ज्ञान बाँटने जो बैठे थे, बाँट रहे पाखंड।
महिमामंडन अंधकार का, मिलना तय है दंड।
कामी कपटी ढोंगी लोभी, ख़ुद को कहें महंत।
जातिवाद का ज़हर घोलते, झूठे हैं ये संत।।
कुछ तो कहते ख़ुद को ईश्वर, कोई भूत भगाये।
कुछ सत्ता के गलियारों में, बैठे धुनी रमाये।
बीज विषमता के कुछ बोते, करते हेराफेरी।
कुछ विनाश की काली छाया, फूँक रहे रणभेरी।।
कोई यहाँ कबीर नहीं है, और नहीं है दादू।
कोई कथा झूठ की बाँचे, करता कोई जादू।
कुछ शासन के एजेंडे की, खिला रहे हैं गोली।
घूम रहे कुछ राज भवन में, कुछ की बिगड़ी बोली।।
झूठी टीका करें शास्त्र की, नहीं जानते मर्म।
ख़ुद को कहते हैं संन्यासी, करते सदा कुकर्म।
करें अधर्मी रोज़ धर्म को, सरेआम बदनाम।
नोटों की गड्डी से जिनके, भरे पड़े गोदाम।।
इधर-उधर की बातें करते, तर्क गढ़ें मनमानी।
छुआछूत को प्रश्रय देते, कहते ख़ुद को ज्ञानी।
उजले वस्त्र पहनकर बैठे, लेकिन मन है काला।
समरसता के शत्रु घूमते, लेकर कंठी माला।।
भेदभाव का पाठ पढ़ाते, चौड़ी करते खाई।
ख़ुद को कहते पर्वत लेकिन, बाकी सबको राई।
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है, सबमें वही समाया।
एक रक्त है हर प्राणी का, एक सभी की काया।।
● डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
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ईमेल- veershailesh@gmail.com
Wednesday, 17 June 2026
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता (सरसी और सार छन्द)
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