Sunday, 23 November 2025

बुद्धू/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की लघुकथा

"पुस्तक मेले में तुम आज जा रहे हो न।"
"हाँ! उर्वशी।"
"गिरीश! मैं नहीं आ पाऊँगी, पर अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहूँगी वहाँ।"
"वह कैसे?"
"अपना दिल लेकर नहीं जा रहे क्या?"
"नहीं। वह तो तुम्हारे पास है।"
"पर मेरा तो तुम्हारे पास है न, तो मैं तो वहीं रहूँगी।"

कुछ देर तक खिलखिलाहट दोनों ओर अपना डेरा जमाये बैठी रही। फिर उर्वशी बुदबुदायी, "बुद्धू! अब तुम्हें तैयार नहीं होना क्या? फोन रक्खो और जाओ।"

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
सम्पर्क: 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिनकोड: 212601
मोबाइल: 9839942005
ईमेल: veershailesh@gmail.com

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