Monday, 6 January 2020
Monday, 30 December 2019
शीत विशेष हाइकु : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
1-
पढ़े पहाड़ा
दिन-दिन दोगुना
गुलाबी जाड़ा।
2-
काँपती काया
धूप ने पोछे आँसू
हँसे पिताजी।
3-
शीत की सत्ता
रानी अब 'गलन'
'कोहरा' राजा।
4-
सर्द हवाएँ
मौसम मनमानी
वाचाल मूक।
5-
बर्फीला पथ
धुन्ध ने रोक दिया
सूर्य का रथ।
6-
दूर धूप से
रहे तो जान पाये
रिश्ता धूप से।
7-
वांछा शीत की
चार दिनों में ऊबे
अति शीत की।
8-
भोर कोहरा
सिकुड़े हुए दिन
रात कोहरा।
9-
मुदित मन
बारिश-गर्मी-सर्दी
हँसे बिटिया।
10-
भयाक्रान्त भू
गढ़े नये मानक
भीषण ठण्ड।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
पढ़े पहाड़ा
दिन-दिन दोगुना
गुलाबी जाड़ा।
2-
काँपती काया
धूप ने पोछे आँसू
हँसे पिताजी।
3-
शीत की सत्ता
रानी अब 'गलन'
'कोहरा' राजा।
4-
सर्द हवाएँ
मौसम मनमानी
वाचाल मूक।
5-
बर्फीला पथ
धुन्ध ने रोक दिया
सूर्य का रथ।
6-
दूर धूप से
रहे तो जान पाये
रिश्ता धूप से।
7-
वांछा शीत की
चार दिनों में ऊबे
अति शीत की।
8-
भोर कोहरा
सिकुड़े हुए दिन
रात कोहरा।
9-
मुदित मन
बारिश-गर्मी-सर्दी
हँसे बिटिया।
10-
भयाक्रान्त भू
गढ़े नये मानक
भीषण ठण्ड।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
Thursday, 19 December 2019
आत्मतत्व का चिन्तन कहता - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
आओ हर लूँ पीर तुम्हारी
बैठो मेरे पास।
जूही चम्पा गुलबहार तुम
लैला जुलियट हीर,
तुम ही चंदा तुम वसुंधरा
देती मन को धीर,
तुम जीवन की आशा सजनी
तुम निर्मल विश्वास।
मैं गाता हूँ तुम होकर जब
तुम हो जाती वीर,
मन पावन हो जाता ऐसे
ज्यों गंगा का नीर,
मत उदास तुम रहो सहेली
तुम मेरी हर आस।
आत्मतत्व का चिन्तन कहता
मिट्टी सकल शरीर,
नेह प्रीति की गढ़े कहानी
चुप रहती शमशीर,
पार लगायें राधाकिशना
सब उनके ही दास।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com
बैठो मेरे पास।
जूही चम्पा गुलबहार तुम
लैला जुलियट हीर,
तुम ही चंदा तुम वसुंधरा
देती मन को धीर,
तुम जीवन की आशा सजनी
तुम निर्मल विश्वास।
मैं गाता हूँ तुम होकर जब
तुम हो जाती वीर,
मन पावन हो जाता ऐसे
ज्यों गंगा का नीर,
मत उदास तुम रहो सहेली
तुम मेरी हर आस।
आत्मतत्व का चिन्तन कहता
मिट्टी सकल शरीर,
नेह प्रीति की गढ़े कहानी
चुप रहती शमशीर,
पार लगायें राधाकिशना
सब उनके ही दास।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com
Wednesday, 4 December 2019
विश्व हाइकु दिवस पर 10 हाइकु : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
1-
नदी झूमती
पार कर त्रासदी
नभ चूमती।
2-
खिलौने लाये
चहक रहे बच्चे
पापाजी आये।
3-
याद आ गये
गेंदा-गुलाब-जूही
हँसी बिटिया।
4-
पुराना गया
शुद्ध पर्यावरण
सर्वस्व नया।
5-
पूरे हो गये
पहाड़-से सपने
पिता खो गये।
6-
जीवन-मृत्यु
आरोही-अवरोही
शाश्वत सत्य।
7-
सपने धुआँ
हाथ हो गये पीले
रोटी-बेलन।
8-
छाये बादल
उमस छू-मंतर
मन-कमल।
9-
अहं को ढोतीं
अनाचार की साक्षी
सदियाँ रोतीं!
10-
नारी ने किया-
सत्य का साक्षात्कार
जग को चुभा!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
नदी झूमती
पार कर त्रासदी
नभ चूमती।
2-
खिलौने लाये
चहक रहे बच्चे
पापाजी आये।
3-
याद आ गये
गेंदा-गुलाब-जूही
हँसी बिटिया।
4-
पुराना गया
शुद्ध पर्यावरण
सर्वस्व नया।
5-
पूरे हो गये
पहाड़-से सपने
पिता खो गये।
6-
जीवन-मृत्यु
आरोही-अवरोही
शाश्वत सत्य।
7-
सपने धुआँ
हाथ हो गये पीले
रोटी-बेलन।
8-
छाये बादल
उमस छू-मंतर
मन-कमल।
9-
अहं को ढोतीं
अनाचार की साक्षी
सदियाँ रोतीं!
10-
नारी ने किया-
सत्य का साक्षात्कार
जग को चुभा!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Wednesday, 27 November 2019
फिर गैलरी में तुम्हारे चित्र : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
फिर गैलरी में तुम्हारे चित्र
(10 क्षणिकाएँ)
----------------------------
1-
आओ लिख दो
मेरे हृदय पर
संकल्पों का लेखा-जोखा
और टाँक दो
मासूमियत के धागे से
नेह के मधुर पल!
2-
मेरे और तुम्हारे
होने का यथार्थ
नहीं टाँक सकेगी
समय की स्याही
उन पलों की
चुप्पी का साम्राज्य
देता है काल की
असीमित परिधि को
चुनौती!
3-
तुम्हारे प्रत्येक आलेख में
अंकित होगा
मेरा अस्तित्व,
किन्तु आने वाली पीढ़ी
नहीं बाँच सकेगी
हमारी प्रीति के अभिलेख!
4-
तुम मेरे हृदय में हो
तुम मेरी चेतना में हो
जानकार यह
मौन है आकाश
कि तुम्हारी स्मृतियाँ
अधिक हैं
उसके विस्तार से!
5-
मोबाइल की 'टोन' बजी
'इनबॉक्स' से 'काॅल-डिटेल्स' तक
खँगाला सब कुछ
मैसेज़/मिस्ड-काॅल
कुछ भी नहीं।
जाकर 'गैलरी' में
फिर से देखे
तुम्हारे हृदयस्थ चित्र!
6-
सम्भावना समय की
गति यथार्थ की
मैं खोजता हूँ
स्वयं में तुम्हें!
7-
यकायक
छलक उठते हैं
हृदय में असंख्य भाव
तुम पढ़ लेती हो सब,
मौन विवशता है
जानता हूँ मैं!
8-
विमर्श का प्रत्येक कोण
हमें देता है
नयी ऊर्जा,
भावों का अतिरेक
ऊर्जा के समानुपात में
हृदय में समानान्तर
भर देता है
नेह की पोटली!
9-
तुम आयी और चली गयी
यह कहकर कि
"तुम प्रबल प्रवाहित भाव भरे"
और मैं तुम्हारे
वापस आने की प्रतीक्षा में
पिरोता रहा क्षणिकाओं में
अपने मन की बात!
10-
तुम अप्सरा नहीं
प्रेरणा हो
तुम्हारे होने का अर्थ
भलीभाँति
समझती हैं
ये क्षणिकाएँ
जैसे समझती हो
मेरे होने का अर्थ तुम!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
27/11/2019
Hindi Micropoetry of
Dr. Shailesh Gupta Veer
Email: doctor_shailesh@rediffmail.com
(10 क्षणिकाएँ)
----------------------------
1-
आओ लिख दो
मेरे हृदय पर
संकल्पों का लेखा-जोखा
और टाँक दो
मासूमियत के धागे से
नेह के मधुर पल!
2-
मेरे और तुम्हारे
होने का यथार्थ
नहीं टाँक सकेगी
समय की स्याही
उन पलों की
चुप्पी का साम्राज्य
देता है काल की
असीमित परिधि को
चुनौती!
3-
तुम्हारे प्रत्येक आलेख में
अंकित होगा
मेरा अस्तित्व,
किन्तु आने वाली पीढ़ी
नहीं बाँच सकेगी
हमारी प्रीति के अभिलेख!
4-
तुम मेरे हृदय में हो
तुम मेरी चेतना में हो
जानकार यह
मौन है आकाश
कि तुम्हारी स्मृतियाँ
अधिक हैं
उसके विस्तार से!
5-
मोबाइल की 'टोन' बजी
'इनबॉक्स' से 'काॅल-डिटेल्स' तक
खँगाला सब कुछ
मैसेज़/मिस्ड-काॅल
कुछ भी नहीं।
जाकर 'गैलरी' में
फिर से देखे
तुम्हारे हृदयस्थ चित्र!
6-
सम्भावना समय की
गति यथार्थ की
मैं खोजता हूँ
स्वयं में तुम्हें!
7-
यकायक
छलक उठते हैं
हृदय में असंख्य भाव
तुम पढ़ लेती हो सब,
मौन विवशता है
जानता हूँ मैं!
8-
विमर्श का प्रत्येक कोण
हमें देता है
नयी ऊर्जा,
भावों का अतिरेक
ऊर्जा के समानुपात में
हृदय में समानान्तर
भर देता है
नेह की पोटली!
9-
तुम आयी और चली गयी
यह कहकर कि
"तुम प्रबल प्रवाहित भाव भरे"
और मैं तुम्हारे
वापस आने की प्रतीक्षा में
पिरोता रहा क्षणिकाओं में
अपने मन की बात!
10-
तुम अप्सरा नहीं
प्रेरणा हो
तुम्हारे होने का अर्थ
भलीभाँति
समझती हैं
ये क्षणिकाएँ
जैसे समझती हो
मेरे होने का अर्थ तुम!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
27/11/2019
Hindi Micropoetry of
Dr. Shailesh Gupta Veer
Email: doctor_shailesh@rediffmail.com
[क्षणिका]
Friday, 18 October 2019
अमिट यथार्थ : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
कोमल कलाइयों में
खनकती
लाल-फिरोजी चूड़ियाँ
अद्भुत आभायुक्त
खनकते कंगन
शंख-से कानों में
दमकते
स्वर्णशोणित कुण्डल
और पैरों में
छन-छन करती पायल
मस्तक पर बिखरी लटें
और मेरी दुनिया को समेटे
प्यारी-सी
छोटी-सी
बिंदिया
होठ
गुलाब की पंखुड़ियाँ
सिन्धु को समेटे
मुझे निहारती दो आँखें
खींचती हैं अपनी ओर
बुलातीं हैं पास अपने
गुलाबी अम्बर में लिपटी धरा
धीरे-धीरे
पूरे अम्बर को
गुलाबी करते
अम्बर अब अम्बर कहाँ
एकरूप हो गया है
धरा के अलौकिक स्पर्श की
संकल्पना में
जानते हुए भी कि
संकल्पना
कभी यथार्थ का आकार नहीं लेगी
धरा बुलायेगी
और अम्बर यों ही
बुनता रहेगा सपने
यही है
युगों-युगों का
अमिट यथार्थ।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
खनकती
लाल-फिरोजी चूड़ियाँ
अद्भुत आभायुक्त
खनकते कंगन
शंख-से कानों में
दमकते
स्वर्णशोणित कुण्डल
और पैरों में
छन-छन करती पायल
मस्तक पर बिखरी लटें
और मेरी दुनिया को समेटे
प्यारी-सी
छोटी-सी
बिंदिया
होठ
गुलाब की पंखुड़ियाँ
सिन्धु को समेटे
मुझे निहारती दो आँखें
खींचती हैं अपनी ओर
बुलातीं हैं पास अपने
गुलाबी अम्बर में लिपटी धरा
धीरे-धीरे
पूरे अम्बर को
गुलाबी करते
अम्बर अब अम्बर कहाँ
एकरूप हो गया है
धरा के अलौकिक स्पर्श की
संकल्पना में
जानते हुए भी कि
संकल्पना
कभी यथार्थ का आकार नहीं लेगी
धरा बुलायेगी
और अम्बर यों ही
बुनता रहेगा सपने
यही है
युगों-युगों का
अमिट यथार्थ।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com
Wednesday, 16 October 2019
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