी या फिर कैट' के लिए हो। यह पीड़ा जब असहनीय हो जाती है तो दो बेटों का बाप स्वयं वृद्धाश्रम की राह पकड़ लेता है। ये दोहे केवल दोहे नहीं, हमारे समाज के हृदय पर लगे गहरे घाव हैं-
"तन उनका लन्दन हुआ, मन पेरिस की शाम।
इधर पड़ी माँ खाट पर, उधर छलकते जाम।।"

शैलेष जी आधुनिक जीवनशैली, पश्चिमीकरण और उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों पर भी प्रहार करते हैं। 'लिव-इन' सम्बन्ध, 'बर्गर-पिज़्ज़ा' वाली खाद्य संस्कृति और 'हिप्पीकट' तथा 'बाली पहने मर्द' वाली फैशन-परस्ती उन्हें चिन्तित करती है। वे इसे 'नयी सभ्यता' कहते हैं, जो हमें 'मटियामेट' कर रही है। यह कोई प्रगतिविरोधी सोच नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने की पीड़ा है।

यदि इस संग्रह की आत्मा को किसी एक चरित्र में खोजना हो, तो वह 'हलधर' या 'किसान' है। 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' में किसान की त्रासदी एक ज़रूरी आवाज़ बनकर बार-बार लौटती है। शैलेष जी ने भारतीय किसान के जीवन के हर दुखते पहलू को छुआ है। वे कर्ज़ का बोझ, साहूकार का शोषण, मौसम की मार, सरकारी उदासीनता और अन्ततः आत्महत्या की विवशता; सब को शब्द प्रदान करते हैं-
"पूछा हमने जब कभी, क्यों हलधर लाचार।
चुप्पी ओढ़े मीडिया, मौन मिली सरकार।।"

"फन्दे पर हलधर मिला, उड़े न्याय के होश।
बादल पाला बिजलियाँ, हुए सभी ख़ामोश।।"

नारी विमर्श शैलेष जी की कविता का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। वे स्त्री के प्रति समाज के दोहरे मापदंडों और पाखंड पर कठोर प्रहार करते हैं। एक ओर पोस्टरों पर 'नारी बड़ी महान' लिखा जाता है, तो दूसरी ओर 'बाग़ में बेटियाँ, मिलतीं लहूलुहान'। एक ओर नेता भाषणों में 'नारी हित की बात' करता है, तो दूसरी ओर 'नशे में पीटता, पत्नी को हर रात'। यह पाखंड शैलेष जी को सालता है। वे स्त्री के शोषण के विभिन्न रूपों, यथा- घरेलू हिंसा, दहेज़, वासनापूर्ण दृष्टि आदि को उजागर करते हैं-
"जिनके मन में वासना, वे क्या जानें नेह।
मलिन नयन हैं खोजते, हर नारी में देह।।"

लेकिन शैलेष जी केवल स्त्री की पीड़ा का गायन नहीं करते। वे उसकी शक्ति, उसके सामर्थ्य और उसके बदलते स्वरूप को भी रेखांकित करते हैं। आज की नारी अबला नहीं है। वह पढ़-लिखकर रूढ़ियों को तोड़ रही है। जब व्यापार में डूबे पिता अवसादग्रस्त हो जाते हैं, तो बेटी 'तारणहार' बनकर सामने आती है। वह अब सीता की तरह चुपचाप अपमान नहीं सहती, क्योंकि जब राम, राम नहीं रहे तो सीता क्यों सीता रहे-
"मार-पीट सहती नहीं, लगी कमाने दाम।
सीता क्यों सीता रहे, राम नहीं जब राम।।"

यह स्त्री चेतना का नया और सशक्त स्वर है। शैलेष जी नारी को जीवन का आधार मानते हैं, वह 'दया-धर्म की खान' है, 'शुभ की मित्र है, और शोक की शत्रु'। वे उसके समग्र रूप को चित्रित करते हैं। एक माँ, एक बेटी, एक पत्नी और एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में नारी उनके दोहों में स्थान पाती है।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है शैलेष जी ने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का सम्पादन किया है। यह कार्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति बढ़ता संकट वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चिन्ता का एक प्रमुख विषय है। ऐसे में वे औरों को प्रेरित करने के साथ स्वयं भी इस विषय पर दोहे लिखकर लोगों को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि 'विकास' के नाम पर कैसे विनाश को आमंत्रित किया जा रहा है। जंगल, झीलें, तालाब और पहाड़; सब बिक रहे हैं। तालाबों को पाटकर मॉल बनाये जा रहे हैं और शहर इसका कोई जवाब नहीं देता। वह बस ज़हरीले परिवेश में रहने के लिए हमें बाध्य करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

शैलेष जी की कविता में प्रकृति एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव इकाई है, जिसकी अपनी भावनाएँ हैं। वे चेतावनी देते हैं कि प्रकृति से यह छेड़छाड़ अन्ततः सभ्यता के विनाश का कारण बनेगी-
"क़ुदरत को मत छेड़िए, ठीक नहीं यह रोग।
डूब मरेगी सभ्यता, नहीं बचेंगे लोग।।"

उनके पर्यावरण-सम्बन्धी दोहे आज के युग के लिए एक गम्भीर चेतावनी हैं, एक अपील हैं कि हम समय रहते चेत जायें, अन्यथा भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। 

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की काव्य-कला की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सादगी और संप्रेषणीयता है। उनकी भाषा आम आदमी की भाषा है। वे पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि अपनी बात को सीधे और स्पष्ट रूप से कहते हैं। वे 'मॉल', 'शिफ्ट', 'चैट', 'ईमेल', 'फ़िल्टर फ़ोटो', 'लाइव डिबेट' जैसे आज के शब्दों को दोहे के पारम्परिक अनुशासन में इतनी सहजता से पिरोते हैं कि छन्द की गरिमा भी बनी रहती है और दोहे अपने समय से कटते भी नहीं। यह उनकी काव्य-कला का प्रमाण है। उदाहरण के लिए इस दोहे को देखें-
"आते हैं जब सामने, करें न कोई बात।
मोबाइल से भेजते, सन्देशे दिन-रात।।" 

यह दोहा आज के डिजिटल युग में मानवीय सम्बन्धों के खोखलेपन को जितनी सरलता और गहराई से व्यक्त करता है, वह अत्यन्त प्रभावी है। 
उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है सटीक और धारदार बिम्बों का प्रयोग। वे अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए शक्तिशाली प्रतीक चुनते हैं, जो तुरन्त पाठक के मन में एक स्पष्ट चित्र उकेर देते हैं। राजनीति के जंगल में 'शेर', 'भेड़िये', 'गिद्ध', 'बाज' और 'मगरमच्छ' जैसे हिंसक जीव शोषक वर्ग के प्रतीक हैं, तो 'भेड़', 'बकरी', 'हिरनी', 'चिड़िया' और 'मीन' जैसी निरीह प्रजातियाँ शोषित और आम जनता की प्रतीक हैं। यह प्रतीकात्मकता उनके दोहों को एक सार्वभौमिक और कालातीत अपील प्रदान करती है।

अन्त में इस समीक्षा का सार प्रस्तुत करते हुए मैं इतना ही
कहूँगी कि शैलेष जी के दोहे हमें बेचैन करते हैं, हमें क्रोधित करते हैं, हमें दुखी करते हैं, लेकिन वे हमें निराश नहीं करते। हर दोहे के अन्त में एक अनकहा विश्वास छिपा है कि यह चुप्पी टूटेगी। यह संग्रह स्वयं उस चुप्पी को तोड़ने की दिशा में एक साहसिक और शक्तिशाली क़दम है। यह एक सवाल नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। मैं पूरे विश्वास के साथ इस महत्त्वपूर्ण कृति का स्वागत करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि यह हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनायेगी।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
गरिमा सक्सेना
(संपादक-दोहे के सौ रंग)
ई-109 श्री बालाजी सरीन अपार्टमेंट, अनन्तपुरा रोड, यलहंका, बेंगलुरु (कर्नाटक)
पिन कोड- 560064
मोबाइल- 7694928448

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