Wednesday, 27 November 2019

फिर गैलरी में तुम्हारे चित्र : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

फिर गैलरी में तुम्हारे चित्र
(10 क्षणिकाएँ)
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1-
आओ लिख दो
मेरे हृदय पर
संकल्पों का लेखा-जोखा
और टाँक दो
मासूमियत के धागे से
नेह के मधुर पल!

2-
मेरे और तुम्हारे
होने का यथार्थ
नहीं टाँक सकेगी
समय की स्याही
उन पलों की
चुप्पी का साम्राज्य
देता है काल की
असीमित परिधि को
चुनौती!

3-
तुम्हारे प्रत्येक आलेख में
अंकित होगा
मेरा अस्तित्व,
किन्तु आने वाली पीढ़ी
नहीं बाँच सकेगी
हमारी प्रीति के अभिलेख!

4-
तुम मेरे हृदय में हो
तुम मेरी चेतना में हो
जानकार यह
मौन है आकाश
कि तुम्हारी स्मृतियाँ
अधिक हैं
उसके विस्तार से!

5-
मोबाइल की 'टोन' बजी
'इनबॉक्स' से 'काॅल-डिटेल्स' तक
खँगाला सब कुछ
मैसेज़/मिस्ड-काॅल
कुछ भी नहीं।
जाकर 'गैलरी' में
फिर से देखे
तुम्हारे हृदयस्थ चित्र!

6-
सम्भावना समय की
गति यथार्थ की
मैं खोजता हूँ
स्वयं में तुम्हें!

7-
यकायक
छलक उठते हैं
हृदय में असंख्य भाव
तुम पढ़ लेती हो सब,
मौन विवशता है
जानता हूँ मैं!

8-
विमर्श का प्रत्येक कोण
हमें देता है
नयी ऊर्जा,
भावों का अतिरेक
ऊर्जा के समानुपात में
हृदय में समानान्तर
भर देता है
नेह की पोटली!

9-
तुम आयी और चली गयी
यह कहकर कि
"तुम प्रबल प्रवाहित भाव भरे"
और मैं तुम्हारे
वापस आने की प्रतीक्षा में
पिरोता रहा क्षणिकाओं में
अपने मन की बात!

10-
तुम अप्सरा नहीं
प्रेरणा हो
तुम्हारे होने का अर्थ
भलीभाँति
समझती हैं
ये क्षणिकाएँ
जैसे समझती हो
मेरे होने का अर्थ तुम!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
27/11/2019
Hindi Micropoetry of
Dr. Shailesh Gupta Veer
Email: doctor_shailesh@rediffmail.com
[क्षणिका]

Friday, 18 October 2019

अमिट यथार्थ : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

कोमल कलाइयों में
खनकती
लाल-फिरोजी चूड़ियाँ
अद्भुत आभायुक्त
खनकते कंगन
शंख-से कानों में
दमकते
स्वर्णशोणित कुण्डल
और पैरों में
छन-छन करती पायल
मस्तक पर बिखरी लटें
और मेरी दुनिया को समेटे
प्यारी-सी
छोटी-सी
बिंदिया
होठ
गुलाब की पंखुड़ियाँ
सिन्धु को समेटे
मुझे निहारती दो आँखें
खींचती हैं अपनी ओर
बुलातीं हैं पास अपने
गुलाबी अम्बर में लिपटी धरा
धीरे-धीरे
पूरे अम्बर को
गुलाबी करते
अम्बर अब अम्बर कहाँ
एकरूप हो गया है
धरा के अलौकिक स्पर्श की
संकल्पना में
जानते हुए भी कि
संकल्पना
कभी यथार्थ का आकार नहीं लेगी
धरा बुलायेगी
और अम्बर यों ही
बुनता रहेगा सपने
यही है
युगों-युगों का
अमिट यथार्थ।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Thursday, 26 September 2019

ड्यु सेल्फ़ी : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

किचन की खिड़की से
मैंने निहारा
प्रियतमा को चुपचाप
बिखरी लटों के बीच से
उसने भी निहारा मुझे
एक हो गयी नज़र
मुस्कुराये हम दोनों
एक लम्बी खिलखिलाहट ने
तोड़ दी चुप्पी -
और कोई काम नहीं क्या
जब देखो तब
चले आते हो दबे पाँव
देखो न जल गयी रोटी
जाते हो या...
और लटों को किनारे कर
साड़ी के पल्लू से
पोंछ ली
माथे का पसीना
बेलने लगी फिर एक रोटी
मैं निहारता रहा -
विश्वास की आँच में
दमदमाता अलौकिक सौन्दर्य
नेह की लोई में सनी
निश्छल मुस्कान
चेतना ने देखा -
संकल्प के चूल्हे में पका
जन्म-जन्मांतर का सानिध्य
सोचता रहा -
बाधाओं के तवे पर
आत्मविश्वास के चिमटे ने
पकड़ रक्खे हैं सभी सपने
जिन्हें साकार होना ही है
हमारी ज़िद के आगे
यकायक
उसने देखा मुझे
लजाये कपोल
बुदबुदाये होंठ
हे भगवान
गये नहीं तुम अभी
मत बुनो ख़्वाब
खड़े-खड़े
आओ
भरकर बाँहों में
ले लो एक सेल्फ़ी
ड्यु है कब से!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
26/09/2019
doctor_shailesh@rediffmail.com

Saturday, 14 September 2019

हिन्दी दिवस : दस क्षणिकाएँ - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

1-
जो लोग
हिन्दी के नाम पर
चाँदी काटते हैं,
वे भी अब
अपने बच्चों को
अंग्रेज़ी में
डाँटते हैं!

2-
अंग्रेज़ी का रुतबा
कब घटा है,
बस उत्तर धड़ा
दक्षिण धड़ा
आपस में
बँटा है!

3-
हिन्दी के कवि को
पत्नी रोज़ तोलती है,
जब अंग्रेज़ी में
'शटअप' बोलती है!

4-
हम प्रतिवर्ष
हिन्दी दिवस
मनाते हैं,
और फिर
सालभर
अंग्रेज़ी की
बंसी बजाते हैं!

5-
नयी पीढ़ी के लोग
सुबह से शाम तक
अंग्रेज़ी में बड़बड़ाते हैं,
ये बात और है
आधा ख़ुद ही नहीं
समझ पाते हैं!

6-
वे/हिन्दी में सोचते हैं
हिन्दी में हँसते-गुस्साते हैं,
विदेशी अनुभव
अंग्रेज़ी में सुनाते हैं!

7-
दादी भी जब से
सी फॉर कैट
और डी फॉर डॉग
जानने लगी है,
अंग्रेज़ी में बतियाने लगी है!

8-
देश का उत्तरोत्तर
विकास हो रहा है,
यह बात और है
हिन्दी का ह्रास हो रहा है!

9-
अंग्रेज़ी के कद्रदान
अपना भाषण
हिन्दी में
दूसरों से लिखा रहे हैं,
हिन्दी दिवस
मना रहे हैं!

10-
अगले वर्ष हम
फिर हिन्दी दिवस मनायेंगे,
और चद्दर तानकर
साल भर के लिए
फिर सो जायेंगे!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
editorsgveer@gmail.com 


Sunday, 1 September 2019

*मन का रावण मरा नहीं है* : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

हुआ सत्य से झूठ पराजित, और दैन्य से दम्भ।
पूर्ण हुआ अभियान विजय से, कष्टों से प्रारम्भ।
उन्हें पूजती दुनिया सारी, संस्कृति के स्तम्भ।
उनसे चलती श्वास सृष्टि की, उनसे ही आरम्भ।।

जो समष्टि हित जीते हरदम, वे बन जाते राम।
मन का रावण मार सके जो, वे कहलाते राम।
धरती डोले जब असुरों से, तब आते हैं राम।
अहम् शून्य मर्यादा भारी, यही बताते राम।।

आज दशहरे पर फिर से, वही तमाशेबाज़ी।
चंदा करके रावण बनता, होती आतिशबाज़ी।
आज अमावस फिर सोया है, खाकर बासी भाजी।
बोलो कैसे पर्व मनाऊँ, मन कैसे हो राजी।।

भिक्खू का परिवार सड़क पर, फटेहाल पहनावा।।
फूँक दिया था घर रज्जू ने, लल्लन का है दावा।
जैसे-तैसे जेल भी पहुँचे, ज़रा नहीं पछतावा।
मन का रावण मरा नहीं है, करते ढोंग दिखावा।।

बल-वैभव का करें प्रदर्शन, अनगिन ऐसे रोग।
जैसे तैसे जो भी आये, करते धन का योग।
अपकर्मों से नाता जिनका, सुरा, सुंदरी, भोग।
फूँक रहे हैं रावण पुतले, रावण जैसे लोग।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Tuesday, 6 August 2019

तीखी बहुत है धारा नदी की - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

तुम हो धड़कन हृदय की
तुम स्थायी संचार हो
इस अनमने मन का
एक तुम उपचार हो
रिमझिम फुहारें
मौसम सुहाना
और तारों का चमकना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

तुम चन्द्रिका हो चन्द्र की
लालिमा सूर्य की
हो परी अम्बर से आयी
सुनो ध्वनि तूर्य की
सुबह प्रश्न था तुम्हारा
प्रेम कहते हैं किसे
अब समझना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

श्वास बनकर चल रही तुम
इतने पास हो
साज जीवन के तुम्हीं से
सच्ची आस हो
कहते किसे हैं
अब समझा
मैं फिसलना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

प्रणय अपना हो सके शायद
अन्तर में गहरे बस सकूँ शायद
अम्बर धरा से मिल सके शायद
महाकाव्य एक नया लिख सकूँ शायद
संशय तनिक हो
सुन लेना सखी
उर का धड़कना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'