Wednesday, 29 January 2025

यों तुम्हारी याद में : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

सोचा था 
सर्दी के मौसम में
तुम ज़रूर याद करोगी
कई दिनों तक 
करता रहा प्रतीक्षा
बजेगी मोबाइल की रिंग
निकल आयेगी धूप 
और छँट जायेगा
घना कुहासा
मैंने खँगाला 
मैसेंजर और ह्वाट्सएप में
पड़ी पुरानी चैट
मन तरंगित होता रहा
खिलती रहीं हृदय में
आशाओं की 
असंख्य कुमुदिनियाँ
झकझोर दिया
आत्मा ने यकायक 
बरसने लगे
देर रात्रि से घुमड़ते बादल
स्मृतियों का लोप सम्भव नहीं
जानता हूँ
तकनीक के संक्रमण काल से 
गुज़रती चेतना
अलमारी में ढूँढ़ने लगी
वर्षों पुराने पत्र 
लैपटॉप में तलाशती रही
पुरानी ईमेल
लगा कि फट पड़ेगा आसमान
बिजली की कड़कड़ाहट
झकझोरती रही मुझे
ठण्डक अपने रौद्र रूप में
प्रवेश कर चुकी है
संकल्पों का लेखा-जोखा
भ्रम के अतिरिक्त
कुछ नहीं,
जैसे गुज़रे हैं 
दिवस/महीने/वर्ष 
यों तुम्हारी याद में
एक दिन 
और कट जायेगा!

 © डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष : अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005

तुम गुम थी कहीं और : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ

माना, तुम कहीं और थी
मैं कहीं और
पर गुम रहा 
तुम्हारे ही ख़यालों में,
यादों का कारवाँ
जब तक पहुँचा
तुम्हारे पते पर,
तुम गुम थी कहीं और।


एक ओर आशाओं की 
ऊँची पर्वत शृंखला
दूसरी ओर अवरोधों की 
गहरी घाटियाँ,
दोनो के मध्य 
जूझती है अनवरत्
मेरी इच्छा शक्ति।


शीत युद्ध जारी है
धरा और 
अम्बर के बीच, 
बुलाया है क्षितिज ने 
अवलोकनार्थ।


खेत-मकान बेचकर
रामधनी का बेटा
शहर में रहता है,
गाँव नर्क है
बात-बात पर 
कहता है।


पुश्तैनी मकान
पाँच बीघा ज़मीन
बेचकर 
बहुत ख़ुश है फुल्लू,
कल उसने ख़रीद लिया है
पॉश एरिया में
नया 
टू बीएचके फ़्लैट।


दस बिसुवे के मकान में
रहने वाला 
गयादीन 
दस बाई दस के 
फ़्लैट में गुज़ारा करता है,
"महानगर में रहता हूँ"
शान से कहता है।


विकास के रास्ते पर
एक नयी किरण 
दिखायी दी है,
आशान्वित हूँ
चुनाव पश्चात् भी
बना रहेगा
अस्तित्व।


झरोखों के पार भी
है कोई दुनिया,
चूल्हा-चौका करते
सोच रही
मुनिया।


आज बेटे को
मिली है
पहली किताब,
ख़ुश है अनपढ़ माँ 
जैसे जीत लिया हो
उसने
ओलम्पिक में 
स्वर्ण पदक।

त्रिज्या और जीवा के
झगड़े में
खो गयी परिधि
नहीं बचा
वृत्त का अस्तित्व।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
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Monday, 18 November 2024

दो आत्माएँ सन्निकट हैं/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

तुमने फिर छू लिया मुझे रोम-रोम
तुम आयी और कहकर चली गयी कि 
"मैं अंकित हूँ मानस-पटल पर सदा-सदा के लिए"
मैं निहारता रहा देर तक तुम्हारी आभा को
और निरन्तर अनुभूति होती रही
अलौकिक सौन्दर्य की
कभी लगा 
कि कोई अदृश्य ऊर्जा खींच रही मुझे
और फिर कभी
तुम नीहारिका बनकर लुभाती रही मुझे
अनायास तो नहीं सबकुछ 
जानता हूँ मैं भी
दो आत्माएँ सन्निकट हैं
कहना चाहती हैं बहुत कुछ 
ब्रह्माण्ड के दो छोर 
हो जाते हैं एक
अद्भुत है महामिलन
खगोलशास्त्रियों के लिए 
गहरा रहस्य है 
यह अद्वैत!
गोधूलि वेला के पल
बुला रहे हैं हमें
आओ सहेली
एक चक्कर और लगा लें
अन्तरिक्ष के दोनो ध्रुवों के मध्य!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Sunday, 10 November 2024

मुझसे कहो कि/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

बहुत कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे 
कभी पास बैठो तो कह दूँ 
कि जिसे तुम कहती हो आकाश 
उस आकाश की मही तुम हो 
कि जिसे तुम समझती हो सूरज 
उस सूरज की चंदा तुम हो 
कभी बैठो न पास 
बहुत कुछ कहना चाहता है मेरा मन तुमसे 
तुम जादू करती हो 
और सारा आसमान गुलाबी हो जाता है 
तुम जादू करती हो 
और सूरज तुम्हारी आभा के आकर्षण में 
मंत्रमुग्ध हो जाता है 
कभी बैठो न पास आकर 
मुझसे कहो कि 
मैं बिताना चाहती हूँ 
तुम्हारे साथ जीवन के कुछ पल
कभी कहो न कि कुछ देर के लिए 
मुझे भर लो अपनी बाँहों में
और हो जाना चाहती हूँ तुम्हारी
पर तुम आती हो और चली जाती हो
सोचो कैसे सँभलता होगा हृदय!
प्रतीक्षा में बीत रहे युग
और पत्थर हो चली हैं आँखें
काश कि!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Monday, 7 October 2024

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' लखनऊ में हुए सम्मानित

विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट तथा माधवी फाउण्डेशन ने डॉ. शैलेष को किया सम्मानित 


फतेहपुर। साहित्य सेवा ट्रस्ट, आगरा तथा माधवी फाउण्डेशन, लखनऊ के ‌ संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का‌ आयोजन राष्ट्रीय पुस्तक मेला सभागार, बलरामपुर गार्डन, लखनऊ में ‌ भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ, जिसमें ‌विद्वानों ने "साहित्य में प्रकृति चित्रण एवं पर्यावरण चेतना" पर विविध आयामों को‌ लेकर अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये। इस अवसर पर फतेहपुर के चर्चित साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' बतौर विशिष्ट अतिथि और वक्ता उपस्थित रहे। उन्होंने "समकालीन दोहा काव्य में प्रकृति बोध एवं पर्यावरण चेतना" विषय पर अपने शोधपत्र के मुख्य अंश प्रस्तुत किये। उन्हें साहित्य भूषण डॉ. मिथिलेश दीक्षित एवं मंच पर उपस्थित अन्य गणमान्य द्वारा प्रतीक चिह्न, प्रशस्तिपत्र, अंगवस्त्र तथा कण्ठहार देकर सम्मानित किया गया। 


ज्ञात हो कि शैलेष जी हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में निरन्तर लिख रहे हैं। विभिन्न विधाओं में सृजन एवं सम्पादन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले वीर जी की रचनाएँ देश-विदेश के हिन्दी और अंग्रेज़ी के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, वेबसाइट्स, संकलनों तथा शोध-संकलनों में अनवरत् प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी कविताओं का अनुवाद अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं में किया जा चुका है। उनकी रचनाओं का प्रसारण दुनिया के अनेक हिस्सों से हो चुका है। 


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि पद्मश्री ‌डॉ. विद्या बिन्दु सिंह थीं, जबकि प्रथम सत्र की अध्यक्षता अभिदेशक के‌‌ सम्पादक डॉ. ओंकार नाथ‌ द्विवेदी ने की तथा द्वितीय सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध सर्जक डा. विश्वम्भर शुक्ल ने की। इस अवसर पर कई पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ और देश के अन्य प्रान्तों से आमंत्रित साहित्यकार भी सम्मानित किये गये। संचालन प्रो. कल्पना ‌दुबे ‌तथा प्रो. सुभाषिणी शर्मा ने किया। आभार ज्ञापन माधवी फाउण्डेशन की ‌अध्यक्ष डॉ. मिथिलेश‌‌ दीक्षित तथा ‌ विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. मोहन‌‌ मुरारी शर्मा ने किया।




सारस्वत अतिथि इन्दौर से पधारे विचार प्रवाह के अध्यक्ष मुकेश तिवारी थे। प्रथम सत्र में विशिष्ट अतिथि रायबरेली ‌से आये राम निवास पंथी‌ और‌ प्रो. आजेंदर प्रताप सिंह, यशवन्त सिंह चौहान, बरेली से आये ‌अनुकृति के सम्पादक डॉ. लवलेश दत्त थे। प्रथम सत्र का शुभारम्भ हाइकु मजूषा के डॉ. मिथिलेश दीक्षित की रचनाधर्मिता पर केन्द्रित विशेषांक के‌ लोकार्पण के साथ हुआ। हाइकु मञ्जूषा के सम्पादक ‌प्रदीप कुमार दाश 'दीपक' को दोनो संस्थाओं की‌ ओर से हाइकु गौरव सम्मान प्रदान ‌किया गया। नवरात्र में सम्पन्न होने वाले इस समारोह में शिक्षा,‌ साहित्य, मीडिया, समाज सेवा आदि ‌क्षेत्रों में विशिष्ट भूमिका निभाने ‌वाली‌ महिलाओं को सम्मानित किया गया।


Wednesday, 28 August 2024

दंग सिनेमाहाल था/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

दंग सिनेमाहाल था, ख़ुद दोनो थे दंग।
पिया और के संग था, प्रिया और के संग।।

बढ़ी आँख की रोशनी, फूले पिचके गाल। 
बेटे ने परदेस से, पूछा माँ का हाल।।

बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।

जब-जब जागी अस्मिता, तिनके बने पहाड़।
चूहों ने हड़ताल की, बिल्ली गयी तिहाड़।।

देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।

नये दौर में हो गये, मैले सभी चरित्र।
बेटे की जो मित्र थी, अब पापा की मित्र।।

वही प्रेम का आवरण, वही नीम की छाँव।
बहुत दिनों के बाद मैं, लौटा अपने गाँव।।

अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर।
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।

बैठ 'किचन' में आज फिर, आँसू रही उलीच।
अपनापन है ढूँढ़ती, घर-दफ़्तर के बीच।।

कलुष कहीं होगा नहीं, होगी केवल प्रीत।
लिखती रहना लेखनी, मानवता के गीत।।

सम्पर्क-
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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बुधिया फिर 'विक्रम' है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ


उधर
उन्नति के शिखर पर
भावी पीढ़ियाँ हैं,
इधर दरक रही
संस्कारों की सीढ़ियाँ हैं!

वे
इनबॉक्स में कुछ और
ग्रुप में कुछ और
लिखते हैं,
ज़रूरत के मुताबिक़
कई चेहरों में
दिखते हैं! 

महापुरुषों का चरित्र
आजकल नेता
घटाते-बढ़ाते हैं,
चुनाव जीत जाते हैं!

रात ढल गयी
सुबह का
अपना पराक्रम है,
कुछ कर गुज़रने की
उम्मीद में
बुधिया
फिर 'विक्रम' है!

वह शब्दों की क़ीमत
नहीं जानता है,
प्रकाशन को महज
व्यवसाय मानता है!

हंगामा
जन्मसिद्ध 
अधिकार है,
जनता
लाचार है!

पंख लगे तो उड़ा
ठोकर लगी तो मुड़ा
उड़ने-मुड़ने में
कुछ नहीं बचा,
सब कुछ प्रकृति का रचा!

सम्पर्क-
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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ईमेल- veershailesh@gmail.com