Wednesday, 12 May 2021

संकल्पों के गुलाबी संवेग/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ

अम्बर के प्रणय-निवेदन पर
लजा गयी धरती,
मुख से निकला
एक शब्द- "अहा!"
और तब से स्वीकृति का
एक पर्याय 
अहा भी 
हो गया। 


उसकी चुप्पी में
पढ़े मैंने
उसके मन के भाव,
एक थी हृदय की वेदना
एक थे नयनों के बोल,
ओढ़ लिया धरा ने
हया का घूँघट,
रह गया मुस्कुरा कर
नभ।


देह के आसपास 
देह से कोसों दूर
एक-दूसरे की चेतना में
रमे दो पक्षी,
लिख रहे- 
अनकहे प्रेम की
यशोगाथा,
साक्षी है समय।


मिलूँगा तुमसे
एक दिन 
किसी निर्जन स्थान पर,
और देखूँगा उसे
निश्छल मुस्कान के सानिध्य में
साथ तुम्हारे
हरा-भरा होते हुए।


विराम मत दो
संवाद को,
शायद-
हो जाये कोई कविता
पी लेना चाय
फिर कभी।


कुछ बोलती क्यों नहीं
बस देख रही 
एकटक तुम मुझे
और मैं तुम्हें 
गोया कोई तस्वीर हो तुम 
और मैं कोई बुत।


मुस्कुरा दी तुम- 
बिखरने लगीं स्वर्ण-किरणें
करने लगी जादू-
नथ की आभा,
और फिर कान में 
फुसफुसाया सूरज- 
"सुनो! यही है महारानी
तुम्हारे सपनों की।"


दुनिया दर्द/तुम मरहम,
दुनिया अश्कों का सैलाब 
तुम ख़ुशी का समन्दर,
तुम संग
जीवन में रंग ही रंग।


तुम्हारा आना
मेरे हाथ से लिफ़ाफ़ा लेना
और मुस्कराकर चली जाना,
उर अन्तर में- तुम ही तुम, 
सुनो! लौट कर आना-
इन्हीं वादियों में,
मैं प्रतीक्षा करूँगा सदियों।


भिन्न से अभिन्न
द्वैत से अद्वैत 
वाद न विवाद, 
कल्पनाओं से परे है
मन और यथार्थ का संवाद।


भरकर दृगों में 
प्रीति का महासमुद्र 
सूर्य की एक-एक किरण
फिर बिखरेगी,
बेशक! 
धूप निखरेगी।


सुनकर/प्रीति के जादुई बोल
और गाढ़ी हो गयी
उसके हाथों की मेहन्दी,
हया ने/ओढ़ लिया घूँघट,
पानी-पानी
हो गया चाँद।


"जा रही हूँ, बाॅय"
और फ़ोन कट...,
मस्तिष्क ऊहापोह में 
मन सपनों में 
उसके मधुर स्वर से
आकाश गुलाबी हो गया।


दृष्टि के समक्ष 
उसकी 
मुस्कुराती हुई तस्वीर,
पीड़ा छूमन्तर!
मुझे गहन अनुभूति हुई 
सृष्टि के सामर्थ्य की।


उसने ओढ़ ली चुप्पी
मैं पढने लगा मौन की भाषा,
वह हँसी
कह गयी बहुत कुछ
इशारों में,
मैं ढूँढने लगा
अनुभूति में शब्द, 
और वह गढ़ रही थी स्वयं
अलौकिक प्रीति का यथार्थ-लोक।


मैं उसके हृदय में
वह मेरे हृदय में
हम दोनो ज्यों नदी के दो तट
हम दोनो ज्यों धरती-आकाश
हम दोनो ज्यों चंदा-सूरज
प्रसन्न हैं- 
एक-दूसरे को निहार कर।


दुनियाभर के दुराग्रहों से दूर
दो अपृथक आत्माएँ 
कर रहीं संवाद,
सदियों ने प्रस्तुत किये
एकीकृत संवेदनाओं के साक्ष्य,
तब प्रति पृष्ठ में दोनो ने पढ़ा-
अपने संकल्पों के गुलाबी संवेग।


"अलविदा मत कहना कभी",
इतना ही कहा धरा ने 
और 
जीत लिया-
आकाश। 


कहा उसने-
"मत करना कभी
छोड़कर जाने की बात,
कहो - सॉरी।",
आशंकाओं से पनपे पौधे
हो गये विनष्ट, 
खड़ा हो गया-
नेह का वटवृक्ष।


प्रतीक्षा में सूरज 
बिखेर रहा किरणें 
आ जाना तुम 
अस्तगामी होने से पूर्व, 
न आ सको तो-
मत आना,
सूरज, फिर मिलेगा कल
पूर्व से पश्चिम तक 
भोर से सन्ध्या तक।


तुमसे मिलकर 
जान पाया-
प्रीत ही जीत, 
सजनी!
मैं गीत/तुम संगीत,
बस! यों ही चलती रहें
अपृथक श्वासें,
नहीं चाहिए भूमण्डल।


बहुत देर से
ठहरा हुआ हूँ
इनबाॅक्स में,
शायद तुम लिखोगी कुछ 
या फिर भेजोगी कोई इमोजी,
मौन टूटता ही नहीं,
तुम भी सोच रही होगी 
मुझे ही,
जानता हूँ।


असंख्य सपनों के साये में
झंकृत है रोम-रोम,
स्मृतियाँ/कूक रहीं कोयल-सी,
चुप्पियों की सघन छाँव में 
महक उठा है-
संवेगों का घरौंदा,
तुम्हें आना ही होगा।


मैंने महसूस किया 
उतर गयी 
दिन भर की थकान,   
भेजी उसने
मैसेंजर में 
हाथों में चाय का कप थामे 
एक क्यूट-सी सेल्फ़ी।


© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Tuesday, 20 April 2021

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की दो लघुकथाएँ : बटुआ और बन्नो

बटुआ 
विपिन घर से निकला ही था, तो देखा कि सामने सड़क पर एक बटुआ पड़ा है। कैसे है? किसका है? उठाऊँ या न उठाऊँ? आख़िरकार मन में उठ रहे तमाम सवालों को छोड़ते हुए उसने वह बटुआ उठा ही लिया और यह सोचते हुए खोलकर देखा कि शायद कोई पहचान-पत्र या फ़ोटो हो, संयोग से बटुआ पड़ोस में रहने वाले वर्मा अंकल का था। वह उनके घर की ओर मुड़ गया और पहुँचते ही दरवाज़ा खटखटाया, तो पाया कि सामने वर्मा आन्टी खड़ी हैं। ख़ुशी-ख़ुशी चिल्लाया- "आन्टी! वर्मा अंकल का पर्स, वहाँ रास्ते में मुझे मिला है।" वर्मा आन्टी ने लपक कर विपिन से पर्स ले लिया। "अरे हम लोग कब से ढूँढ़ रहे हैं।" साथ ही तुनकते हुए पूछा- "कितने रूपये हैं इसमें?" विपिन कुछ बोलता, इससे पहले वर्मा आन्टी ने दरवाज़ा बन्द कर लिया।
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बन्नो
बन्नो बात-बात पर पति को ताना मारती और झगड़कर मायके चली जाती। शादी के दो वर्ष हो गये थे और उसने पति के साथ ठीक से दो महीने भी नहीं गुज़ारे थे। पति रमेश उसकी इन हरकतों से दुखी रहने लगा था। किसी काम में उसका मन नहीं रमता था। कुछ समय बाद उसकी घनिष्ठता दूसरी स्त्री के साथ हो गयी और वह उसके साथ घर पर ही रहने लगी। पता चलने पर बन्नो अपने नाज़-नख़रों के साथ एक दिन अचानक रमेश के घर पहुँची और झगड़ा करने लगी। रमेश ने कहा, "तुम मेरे साथ रहो तो मैं इस औरत को छोड़ दूँगा।" "तेरे साथ रहे मेरा ठेंगा, तुझे तो मैं जेल भिजवाऊँगी।" धमकी देकर वह मायके चली गयी और कुछ दिन बाद रमेश जेल की सलाख़ों के पीछे पहुँच गया। इन दिनों मुहल्ले में यह चर्चा आम है कि शादीशुदा होते हुए रमेश ने दूसरी औरत से सम्बन्ध क्यों रखे? समझदार लोगों का कहना है कि बन्नो ने अपने पति की क़द्र की होती तो आज यह नौबत ही नहीं आती।
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© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
सम्पर्क : अध्यक्ष- अन्वेषी संस्था
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिनकोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com 
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Monday, 22 March 2021

विश्व जल दिवस पर विशेष हाइकु : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

जल-जीवन 
व्यर्थ हैं जल बिन
'शुक्र'-'मंगल'।

जल-चेतना 
अद्भुत-अनमोल 
जीवन्त सृष्टि।

जब बचेंगे
जंगल-जलाशय
बचेंगे हम।

जल-रक्षण
अति-आवश्यक
सुखी भविष्य।

जल के साथ 
जिये कल की पीढ़ी
रोप दो पौधे।

जल अस्तित्व 
जल गढ़े जीवन 
जल सर्वस्व। 

निहित प्राण
बूँद-बूँद जीवन  
जल प्रमाण।

जल-आधार 
बूँद-बूँद बचाओ
पुण्य कमाओ।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com 

Wednesday, 10 March 2021

मम्मी : चार ताँका - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

घर को घर
इंसान को इंसान
बनाती मम्मी
पीती विष सर्वदा
पिलाती सुधा सदा।

शुभ मुहुर्त
घर आ गयी बहू
ख़ुश हुई माँ
रह गयी निक्कमी
ग़ुम हो गयी मम्मी।

काम ही काम
दिन-रात सुश्रुषा
उफ़ न आह
देवताओं ने कहा-
विलक्षण है मम्मी।

हार के जीता
नौ दो ग्यारह हुईं 
बद-दुआएँ
भारी पड़ीं  फिर से
मम्मी की प्रार्थनाएँ।
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© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
ईमेल: veershailesh@gmail.com 

Monday, 8 March 2021

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के नारी विमर्श पर केन्द्रित हाइकु

दुनिया पढ़े
नेह के कीर्तिमान 
नारी ने गढ़े।
तितली बोली-
क्यों न उड़ूँ आज़ाद
सन्नाटा छाया।
नारी ने किया-
सत्य का साक्षात्कार 
जग को चुभा।
बेटी नभ में 
जग का बोझ धरे
उड़ान भरे।
नदी झूमती
पार कर त्रासदी 
नभ चूमती।
कंटक पथ
हैरानी में दुनिया 
जीत रही स्त्री।
दम्भ से मुक्त 
विश्वास ही विश्वास 
नारी की सदी।
रोज़ छूती स्त्री 
हिमालय की चोटी
बिन बताये।
पीड़ा की यात्रा 
फिर भी असीमित
प्रेम की मात्रा।
धरा खोजती
चाँद के आर-पार
अस्तित्व-नद।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Tuesday, 5 January 2021

पीड़ा - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(1)
भीतर पीड़ा बाहर पीड़ा, कितनी पीड़ा है जग में।
पीड़ा की शासन-सत्ता है, पीड़ा बहती रग-रग में।
बंदी रवि है, राजा तम है, कण्टक बिखरे मग-मग में।
इस पीड़ा को दमन करूँ मैं, इतिहास रचूँ पग-पग में-
ख़्वाहिश लेकर जीता हूँ
रोज़ हलाहल पीता हूँ।

पीड़ा मेरी सहचरी बनी,
मैं पीड़ा संग इठलाता हूँ।
पीड़ा से मेरा नाता है,
इसमें अपनापन पाता हूँ।

पीड़ा सिखलाती समर मुझे,
पीड़ा देती रसबोध मुझे।
पीड़ा जीना समझाती है,
पीड़ा से मिला प्रबोध मुझे।

मैं पीड़ा तजकर चलूँ किधर,
यह हर पल साथ निभाती है।
पल भर की साथी हैं खुशियाँ,
पीड़ा ही साथ निभाती है।

पीड़ा चलती है जब तनकर,
सुख जाने जाता भाग किधर।
जिधर दिखायी देती पीड़ा,
सुख कभी न आता पास उधर।

मिट्टी से मिलती जब पीड़ा,
तब मोक्ष मनुजता पाती है।
चरम बिन्दु पर जाकर पीड़ा,
जीवन-रहस्य समझाती है।

पीड़ा कविता भी लिखती है,
पीड़ा लिखती है महाकाव्य।
इतिहास सृजन करती पीड़ा
पीड़ा दिखलाती महाभाग्य।

पीड़ा का अपना वैभव है,
यह सँभल-सँभलकर चलती है।
पीड़ा न किसी को छलती है,
पीड़ा तो मिलकर चलती है।

पीड़ा से आह निकलती है,
है यह भी बिल्कुल सत्य कथन।
पीड़ा दृष्टि दिखाती हरदम,
है यह भी बिल्कुल सत्य वचन।

पीड़ा जिसके भी साथ रही,
मनु वह निष्कंटक चला सदा।
पीड़ा से मानव जन्मा है,
पीड़ा ही लेकर पला सदा।

परचम लहराता पीड़ा का-
जब, तब आता सुख पास कहाँ।
सुख का वैभव क्षणभंगुर है,
है दुख में सुख का वास कहाँ।
■ 

Saturday, 19 December 2020

रेत में घर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(क्षणिकाएँ)
समय की 
टेढ़ी चाल ने
अंकुश लगाया,
महल
सपनों का-
भरभराया।
□ □
आँखों ने बुने सपने
ओझल हो गयी
हृदयस्थ गौरैया,
नहीं बनाऊँगा
अब कभी
रेत में घर।
□ □
मौसम काफ़ी सर्द है
और हवाओं में नमी है
जानता हूँ-
बदलेगा यह
आयेगा/जायेगा,
पर टूट जायेगा
सपनों का नीड़
जानता हूँ यह भी।
□ □
खिड़की खुली तो रहेगी
धूप जब चाहे
आये-जाये,
बची रहेगी मुस्कान
तो अवश्य मुस्कुरायेगा-
घरौंदा
आशाओं का।
□ □

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' 
doctor_shailesh@rediffmail.com

[क्षणिका]