Wednesday, 7 October 2026

मुखौटे में आदमी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता


यद्यपि वह नहीं है आम आदमी
तो भी करता है हर प्रयास
आम आदमी जैसा दिखने की 
खड़े होकर खिंचवाता है फोटो
लेता है कई कोणों से सेल्फ़ी
कभी चाय की गुमटी पर
कभी चाट के ठेले पर
कभी भेलवाले के पास।

वह अक्सर बनाता है रील्स
गाँव की पगडंडियों पर 
चलते हुए
धान रोपते हुए 
या फिर मोची की दूकान पर बैठे हुए 
फिर पोस्ट कर देता है
सोशल मीडिया के अनेक प्लेटफॉर्म्स पर
एआई से बटोरे हुए टैगलाइन्स के साथ।

यद्यपि उसके पास हैं
लग्ज़री कारें
विदेशी घड़ियाँ
महँगे गॉगल्स
ब्रांडेड शूज
लेकिन तस्वीरों में नज़र आता है
अपनी नाप से बड़ी शर्ट और पैंट में
हवाई चप्पलों में
और कभी पुरानी बाइक में 
या फिर सायकिल या किसी बैटरी रिक्शे में बैठे हुए
बिल्कुल आम आदमी की तरह।

आम आदमी जैसा दिखने का उसका शौक़
बटोरता है सुर्ख़ियाँ
हज़ारों की तादाद में आये
कमेंट पढ़कर हो जाता है
वह गद्गद।
कोई लिखता है, "कितने शालीन हैं साहब"
तो कोई कहता है, "डाउन टू अर्थ हैं सर"
कोई बताता है, "मैं जानता हूँ इन्हें बचपन से,
अहंकार तो छू नहीं गया रत्ती भर"
कुछ पत्तलकारों के
मक्खन-मलाई में लिपटे हुए
और भी लज़ीज़ कमेंट कि
शरमा जाते होंगे साहब भी।

आम आदमी को चूस-चूसकर 
इस शहर से उस शहर तक
अरबों-खरबों की प्रॉपर्टी बनाकर 
कैसे नाटक कर पाते हैं
ऐसे लोग
ओढ़कर
झूठ का लबादा।

काश कि ये लोग देखते
एक दिन सचमुच 
जी कर आम आदमी की ज़िन्दगी 
जब होते ज़लील
करते समझौता
दो जून की रोटी के लिए 
अस्तित्व और अस्मिता से
ख़ुद की झोंपड़ी की उम्मीद में
रोते ख़ून के आँसू
तो डूब मरते 
चुल्लू भर पानी में।
□

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005

No comments:

Post a Comment