Sunday, 6 November 2022

समय के प्राचीर पर : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

[३ क्षणिकाएँ]
कोमल संवेदनाओं के 
बिन्दु-बिन्दु 
यथार्थ की सतह पर आकर
मिट गये, 
उमड़-घुमड़ रहा है
अश्रु-सरिता के तट पर 
भावनाओं का प्रबल वेग!
पाषाण हो गयीं
भावनाएँ,
टूट कर 
बिखर गये-
युग-युगों के 
संकल्प!
अहंकार का 
झंझावात 
आया,
उड़ा ले गया
समय के प्राचीर पर
श्रम से   बनाया
नेह का छप्पर!
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
veershailesh@gmail.com

Sunday, 16 October 2022

बिल्ली गयी तिहाड़ : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

जब-जब जागी अस्मिता, तिनके बने पहाड़।
चूहों ने हड़ताल की, बिल्ली गयी तिहाड़।।

कहें भेड़िये तो कहें, सोलह दूनी आठ।
पढ़ते हैं अब मेमने, गिनतारा के पाठ।।

हवा मुड़ी तो मुड़ गये, रँगे-पुते किरदार।
टूटा पत्ता अडिग था, चुना गया सरदार।।

मुख में कालिख पोतकर, भागा उल्टे पाँव।
आज सत्य ने झूठ का, चित्त किया हर दाँव।।

आयी हिरनी सामने, रख दी अपनी बात।
गया भेड़िया जेल में, बदल गये हालात।।

दीवारों से क्यों लड़ूँ, हर खिड़की स्वच्छन्द।
हाथ लिये हूँ चाबियाँ, कर दूँगा पट बन्द।।

बड़े हुए, तुम कह रहे, बेच-बेचकर इत्र।
होगा पर्दाफ़ाश तो, क्या बोलोगे मित्र।।

छोड़ा कभी न हौसला, लगा न जीवन भार।
कंटक पग-पग थे बिछे, फिर भी पहुँचा पार।।

अविचल था जलधार में, 'वीर' धीर था छत्र।
बहे वेग के संग सब, दुर्बल-निर्बल पत्र।।

चार घड़ी की बात है, दुनिया लेगी नाम।
आया आधी रात में, सूरज का पैग़ाम।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Monday, 15 August 2022

राष्ट्रीय चेतना के हाइकु - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'


मिली आज़ादी
भारत माँ के लाल
हुए शहीद।

मन तिरंगा
है प्रत्येक उर में
प्रेम की गंगा।

सपने व्योम 
आज़ादी है अमृत 
संकट मोम।

पीढ़ियाँ होम
तब जाकर दिखा
मुक्ति का व्योम।

जोश में मिट्टी 
हवा में लहराया
जब तिरंगा।

अखण्ड स्वर
आज़ादी के मायने
सम्प्रभु राष्ट्र।

गर्वित राष्ट्र
रोम-रोम उल्लास 
जय भारत।

अतुल्य गाथा
भारत अद्वितीय 
नत है माथा।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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Thursday, 21 July 2022

लघुकथा/नवजीवन - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

"तुम लोग कुछ और क्यों नहीं करते? यों ताली पीटकर और गा-बजाकर कब तक काम चलेगा? समय के साथ बदलते क्यों नहीं?" लड़का होने की आहट पाकर घर आयी किन्नरों की टोली को मोटा शगुन देते हुए आरव ने एक प्रश्न हवा में उछाल दिया तो एक किन्नर ने उत्तर भी दे दिया- "और हम कर भी क्या सकते हैं? हमारे घरवाले हमारे सगे तो अपने हुए नहीं। और तुम कहते हो कि", तभी दूसरा किन्नर बोल पड़ा- "बाबू! आपका इतना बड़ा बिज़नेस है, आप ही कोई काम दे दो। हम छोड़ दें ये सब। हम सब गँवार नहीं, कुछ पढ़े-लिखे भी हैं।" आरव के चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगीं कि टोली में से एक किन्नर और बोल पड़ा- "साहब! आपका समाज हमें बख़्शीश तो दे सकता है, पर पेट भरने के लिए कोई काम नहीं।" 

पास बैठी आरव की माँ भी बोल पड़ी- "जब तूने प्रश्न किया था तो अब इनको उत्तर भी दे।" "इस टोली के सभी सदस्य आज अभी से मेरी कम्पनी के इम्पलॉयी होंगे। काम का बँटवारा कल कर दूँगा।" आरव के इतना कहते ही नवजात शिशु का क्रन्दन वातावरण में अलौकिक मिठास घोलने लगा। मानो नवजीवन के उत्सव में आकाश से पुष्पवर्षा हो रही थी।

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Sunday, 10 July 2022

लघुकथा/दुआएँ - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

चारबाग़ बस-स्टैण्ड से निकलकर बस बँगला बाज़ार आकर रुकी थी कि सवारियों के साथ-साथ दो किन्नर भी आ गये। दुआओं के बदले सभी से बख़्शीश लेने लगे। कुछ ने बख़्शीश दी और दुआएँ लीं तो कुछ ने मुँह चुरा लिये। कुछ ने अपने चेहरे चौड़े किये और तरह-तरह की बातें करने लगे। 

अब तक एक किन्नर पीछे की सीट पर बैठे दिनेश बाबू तक पहुँच गया था। "ऐ गुमसुम बाबू! कुछ दो।" वे अपने में ही खोये रहे और कुछ नहीं बोले। "अरे बाबू! इतना उदास क्यों।" "कोई बात नहीं। माता रानी सब दुख हर लें और सदा ख़ुश रहो आप, मेरी दुआ है।" इतना कहकर किन्नर जैसे ही मुड़ा, भतीजे की मौत से टूटे हुए दिनेश बाबू उसके हाथ में  दो सौ की नोट रखते हुए फफक पड़े- "माता रानी तुम्हें भी ख़ुशहाल रखें मेरे बच्चे।"

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Wednesday, 6 July 2022

लघुकथा/राजकुमार मिल गया - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

"देखो मेरा पीछा मत करो, तुम कल वहाँ मिले थे और आज यहाँ। तुम चाहते क्या हो!" एक श्वास में मीना विजेन्दर से कह गयी। "यही कि तुमसे मोहब्बत है हमें और यही कि तुम्हें अपना बनाना है।" विजेन्दर ने भी अपने मन की उसे बता दी। 
"देखो तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ।" 
"ख़ूब जानते हैं। दरोगा साहब की बेटी हो और कौन हो! हम बचपन से तुम्हारे दीवाने हैं। हिम्मत जुटाकर कल से तुम्हारा पीछा कर रहे हैं और तुम हो कि बात ही नहीं करती।"
"पर तुम नहीं जानते कि"
"कि दरोगा साहब हमारी हड्डी-पसली एक कर देंगे और क्या!"
"वह बात नहीं!"
"तो फिर"
"मैं किन्नर हूँ।" पहली बार अपने जीवन का अधूरा सच मीना किसी से एक झटके में कह गयी।
विजेन्दर एकटक उसे देखने लगा और बुदबुदाया- "पर तुम तोऽऽऽ"
उसे बीच में रोकते हुए मीना बोल पड़ी-
"प्यार तो अब तुम्हारा हवा हो गया होगा!"
"बिलकुल नहीं। तुम हाँ कह दो, तो सारी दुनिया एक ओर। मैं और तुम एक ओर।" इस बार एक श्वास में विजेन्दर बोल गया। 
मीना ने देखा कि आसमान झुक कर उसका अभिनन्दन कर रहा था। उसने झटपट पर्स से अपना मोबाइल निकाला और उधर से हैलो का स्वर सुनायी पड़ते ही चहक कर बोल पड़ी- "राजकुमार मिल गया पापा।"

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Sunday, 1 May 2022

श्रमिक दिवस : तीन ताँका - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

खोजता श्रम 
ईंट-रोड़ों के बीच
रोटी का हल,
देह हुई विदेह
भूख नीलकमल।
खोजतीं नित्य
सुलगती हड्डियाँ
रोटी के मंत्र,
मगन अर्थशास्त्र
मगन लोकतंत्र।
पेट में पीठ
या है पीठ में पेट
सभ्यता ढीठ,
श्रमिक का संत्रास 
बाँच सकता काश।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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