Wednesday, 25 February 2026

घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता

सुबह-सुबह उठ जाती बिटिया। 
घर-आँगन महकाती बिटिया।
फूली नहीं समाती धरती, 
हँसकर जब बतियाती बिटिया।

उर में आस जगाती बिटिया।
कोयल जैसा गाती बिटिया।
परियों की शहज़ादी लगती, 
मन को बहुत लुभाती बिटिया।

दुख में सुख भर लाती बिटिया।
दो-दो कुल की थाती बिटिया।
ख़ुशियों का संसार बसा कर,
सबकी प्रिय बन जाती बिटिया।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

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