Friday, 27 March 2020

जाने कैसा संकट छाया : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

क़ैद गेह में
दुनिया सारी,
जाने कैसा
संकट छाया।
कहो!
चुपचाप
कटेंगे दिन कैसे
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

अनजाना भय
खा डालेगा,
घोर निराशा
में मत डूबो।
सुनो!
हँसो अलि
फिर से रस घोलो।
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

Saturday, 15 February 2020

तुम मेरी राधा : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(10 क्षणिकाएँ)
1-
तुम बस जाती हो
बहुत गहरे अन्तर में 
और मैं 
पढ़ लेता हूँ 
तुम्हारी प्रत्येक चुप्पी,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

2-
देह से परे
बतियाती हैं आत्माएँ
एक-दूसरे के 
हृदय में बैठकर
जन्म-जन्मान्तर से परे,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

3-
तुम बाती 
मैं दीपक 
तुम भाव
मैं बुद्धि,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

4-
मिलो न मिलो
तुम मेरी चेतना 
मैं अविनाशी आत्मा 
हम अभिन्न 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

5-
मैंने अनुभूति की
प्रत्येक पल तुम्हारी 
तुम प्रकृति की संवाहक 
मौन में भी निरन्तर संवाद 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

6-
तुम कहो न कहो
मैंने पढ़ा 
तुम्हारे हृदय में 
अपने अनुराग के अमर पृष्ठ 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

7-
तुम नायिका
मैं नायक
क्षितिज के मुहाने पर 
मिलें शायद
हम कभी या कभी भी नहीं
कामनाओं से परे
आत्माओं का सौन्दर्य 
देता है अलौकिक आनन्द,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

8-
तुम भले हो मुझसे दूर 
किन्तु बतियाती हो
मेरी चेतना से
प्रत्येक क्षण 
समाहित हो मेरी 
प्रत्येक धारणा में,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

9-
सृष्टि के अस्तित्व में गुँथे 
हम दोनों,
चेतनाविहीन हैं श्वासें 
तुम मेरी आत्मा 
मैं तुम्हारा मन,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

10-
मन आह्लादित होता है
बाराम्बार
देखकर हृदय में 
तुम्हारी
रची-बसी प्रतिमूर्ति
अनूठा है
दो आत्माओं का मिलन,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com 
[क्षणिका]




Sunday, 2 February 2020

विश्लेषण के क्रम में : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

तुमने कहा-
"जाकर दर्पण में स्वयं को निहारना
आज और सुन्दर दिखायी दोगे।"

मैंने जब
दर्पण में स्वयं को निहारा
दिखायी दी तुम
और तुम्हारी खिलखिलाती मुस्कान।

जानती हो, तुमने कहा-
"देख लिया दर्पण में
स्वयं का स्वरूप
पुरुष प्रकृति से आच्छादित है।"
और मैंने कहा- "हाँ, तुम सही हो।"

जानती हो, विश्लेषण के क्रम में
मैं यह जान पाया कि
सौन्दर्य के दर्शन शास्त्र का
प्रत्येक पक्ष
चेतना के मनोविज्ञान पर
स्पष्ट दृष्टि रखता है।

एक बात और-
तुम यथार्थ हो
और मैं भी,
दर्पण भी भ्रम नहीं है।

आभासी सत्ता से परे
वास्तविक सत्ता के
अस्तित्व को समझना
अति रोमांचकारी है
और इस रोमांचक यात्रा में
तुम मेरी
और मैं तुम्हारा।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र)
पिन कोड- 212601
veershailesh@gmail.com


Monday, 30 December 2019

शीत विशेष हाइकु : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

1-
पढ़े पहाड़ा
दिन-दिन दोगुना
गुलाबी जाड़ा।

2-
काँपती काया
धूप ने पोछे आँसू
हँसे पिताजी।

3-
शीत की सत्ता
रानी अब 'गलन'
'कोहरा' राजा।

4-
सर्द हवाएँ
मौसम मनमानी
वाचाल मूक।

5-
बर्फीला पथ
धुन्ध ने रोक दिया
सूर्य का रथ।

6-
दूर धूप से
रहे तो जान पाये
रिश्ता धूप से।

7-
वांछा शीत की
चार दिनों में ऊबे
अति शीत की।

8-
भोर कोहरा
सिकुड़े हुए दिन
रात कोहरा।

9-
मुदित मन
बारिश-गर्मी-सर्दी
हँसे बिटिया।

10-
भयाक्रान्त भू
गढ़े नये मानक
भीषण ठण्ड।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Thursday, 19 December 2019

आत्मतत्व का चिन्तन कहता - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

आओ हर लूँ पीर तुम्हारी
बैठो मेरे पास।

जूही चम्पा गुलबहार तुम
लैला जुलियट हीर,
तुम ही चंदा तुम वसुंधरा
देती मन को धीर,
तुम जीवन की आशा सजनी
तुम निर्मल विश्वास।

मैं गाता हूँ तुम होकर जब
तुम हो जाती वीर,
मन पावन हो जाता ऐसे
ज्यों गंगा का नीर,
मत उदास तुम रहो सहेली
तुम मेरी हर आस।

आत्मतत्व का चिन्तन कहता
मिट्टी सकल शरीर,
नेह प्रीति की गढ़े कहानी
चुप रहती शमशीर,
पार लगायें राधाकिशना
सब उनके ही दास।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com


Wednesday, 4 December 2019

विश्व हाइकु दिवस पर 10 हाइकु : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

1-
नदी झूमती
पार कर त्रासदी
नभ चूमती।

2-
खिलौने लाये
चहक रहे बच्चे
पापाजी आये।

3-
याद आ गये
गेंदा-गुलाब-जूही
हँसी बिटिया।

4-
पुराना गया
शुद्ध पर्यावरण
सर्वस्व नया।

5-
पूरे हो गये
पहाड़-से सपने
पिता खो गये।

6-
जीवन-मृत्यु
आरोही-अवरोही
शाश्वत सत्य।

7-
सपने धुआँ
हाथ हो गये पीले
रोटी-बेलन।

8-
छाये बादल
उमस छू-मंतर
मन-कमल।

9-
अहं को ढोतीं
अनाचार की साक्षी
सदियाँ रोतीं!

10-
नारी ने किया-
सत्य का साक्षात्कार
जग को चुभा!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'