Tuesday, 6 August 2019

तीखी बहुत है धारा नदी की - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

तुम हो धड़कन हृदय की
तुम स्थायी संचार हो
इस अनमने मन का
एक तुम उपचार हो
रिमझिम फुहारें
मौसम सुहाना
और तारों का चमकना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

तुम चन्द्रिका हो चन्द्र की
लालिमा सूर्य की
हो परी अम्बर से आयी
सुनो ध्वनि तूर्य की
सुबह प्रश्न था तुम्हारा
प्रेम कहते हैं किसे
अब समझना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

श्वास बनकर चल रही तुम
इतने पास हो
साज जीवन के तुम्हीं से
सच्ची आस हो
कहते किसे हैं
अब समझा
मैं फिसलना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

प्रणय अपना हो सके शायद
अन्तर में गहरे बस सकूँ शायद
अम्बर धरा से मिल सके शायद
महाकाव्य एक नया लिख सकूँ शायद
संशय तनिक हो
सुन लेना सखी
उर का धड़कना,
तीखी बहुत है धारा नदी की
तिस पर तुम्हारा ~ यों मचलना।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'


Wednesday, 31 July 2019

एक 'पूस की रात' - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

अमर कथाएँ दी हमें, गढ़े अमर किरदार।
मुंशी जी साहित्य के, हैं सच्चे सरदार।।

कथाकार सिरमौर वे, उपन्यास सम्राट।
प्रेमचंद बस एक हैं, जैसे व्योम विराट।।

लिखे लेखनी सच सदा, याद रहे यह बात।
सदियों पर भारी पड़ी, एक 'पूस की रात'।।

हरी नोट में ढूँढ़ता, अन्न-वसन भरपूर।
मिला माॅल में कल मुझे, फिर हामिद मज़बूर।।

क़दम हमारे चन्द्र पर, पड़ने को तैयार।
होरी बेबस आज भी, धनिया भी लाचार।।

दुनिया के दुख-दर्द का, जब-जब ढूँढ़ा छोर।
होरी-हल्कू तब यहाँ, मिले मुझे हर ओर।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
31/07/2019

Monday, 1 July 2019

एक वही है सत्ता/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'


सूरज, चंदा, तारे, धरती, भँवरे, जुगनू, फूल। 
पेड़, परिन्दे, पोखर, पर्वत, सागर, नदिया, कूल। 
सारे जग में सत्ता जिसकी, सारे जग का मूल।
कण-कण में है वास उसी का, बिन उसके सब धूल।।

अन्न उसी से, पानी उससे, उससे वेतन-भत्ता। 
चाहे महल-क़िले हों चाहे, मधुमक्खी का छत्ता।
उसकी इच्छा नहीं अगर तो, हिलता कभी न पत्ता। 
जीवन-मौत उसी के हाथों, एक वही है सत्ता।।

एक वही 'अंपायर' यारों, एक वही इकतार।
सब बौने हैं उसके आगे, एक वही सरदार।
शीश झुकाओ उसके आगे, जीवन के दिन चार।
उससे अपनी विनती इतनी, हमें लगाये पार।।

शानो-शौक़त दुनियादारी, रहन-सहन पहनावा।
अपना रोना-हँसना सब कुछ, बस है एक छलावा।
एक वही अस्तित्ववान है, छोड़ो ढोंग-दिखावा।
अपकर्मों से तौबा कर लो, नहीं बाद पछतावा।।

साधू-सन्त-कलंदर हरदम, करते जिसका ध्यान।
छोड़ो मन में पाप बसाना, गाओ उसके गान।
जिसको 'मैं'-'मैं' करते हो तुम, वह केवल अभिमान।
पालनहार वही है जग का, उससे सकल जहान।।

इन्द्रधनुष के रंग उसी से, नीला हो या पीला। 
बारिश, गर्मी, सर्दी हो या, मौसम रंग-रँगीला।
कार्य वही है, कारण भी वह, उसकी ही सब लीला।
उसकी अनुपम आभा से ही, जग दिखता चमकीला।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005

Monday, 17 June 2019

जग ने कहा कबीर - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

कोई बोले फक्कड़ी, कोई कहे कबीर।
एक रूप में सब छिपे, साधू, संत, फ़कीर।।

ढाई आखर बाँचता, हरता जग की चीख।
कहते उसे कबीर हैं, देता अनुपम सीख।।

इधर-उधर भटका बहुत, बाक़ी बचा न धीर।
जब मन मुट्ठी में धरा, जग ने कहा कबीर।।

छल-प्रपंच से जो परे, करे झूठ पर चोट।
जग में वही कबीर है, मन में तनिक न खोट।।

पीड़ा सबकी मेटता, देता सच्ची राह।
उसका नाम कबीर है, जिसे न कोई चाह।।

चिन्तन अमर कबीर का, देता ज्ञान अखंड।
जिसके आगे हो गया, खंड-खंड पाखंड।।

पाकर थोड़ी बुद्धि मैं, बन बैठा हूँ 'वीर'।
समझदार होता अगर, कहते लोग कबीर।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
15/06/2019

Saturday, 18 May 2019

तब जाकर कोई बुद्ध हुआ - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

(1)
पीड़ा से चित् जब क्रुद्ध हुआ।
तृष्णा से जीभर युद्ध हुआ। 
मन दुबक गया यों मुट्ठी में,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

(2)
जब भी अंतस् अवरुद्ध हुआ।
दृढ़ संकल्पों से शुद्ध हुआ। 
तब आर्य सत्य की खोज हुई,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।। 

(3)
माया से क्षुब्ध विरुद्ध हुआ।
तब दर्शन और प्रबुद्ध हुआ। 
आष्टांगिक मार्ग निकल आये,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

(4)
भ्रम में आबद्ध अशुद्ध हुआ। 
तप कठिन किया अनिरुद्ध हुआ।
निर्वाण मिला जब जीते जी,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

(5)
जब मार्ग सत्य का रुद्ध हुआ।
अन्याय-नीति में युद्ध हुआ।
दुख से मुक्ति मिली जन-जन को,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

(6)
ध्यान-कर्म से मन शुद्ध हुआ।
प्रज्ञा से और विशुद्ध हुआ।
जीवन-साधन जब हुए उच्च, 
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

(7)
जब आत्मतत्व परिरुद्ध हुआ।
जीवन का वेग निरुद्ध हुआ।
दर्शन ने पंचशील उपजे,
तब जाकर कोई बुद्ध हुआ।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/05/2019
veershailesh@gmail.com 

Monday, 6 May 2019

कविता दस्तावेज़ है - डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

उसने भेजी
एक प्यारी-सी तस्वीर
ताकि
भागदौड़ के बीच
चलती रहे कविता।

वह जानती है कि
तस्वीर देखकर
मैं लिखूँगा
ज़रूर कोई कविता।

वह जानती है कि
कविता देगी ऊर्जा
मुझे और उसे
हम दोनों को।

वह जानती है कि
ज़रूरी है कविता
आपाधापी के बीच
मन को तरोताज़ा
रखने के लिए।

वह जानती है कि
कविता ज़रूरी है
वर्तमान और भविष्य के लिए।

वह जानती है कि
कविता दस्तावेज़ है
मेरे और उसके होने का,
समय और गाढ़ी अनुभूति को
रेखांकित करती ये कविताएँ
युगों तक नेह और संवेदनाओं का
प्रतिमान बनी रहेंगी
वह जानती है यह बात बख़ूबी!

मैं जानता हूँ उसके मन की ये बातें
तभी तो उसकी हर एक तस्वीर
प्रेरणा है मेरे लिए!!!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
फतेहपुर/उत्तर प्रदेश 
16/04/2019



Tuesday, 16 April 2019

उन गीतों को तुम स्वर देना : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

सखी, तुम अपने हिय की पीर कहो
मैं गीतों में ढालूँगा,
उन गीतों को तुम स्वर देना
सदियों तक गाये जायेंगे।।

आने वाली पीढ़ी
सीख सकेगी
दर्द बाँचना
और दंश से बाहर आकर
खुले गगन में जीना।
सखी, तुम अपने हिय की पीर कहो
मैं गीतों में ढाालूँगा 
उन गीतों को तुम स्वर देना
सदियों तक गाये जायेंगे।।

काँटों से लड़कर
फूल चूमना
ये भी सब सीखेंगे
जब सबकुछ हो अपने विरुद्ध
कैसे जीता जाता महासमर।
सखी, तुम अपने हिय की पीर कहो
मैं गीतों में ढालूँगा
उन गीतों को तुम स्वर देना
सदियों तक गाये जायेंगे।।

जब पीड़ा समुद्र-सी गहरी हो
तब मुस्कानों का अभ्यास निरन्तर
कैसे सम्भव है
इस उपक्रम को सीख सकेंगे
आने वाले कल के लोग।
सखी, तुम अपने हिय की पीर कहो
मैं गीतों में ढाालूँगा 
उन गीतों को तुम स्वर देना
सदियों तक गाये जायेंगे।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
फतेहपुर/उत्तर प्रदेश 
16/04/2019