Tuesday, 29 March 2022
पीड़ा जीवन-दृष्टि है : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे
Sunday, 27 March 2022
अभी यहाँ मत आना : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
आवृत होती है
कछुए की गति की भाँति
उमड़ती भावनाएँ
जा मिलती हैं
खरगोश की भाँति
दौड़ती कल्पनाओं से।
निरावृत होता है सब कुछ
अबोध बालक के
कौतूहलपूर्ण मस्तिष्क की तरह
जारी रहता खेल यथावत्
जब तक नहीं आ जाता
काँव-काँव की टेर लगाता
कौवा मुँडेर पर।
आत्मावलोकन की स्थिति में
खुलते हैं कपाट मस्तिष्क के
पुनर्जाग्रत होती है चेतना
छलछलाने लगती है चिन्तन-धार
लौट आती है खोयी हुई चेतना।
सत्य-असत्य
शाश्वत-क्षणभंगुर
सर्वस्व स्पष्ट हो जाते हैं
लौकिक माँ के
अलौकिक स्वरूप की तरह
औचित्यहीन हो जाती हैं
जय-पराजय
छू-मन्तर हो जाती हैं
मन की कुण्ठाएँ
झुलस जाता है सारा कलुष
विचारों की सात्विक किरणों से
सिहर जाता है व्योम
और सुनायी देती है
एक तेज़ आवाज़
किसी तारे की
भाई! अभी यहाँ मत आना
जब तक हो सके
धरा पर रहकर
प्रकाश फैलाओ
वहीं टिमटिमाओ।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
Wednesday, 23 March 2022
बाथिंग टब में मौज : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Monday, 7 March 2022
चोका - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
Monday, 28 February 2022
सारा शहर जंगल हो रहा है - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
अर्थव्यवस्था पर हावी है बाज़ारवाद
बिक रही है हर चीज़
बिक रही है देह
बिक रहे हैं
आदमी/औरत/और न जाने क्या-क्या...
सब कुछ सस्ता है
सबसे सस्ता
ईमान है।
सारा शहर जंगल हो रहा है
और जंगल का शेर
तानाशाह हो रहा है
तानाशाह बेच रहा है
सब कुछ
सब कुछ।
मण्डियाँ सजी हुईं हैं
हर चीज़ बिकाऊ है
बोलियाँ लग रही हैं
आम आदमी सिर्फ़ भेड़ है
सुन रहा हूँ कि शेर बेच रहा है
सारा शहर
किसी भूखे भेड़िये के हाथ।
भेड़िये ने कल ही कहा है
कि वह करेगा सुरक्षा
सभी भेड़ों की/बकरियों की/सभी की...
सभी को देगा रोज़गार
और देगा
भूख से तिलमिलाये लोगों को
अनाज,
बैलों को बिना किसी श्रम के
चारा
ऊँटों को राहत की थैलियाँ।
कुछ बता रहे हैं इसे
औद्योगिक क्रान्ति
अर्थशास्त्र का ककहरा न जानने वाले
समझा रहे हैं
नयी अर्थव्यवस्था का गणित
बता रहे हैं अब
ख़ुशहाल हो जायेगा शहर
और सभी के घर
भर जायेंगे
सोने की गिन्नियों से।
शेर बता रहा है
अपने निर्णयों के लाभ और भावी परिणाम
पीटी जा रही हैं तालियाँ
थोक के भाव
भेड़िये की पाकर शह
सियार कर रहे हैं हर ओर
हुआँ-हुआँ
ज़ोर-शोर से,
टीवी चैनलों पर चल रही हैं
'लाइव डिबेट्स'
कि ऐसा होगा
आने वाले दिनों में
शहर का रुतबा।
अब बोली लग रही है शहर की
आसमान का रंग
बदल जायेगा कुछ दिन बाद
अभी
बोलना मना है।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
veershailesh@gmail.com


