Wednesday, 29 April 2020

जा छिपा चाँद

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित 15 हाइकु
*
आ मन नच
नदी-नौका-पर्वत
सपने सच।
*
जल-जीवन
व्यर्थ हैं जल बिन
'शुक्र'-'मंगल'।
*
मैं बढूँ आगे
जल-धार चीरता
सूर्य बुलाता।
*
छीनते हम
धरा के आभूषण
दुखी है सृष्टि।
*
मन-विभोर
छायी है हरियाली
मन ही चोर।
*
मनु-संतति
जोश में होश खोयी
वसुधा रोयी।
*
छाये बादल
मचल गयी निशा
जा छिपा चाँद।
*
सर्वत्र हरा
मगन है किसान
मगन धरा।
*
पानी ही पानी
पोर-पोर उमंग
भोर सुहानी।
*
बीता आषाढ़
मुदित है प्रकृति
पावस ऋतु।
*
किलकारियाँ
प्रकृति की गोद में
नौका भीतर।
*
क्या कर सके
सूरज की तपिश
नौका नदी में।
*
जब बचेंगे
जंगल-जलाशय
बचेंगे हम।
*
छाये बादल
उमस छू-मंतर
मन-कमल।
*
निहित प्राण
बूँद-बूँद जीवन
जल प्रमाण।
*
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com

Thursday, 23 April 2020

सृष्टि मुस्कुरा उठी

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
*
तुमने मुझसे कहा- प्राण हो तुम!
मैंने कहा- तुम चेतना!
एक हो गयी हमारी श्वासों की गति
एक हो गयीं हमारी धड़कनें
परस्पर आबद्ध हो गये-
हमारे संकल्प
हमारी आस्था
और हमारे विश्वास।
सृष्टि मुस्कुरा उठी-
देखकर हमारी जुगलबन्दी,
और मैंने तुम्हारे भाल पर
चिपका दिया रत्नजड़ित बिंदिया
तुम्हारे कपोल हो गये सूर्य की लालिमा से
एक दृष्टि धीरे से मेरी ओर
और मेरी बाँहों में
सम्पूर्ण सृष्टि,
तुम्हारा होना
मेरे होने का प्रमाण है,
बस यों ही रहो मेरे पास।
*

Sunday, 5 April 2020

चलो सजनी दीप बालो : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चलो सजनी
दीप बालो।।

आसुरी शक्तियों ने
फिर से रचा है
षड़यंत्र भीषण,
घुला विष हवाओं में
है हर क्षण यहाँ
इति का निमंत्रण।

बाती बनाओ
घृत-तेल डालो,
चलो सजनी
दीप बालो।।

हम करेंगे संहार
अपने शत्रु का
लेंगे जीत रण,
अपेक्षित संग सबका
सम्भव है यहाँ
श्वासों का वरण।

उर में अलौकिक
संकल्प पालो,
चलो सजनी
दीप बालो।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

Friday, 27 March 2020

जाने कैसा संकट छाया : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

क़ैद गेह में
दुनिया सारी,
जाने कैसा
संकट छाया।
कहो!
चुपचाप
कटेंगे दिन कैसे
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।

अनजाना भय
खा डालेगा,
घोर निराशा
में मत डूबो।
सुनो!
हँसो अलि
फिर से रस घोलो।
चलो!
प्रेम के
कुछ पल जी लें।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

Saturday, 15 February 2020

तुम मेरी राधा : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(10 क्षणिकाएँ)
1-
तुम बस जाती हो
बहुत गहरे अन्तर में 
और मैं 
पढ़ लेता हूँ 
तुम्हारी प्रत्येक चुप्पी,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

2-
देह से परे
बतियाती हैं आत्माएँ
एक-दूसरे के 
हृदय में बैठकर
जन्म-जन्मान्तर से परे,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

3-
तुम बाती 
मैं दीपक 
तुम भाव
मैं बुद्धि,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

4-
मिलो न मिलो
तुम मेरी चेतना 
मैं अविनाशी आत्मा 
हम अभिन्न 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

5-
मैंने अनुभूति की
प्रत्येक पल तुम्हारी 
तुम प्रकृति की संवाहक 
मौन में भी निरन्तर संवाद 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

6-
तुम कहो न कहो
मैंने पढ़ा 
तुम्हारे हृदय में 
अपने अनुराग के अमर पृष्ठ 
हाँ,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

7-
तुम नायिका
मैं नायक
क्षितिज के मुहाने पर 
मिलें शायद
हम कभी या कभी भी नहीं
कामनाओं से परे
आत्माओं का सौन्दर्य 
देता है अलौकिक आनन्द,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

8-
तुम भले हो मुझसे दूर 
किन्तु बतियाती हो
मेरी चेतना से
प्रत्येक क्षण 
समाहित हो मेरी 
प्रत्येक धारणा में,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 

9-
सृष्टि के अस्तित्व में गुँथे 
हम दोनों,
चेतनाविहीन हैं श्वासें 
तुम मेरी आत्मा 
मैं तुम्हारा मन,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा।

10-
मन आह्लादित होता है
बाराम्बार
देखकर हृदय में 
तुम्हारी
रची-बसी प्रतिमूर्ति
अनूठा है
दो आत्माओं का मिलन,
तुम मेरी राधा 
मैं तुम्हारा कान्हा। 
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
doctor_shailesh@rediffmail.com 
[क्षणिका]




Sunday, 2 February 2020

विश्लेषण के क्रम में : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

तुमने कहा-
"जाकर दर्पण में स्वयं को निहारना
आज और सुन्दर दिखायी दोगे।"

मैंने जब
दर्पण में स्वयं को निहारा
दिखायी दी तुम
और तुम्हारी खिलखिलाती मुस्कान।

जानती हो, तुमने कहा-
"देख लिया दर्पण में
स्वयं का स्वरूप
पुरुष प्रकृति से आच्छादित है।"
और मैंने कहा- "हाँ, तुम सही हो।"

जानती हो, विश्लेषण के क्रम में
मैं यह जान पाया कि
सौन्दर्य के दर्शन शास्त्र का
प्रत्येक पक्ष
चेतना के मनोविज्ञान पर
स्पष्ट दृष्टि रखता है।

एक बात और-
तुम यथार्थ हो
और मैं भी,
दर्पण भी भ्रम नहीं है।

आभासी सत्ता से परे
वास्तविक सत्ता के
अस्तित्व को समझना
अति रोमांचकारी है
और इस रोमांचक यात्रा में
तुम मेरी
और मैं तुम्हारा।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र)
पिन कोड- 212601
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