Wednesday, 17 June 2026

कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता (सरसी और सार छन्द)

ज्ञान बाँटने जो बैठे थे, बाँट रहे पाखंड।
महिमामंडन अंधकार का, मिलना तय है दंड।
कामी कपटी ढोंगी लोभी, ख़ुद को कहें महंत।
जातिवाद का ज़हर घोलते, झूठे हैं ये संत।।

कुछ तो कहते ख़ुद को ईश्वर, कोई भूत भगाये।
कुछ सत्ता के गलियारों में, बैठे धुनी रमाये।
बीज विषमता के कुछ बोते, करते हेराफेरी।
कुछ विनाश की काली छाया, फूँक रहे रणभेरी।।

कोई यहाँ कबीर नहीं है, और नहीं है दादू।
कोई कथा झूठ की बाँचे, करता कोई जादू।
कुछ शासन के एजेंडे की, खिला रहे हैं गोली।
घूम रहे कुछ राज भवन में, कुछ की बिगड़ी बोली।।

झूठी टीका करें शास्त्र की, नहीं जानते मर्म।
ख़ुद को कहते हैं संन्यासी, करते सदा कुकर्म।
करें अधर्मी रोज़ धर्म को, सरेआम बदनाम।
नोटों की गड्डी से जिनके, भरे पड़े गोदाम।।

इधर-उधर की बातें करते, तर्क गढ़ें मनमानी।
छुआछूत को प्रश्रय देते, कहते ख़ुद को ज्ञानी।
उजले वस्त्र पहनकर बैठे, लेकिन मन है काला।
समरसता के शत्रु घूमते, लेकर कंठी माला।।

भेदभाव का पाठ पढ़ाते, चौड़ी करते खाई।
ख़ुद को कहते पर्वत लेकिन, बाकी सबको राई।
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है, सबमें वही समाया।
एक रक्त है हर प्राणी का, एक सभी की काया।।

● डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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ईमेल- veershailesh@gmail.com

Thursday, 14 May 2026

'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : अनकहे प्रश्नों को शब्द देता दोहा-संग्रह/समीक्षक- गरिमा सक्सेना


डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' दोहा छन्द के लिए प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने वाले रचनाकार और सम्पादक हैं। 'नयी सदी के दोहे', 'समकालीन दोहा', 'प्रतिरोध के दोहे' तथा 'सोनचिरैया मौन है' जैसे साझा संकलनों के सम्पादन के साथ उन्होंने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का भी सम्पादन किया है। दोहा लेखन और सम्पादन के साथ दोहा-संग्रहों की समीक्षा और आलोचना की तरफ़ भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इन सभी चीज़ों में जो बातें महत्त्वपूर्ण है, वह है दोहा छन्द के विकास के लिए कार्य और साहित्य एवं समाज के प्रति अपने कर्त्वयों का निर्वहन। अब प्रश्न उठता है कि वे साहित्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कैसे कर रहे हैं? तो इसका उत्तर है- 'समाज की धमनियों में दौड़ते रक्त के तापमान, उसकी टूटन, उसकी विसंगतियों और उसके भीतर पल रहे अनकहे प्रश्नों को शब्द देकर'। जब सत्ता और समाज के गलियारों में एक सोची-समझी चुप्पी ओढ़ ली जाती है, जब प्रश्नों को पूछना देशद्रोह और सच को देखना अपराध मान लिया जाता है, तब कविता प्रतिरोध का सबसे मुखर और स्थायी स्वर बनकर उभरती है। दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' इसी ध्येय को साधकर लिखे गये दोहों का संग्रह है। यह संग्रह अपने समय का एक ज्वलंत दस्तावेज़ है, एक ऐसी चार्जशीट है जो व्यवस्था के हर उस स्तम्भ पर बड़ी बेबाकी से चस्पाँ की गयी है, जो लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में एक धधकता हुआ प्रश्न है—'कब टूटेंगी चुप्पियाँ?' यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस आम आदमी का है जो व्यवस्था के शोर में अपनी आवाज़ खो चुका है। यह उस किसान की पीड़ा का प्रश्न है जिसकी चीख़ें फाइलों में दब जाती हैं, उस युवा का आक्रोश है जिसकी डिग्रियाँ बेकारी की दीमक चाट रही है, उस स्त्री का मौन है जो सम्मान और सुरक्षा के बीच हर रोज़ एक लक्ष्मण रेखा पर चलती है, और उस बुद्धिजीवी का अंतर्द्वंद्व है जो सच बोलने की क़ीमत और चुप रहने के अपराध के बीच पिस रहा है। दोहाकार शैलेष गुप्त 'वीर' इस एक प्रश्न के माध्यम से समूचे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरते हैं। वे उत्तर नहीं देते, बल्कि पाठक को उत्तर खोजने की प्रक्रिया में शामिल कर लेते हैं। वे व्यंग्य की चुटीली ज़ुबान से झकझोरते हैं और कड़वे प्रश्नों से निदान के लिए प्रेरित करते हैं। 

यह संग्रह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि यह जीवन और समाज के लगभग हर उस पहलू को स्पर्श करता है, जहाँ चुप्पी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। शैलेष जी के दोहे एक विशाल कैनवास पर बिखरे हुए हैं, लेकिन जब उन्हें एक साथ पढ़ा जाता है, तो हमारे समय की एक भयावह और यथार्थपरक तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर का सबसे प्रबल और मुखर स्वर राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना का है। शैलेष जी ने समकालीन भारतीय राजनीति के हर पाखंड, हर प्रपंच और हर गिरावट पर निर्मम प्रहार किया है। उनकी दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं है। चुनावों का पाखंड, नेताओं का दलबदल, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, और लोकतंत्र के नाम पर 'भीड़तंत्र' का बढ़ता प्रभाव; सब कुछ उन्होंने अपने इन दोहों में समेट लिया है। चुनाव, जो लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, शैलेष जी की नज़रों में महज़ एक प्रपंच और छलावा बनकर रह गया है। नेता शेर, बाज़, गिद्ध के रूप में शिकारी हैं और भोली-भाली जनता भेड़, बकरी, हिरनी, चिड़िया के रूप में उनका शिकार। यह प्रतीक योजना पूरे संग्रह में बार-बार लौटकर आती है और राजनीतिक शोषण के तंत्र को उजागर करती है-
"आहट हुई चुनाव की, बिछने लगी बिसात।
भेड़ों के घर शेर अब, लगा बिताने रात।"

"करतब ग़ज़ब चुनाव के, अजब वक़्त का फेर।
बकरी के घर बैठ कर, भोजन करता शेर।।"

चुनाव के समय नेताओं द्वारा दलितों और वंचितों के घर भोजन करने का जो नाटक खेला जाता है, उस पर इससे सटीक और तीखा व्यंग्य क्या हो सकता है? वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि कैसे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग 'भीड़तंत्र की रेस' जीतकर व्यवस्था पर क़ाबिज़ हो रहे हैं-
"हत्या डाका रेप के, जिन पर ढेरों केस।
वही जीतते अब यहाँ, भीड़तंत्र की रेस।।"

राजनीति में नैतिकता और सिद्धान्तों के पतन पर वे गहरी चिन्ता व्यक्त करते हैं। दलबदल और अवसरवादिता आज की राजनीति का पर्याय बन चुकी है। एक टिकट कटते ही कैसे निष्ठा और नीतियाँ बदल जाती हैं, इसका चित्रण देखिए-
"अपने दल ने तोड़ दी, टिकट काटकर आस।
झट विपक्ष की नीतियाँ, उनको आयीं रास।।"

"टिकट कटा यह जानकर, हाल हुए बेहाल।
झण्डा बैनर टोपियाँ, बदल गये तत्काल।।"

शैलेष जी की क़लम उस ख़तरनाक प्रवृत्ति पर भी चोट करती है जहाँ सत्ताधारी दल हर आवाज़ को ख़ामोश कर देना चाहता है और मीडिया भी उसके सामने नतमस्तक है। यह चुप्पी ही उनके संग्रह का केन्द्रीय बिन्दु है-
"डरे हुए हैं लोग क्यों, क्यों छाया है मौन?
डरा हुआ है मीडिया, प्रश्न करेगा कौन?"

वे सत्ता को 'गान्धारी' और तंत्र को 'अन्धा' कहते हैं, जो एक शक्तिशाली पौराणिक रूपक के माध्यम से वर्तमान की भयावहता को उजागर करता है। 

राजनीति से इतर शैलेष जी की दृष्टि सामाजिक विसंगतियों पर भी उतनी ही पैनी है। वे देखते हैं कि कैसे आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में हमारे नैतिक मूल्य बौने हो गये हैं और मानवीय सम्बन्ध यांत्रिक हो चले हैं-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारिकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"

इस पतन का सबसे त्रासद प्रभाव पारिवारिक सम्बन्धों पर, विशेषकर वृद्धों की स्थिति पर पड़ा है। संग्रह में अनेक दोहे वृद्ध माता-पिता की पीड़ा, उनकी उपेक्षा और उनके अकेलेपन को मार्मिक अभिव्यक्ति देते हैं। नयी पीढ़ी, जो अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की दौड़ में अंधी हो चुकी है, उन्हें 'पैरों की ज़ंजीर' समझती है। शहरों के छोटे होते फ्लैटों में बूढ़ी माँ के लिए जगह नहीं है, भले ही 'डॉगी या फिर कैट' के लिए हो। यह पीड़ा जब असहनीय हो जाती है तो दो बेटों का बाप स्वयं वृद्धाश्रम की राह पकड़ लेता है। ये दोहे केवल दोहे नहीं, हमारे समाज के हृदय पर लगे गहरे घाव हैं-
"तन उनका लन्दन हुआ, मन पेरिस की शाम।
इधर पड़ी माँ खाट पर, उधर छलकते जाम।।"

शैलेष जी आधुनिक जीवनशैली, पश्चिमीकरण और उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों पर भी प्रहार करते हैं। 'लिव-इन' सम्बन्ध, 'बर्गर-पिज़्ज़ा' वाली खाद्य संस्कृति और 'हिप्पीकट' तथा 'बाली पहने मर्द' वाली फैशन-परस्ती उन्हें चिन्तित करती है। वे इसे 'नयी सभ्यता' कहते हैं, जो हमें 'मटियामेट' कर रही है। यह कोई प्रगतिविरोधी सोच नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने की पीड़ा है।

यदि इस संग्रह की आत्मा को किसी एक चरित्र में खोजना हो, तो वह 'हलधर' या 'किसान' है। 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' में किसान की त्रासदी एक ज़रूरी आवाज़ बनकर बार-बार लौटती है। शैलेष जी ने भारतीय किसान के जीवन के हर दुखते पहलू को छुआ है। वे कर्ज़ का बोझ, साहूकार का शोषण, मौसम की मार, सरकारी उदासीनता और अन्ततः आत्महत्या की विवशता; सब को शब्द प्रदान करते हैं-
"पूछा हमने जब कभी, क्यों हलधर लाचार।
चुप्पी ओढ़े मीडिया, मौन मिली सरकार।।"

"फन्दे पर हलधर मिला, उड़े न्याय के होश।
बादल पाला बिजलियाँ, हुए सभी ख़ामोश।।"

नारी विमर्श शैलेष जी की कविता का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है। वे स्त्री के प्रति समाज के दोहरे मापदंडों और पाखंड पर कठोर प्रहार करते हैं। एक ओर पोस्टरों पर 'नारी बड़ी महान' लिखा जाता है, तो दूसरी ओर 'बाग़ में बेटियाँ, मिलतीं लहूलुहान'। एक ओर नेता भाषणों में 'नारी हित की बात' करता है, तो दूसरी ओर 'नशे में पीटता, पत्नी को हर रात'। यह पाखंड शैलेष जी को सालता है। वे स्त्री के शोषण के विभिन्न रूपों, यथा- घरेलू हिंसा, दहेज़, वासनापूर्ण दृष्टि आदि को उजागर करते हैं-
"जिनके मन में वासना, वे क्या जानें नेह।
मलिन नयन हैं खोजते, हर नारी में देह।।"

लेकिन शैलेष जी केवल स्त्री की पीड़ा का गायन नहीं करते। वे उसकी शक्ति, उसके सामर्थ्य और उसके बदलते स्वरूप को भी रेखांकित करते हैं। आज की नारी अबला नहीं है। वह पढ़-लिखकर रूढ़ियों को तोड़ रही है। जब व्यापार में डूबे पिता अवसादग्रस्त हो जाते हैं, तो बेटी 'तारणहार' बनकर सामने आती है। वह अब सीता की तरह चुपचाप अपमान नहीं सहती, क्योंकि जब राम, राम नहीं रहे तो सीता क्यों सीता रहे-
"मार-पीट सहती नहीं, लगी कमाने दाम।
सीता क्यों सीता रहे, राम नहीं जब राम।।"

यह स्त्री चेतना का नया और सशक्त स्वर है। शैलेष जी नारी को जीवन का आधार मानते हैं, वह 'दया-धर्म की खान' है, 'शुभ की मित्र है, और शोक की शत्रु'। वे उसके समग्र रूप को चित्रित करते हैं। एक माँ, एक बेटी, एक पत्नी और एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के रूप में नारी उनके दोहों में स्थान पाती है।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा है शैलेष जी ने 'दि अण्डरलाइन' पत्रिका के पर्यावरणीय दोहा विशेषांक का सम्पादन किया है। यह कार्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण के प्रति बढ़ता संकट वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चिन्ता का एक प्रमुख विषय है। ऐसे में वे औरों को प्रेरित करने के साथ स्वयं भी इस विषय पर दोहे लिखकर लोगों को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि 'विकास' के नाम पर कैसे विनाश को आमंत्रित किया जा रहा है। जंगल, झीलें, तालाब और पहाड़; सब बिक रहे हैं। तालाबों को पाटकर मॉल बनाये जा रहे हैं और शहर इसका कोई जवाब नहीं देता। वह बस ज़हरीले परिवेश में रहने के लिए हमें बाध्य करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

शैलेष जी की कविता में प्रकृति एक जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव इकाई है, जिसकी अपनी भावनाएँ हैं। वे चेतावनी देते हैं कि प्रकृति से यह छेड़छाड़ अन्ततः सभ्यता के विनाश का कारण बनेगी-
"क़ुदरत को मत छेड़िए, ठीक नहीं यह रोग।
डूब मरेगी सभ्यता, नहीं बचेंगे लोग।।"

उनके पर्यावरण-सम्बन्धी दोहे आज के युग के लिए एक गम्भीर चेतावनी हैं, एक अपील हैं कि हम समय रहते चेत जायें, अन्यथा भविष्य हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। 

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की काव्य-कला की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सादगी और संप्रेषणीयता है। उनकी भाषा आम आदमी की भाषा है। वे पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि अपनी बात को सीधे और स्पष्ट रूप से कहते हैं। वे 'मॉल', 'शिफ्ट', 'चैट', 'ईमेल', 'फ़िल्टर फ़ोटो', 'लाइव डिबेट' जैसे आज के शब्दों को दोहे के पारम्परिक अनुशासन में इतनी सहजता से पिरोते हैं कि छन्द की गरिमा भी बनी रहती है और दोहे अपने समय से कटते भी नहीं। यह उनकी काव्य-कला का प्रमाण है। उदाहरण के लिए इस दोहे को देखें-
"आते हैं जब सामने, करें न कोई बात।
मोबाइल से भेजते, सन्देशे दिन-रात।।" 

यह दोहा आज के डिजिटल युग में मानवीय सम्बन्धों के खोखलेपन को जितनी सरलता और गहराई से व्यक्त करता है, वह अत्यन्त प्रभावी है। 
उनकी दूसरी बड़ी विशेषता है सटीक और धारदार बिम्बों का प्रयोग। वे अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए शक्तिशाली प्रतीक चुनते हैं, जो तुरन्त पाठक के मन में एक स्पष्ट चित्र उकेर देते हैं। राजनीति के जंगल में 'शेर', 'भेड़िये', 'गिद्ध', 'बाज' और 'मगरमच्छ' जैसे हिंसक जीव शोषक वर्ग के प्रतीक हैं, तो 'भेड़', 'बकरी', 'हिरनी', 'चिड़िया' और 'मीन' जैसी निरीह प्रजातियाँ शोषित और आम जनता की प्रतीक हैं। यह प्रतीकात्मकता उनके दोहों को एक सार्वभौमिक और कालातीत अपील प्रदान करती है।

अन्त में इस समीक्षा का सार प्रस्तुत करते हुए मैं इतना ही
कहूँगी कि शैलेष जी के दोहे हमें बेचैन करते हैं, हमें क्रोधित करते हैं, हमें दुखी करते हैं, लेकिन वे हमें निराश नहीं करते। हर दोहे के अन्त में एक अनकहा विश्वास छिपा है कि यह चुप्पी टूटेगी। यह संग्रह स्वयं उस चुप्पी को तोड़ने की दिशा में एक साहसिक और शक्तिशाली क़दम है। यह एक सवाल नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। मैं पूरे विश्वास के साथ इस महत्त्वपूर्ण कृति का स्वागत करती हूँ और उम्मीद करती हूँ कि यह हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनायेगी।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
गरिमा सक्सेना
(संपादक-दोहे के सौ रंग)
ई-109 श्री बालाजी सरीन अपार्टमेंट, अनन्तपुरा रोड, यलहंका, बेंगलुरु (कर्नाटक)
पिन कोड- 560064
मोबाइल- 7694928448

Tuesday, 21 April 2026

दोहों में ढला युगबोध: 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' का समीक्षात्मक पाठ/समीक्षक- डॉ. नीलू अग्रवाल

इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है। 

यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम। 
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।" 

एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।" 

अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान। 
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"

गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"

शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"

छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है- 
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल। 
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"

दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
 
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"

पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग। 
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"

दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।" 

किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"

कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर। 
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"

या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान। 
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।

ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"

एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात। 
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।

अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094

Wednesday, 25 February 2026

मेरी प्यारी बिटिया रानी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

दीवारों पर चित्र बनाये,
मुझको अपना मित्र बताये।
बातें करती बनकर नानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

तुतली बोली मन को भाती,
गोदी में आ प्यार जताती।
फ्रॉक पहनती अक्सर धानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

जाती रहती सर्कस-मेला,
ख़ूब मज़े से खाती केला।
मुझसे सुनती रोज़ कहानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
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घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता


सुबह-सुबह उठ जाती बिटिया। 
घर-आँगन महकाती बिटिया।
फूली नहीं समाती धरती, 
हँसकर जब बतियाती बिटिया।

उर में आस जगाती बिटिया।
कोयल जैसा गाती बिटिया।
परियों की शहज़ादी लगती, 
मन को बहुत लुभाती बिटिया।

दुख में सुख भर लाती बिटिया।
दो-दो कुल की थाती बिटिया।
ख़ुशियों का संसार बसा कर,
सबकी प्रिय बन जाती बिटिया।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता


पापा बोले बिटिया से,
जीवन में ख़ुश रहना है।
सोच समझकर बतलाओ,
जो कुछ तुमको बनना है।

प्यारा देश हमारा है,
सीमा पर मैं जाऊँगी।
बिटिया बोली पापा से,
फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी।

दुश्मन आँख तरेरेगा,
उसको मार भगाऊँगी।
मैं भारत की बेटी हूँ,
परचम फिर लहराऊँगी।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- veershailesh@gmail.com

Sunday, 15 February 2026

मालपुआ खाकर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ


वे 
दूध में पानी मिलाते हैं,
और फिर
दूध का दूध 
पानी का पानी 
चाहते हैं!

उत्कोच में डूबी व्यवस्था 
निकम्मों कों
कर्मठता का पर्याय 
बता रही है,
जनता 
अपने फ़ैसले पर
पछता रही है!

बड़ी उम्मीदों के साथ
जनता ने अपना
जनप्रतिनिधि चुना,
जनप्रतिनिधि
मालपुआ खाकर
उड़ता बना!

जो कभी क्लासरूम नहीं गये 
बच्चों का हक़ खा गये,
शिक्षक दिवस के अवसर पर 
वे भी पुरस्कार पा गये!

वह ताउम्र बॉस को 
रिश्वत देता रहा, 
बॉस उसे 
सहूलियत 
देता रहा!

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Tuesday, 20 January 2026

मही मिली यों व्योम से/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे


धूप गुनगुनी कर रही, यादों से संयुक्त।
मन सरसों के बाग़ में, घूम रहा उन्मुक्त।।

ऋतुपति के सान्निध्य में, नयन करें संवाद। 
आहट अन्तर में हुई, एक सदी के बाद।।

दृष्टि पड़ी ऋतुराज की, उर ने गाये गीत।
पृष्ठ-पृष्ठ अनुभूति का, हुआ गुलाबी मीत।।

मही मिली यों व्योम से, मुस्काये रतिराज।
उर में गहरी प्रीति के, उड़ने लगे जहाज।।

कहे प्रिया से 'वीर' कब, अपने मन की बात।
जादू किया वसंत ने, प्रति पल हुआ प्रभात।।

कुसुमाकर कौतुक करे, चले अनोखी चाल।
छुआ नहीं हमने उन्हें, हुए गुलाबी गाल।।

पीतवसन धरती हुई, धवल हुआ आकाश।
पिकानन्द की छाँव में, थिरक रहे भुजपाश।।

जीवन रहते कब हुआ, इच्छाओं का अंत।
उमड़े बादल नेह के, छाया हृदय वसंत।।

धूप सुहानी पूछती, बीते कल की बात।
छेड़ रहा मधुमास फिर, देकर नया प्रभात।।

परिवर्तन की चाह में, आया है मधुमास।
धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
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Monday, 29 December 2025

जैसे फिरकी नाचती/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।

बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।

बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।

तब पासे का खेल था, अब गोली-बन्दूक।
मदद माँगती द्रौपदी, सभा आज भी मूक।।

देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।

कोस रहे हैं देश को, बात-बात पर क्रुद्ध।
'आज़ादी' के नाम पर, बैठे हुए 'प्रबुद्ध'।।

कल तक बैठे साथ जो, आज हुए उस ओर।
कितनी मैली हो गयी, राजनीति की डोर।।

किये बहाना ठण्ड का, साहब पड़े अचेत।
फत्तू फटी कमीज़ में, जोत रहा है खेत।।

वोटतंत्र ने जड़ दिया, लोकतंत्र पर कील।
हंसों का हक़ ले उड़े, बाज़ गिद्ध औ' चील।।

सुधरेंगे हालात कब, पूरे होंगे स्वप्न।
कुर्सी का मुख बन्द था, जब-जब पूछा प्रश्न।।

छीना मुख का कौर फिर, जंगल और ज़मीन।
अब कुर्सी बतला रही, हलधर बेबस दीन।।

ज़ालिम उनके हाथ से, रहे निवाला छीन।
जिनके बल पर हो गये, सत्ता पर आसीन।।

देखे महलों की तरफ़, आते हुए किसान।
कील ठोंककर छिप गये, सभी सियासतदान।।

मगन रहे हम जश्न में, सिर पर चद्दर तान।
दुविधा में जीते मिले, पल-पल यहाँ किसान।।

फन्दे में फिर चढ़ गया, बेबस एक किसान।।
सूदख़ोर ने जब धरे, गिरवी खेत-मकान।।

कहीं बाढ़ सूखा कहीं, कहीं तुषारापात।
मौसम भी अक्सर करे, हलधर के सँग घात।।

काश गेह के वास्ते, ला सकता परचून।
हरिया खाकर सो गया, फिर से रोटी-नून।।

हल से हलधर ने लिखे, जीवन के उत्कर्ष।
संकल्पों के सामने, बौने सब संघर्ष।।

बेमौसम बारिश हुई, फ़सल हुई बेकार। 
टूट सगाई फिर गयी, बिटिया की इस बार।।

पीतवसन में देखकर, दुनिया समझे भक्त।
अत्याचारी पी रहा, निर्दोषों का रक्त।।

जिया अभावों में सदा, रहा उगाता अन्न।
लाश झूलती देखकर, हुए पड़ोसी सन्न।।

हलधर क़ीमत वोट की, शायद पायें जान।
पाँच बरस पूरे हुए, बँटा नहीं अनुदान।।

जैसे कोई भीख हो, देते यों अनुदान।
सत्ता करती मसख़री, हम रहते अंजान।।

वोटतंत्र ने फिर किये, वादे एक हज़ार।
कृषक ठगे-से रह गये, बनी नयी सरकार।।

उधर सड़क पर लाठियाँ, इधर प्रीत के बोल। 
समाधान के नाम पर, केवल टाल-मटोल।।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.) 
पिन कोड- 212601
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Sunday, 21 December 2025

भीत में चुना गया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के हाइकु

आपाधापी में
बार-बार बचा 'मैं'
खोये 'अपने'।

ज्यों का त्यों 'राँझा'
बदल गयी 'हीर'
पीर ही पीर।

बालू में ढेर
नहा कर निकले
कागजी शेर।

मासूम चूहे
बिल्ली पर झपटे
जान के लाले।

वक़्त ने कूटा
टक्कर पहाड़ से
पसीना छूटा।

कौन अपना?
भीत में चुना गया
हर सपना।

मिली है सीख
पर हो गया जब
लाख से लीख।

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
सम्पर्क: 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिनकोड: 212601
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Sunday, 23 November 2025

बुद्धू/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की लघुकथा

"पुस्तक मेले में तुम आज जा रहे हो न।"
"हाँ! उर्वशी।"
"गिरीश! मैं नहीं आ पाऊँगी, पर अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहूँगी वहाँ।"
"वह कैसे?"
"अपना दिल लेकर नहीं जा रहे क्या?"
"नहीं। वह तो तुम्हारे पास है।"
"पर मेरा तो तुम्हारे पास है न, तो मैं तो वहीं रहूँगी।"

कुछ देर तक खिलखिलाहट दोनों ओर अपना डेरा जमाये बैठी रही। फिर उर्वशी बुदबुदायी, "बुद्धू! अब तुम्हें तैयार नहीं होना क्या? फोन रक्खो और जाओ।"

© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
सम्पर्क: 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
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Wednesday, 29 October 2025

'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : दोहों में बोलता यथार्थ/समीक्षक- हरकीरत हीर


पिछले दिनों चर्चित दोहाकार डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी का सद्यः प्रकाशित दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' मिला। पढ़कर आनन्द आ गया। निस्सन्देह! संग्रह के सभी दोहे एक से बढ़ कर एक हैं। हिन्दी काव्य की इस अनुपम विधा 'दोहा' का अपना अलग ही सौन्दर्य है, जिसे प्रस्तुत करने में शैलेष जी सिद्धहस्त हैं। आरम्भ के दोहे ने ही मन मोह लिया-
"पढ़कर वे दो पोथियाँ, कथा रहे हैं बाँच।
ख़ुद को हीरा कह रहे, रंग-बिरंगे काँच।।"

समकालीन हिन्दी साहित्य में जहाँ रचना की बाह्य भव्यता और भाषिक कौशल पर अधिक ज़ोर दिया जा रहा है, वहीं डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह दोहा-संग्रह "कब टूटेंगी चुप्पियाँ" उस संवेदनात्मक और वैचारिक ईमानदारी का दस्तावेज़ है, जो साहित्य को केवल सौन्दर्य की वस्तु न मानकर उसे सच कहने का माध्यम बनाता है-
"बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।"

डॉ. शैलेष की भाषा क्लिष्ट नहीं, बल्कि ज़मीनी है- सीधी, सच्ची और चुभती हुई। यह भाषा आमजन की व्यथा भी है और विद्रोह भी। दोहों की पारम्परिक शैली को उन्होंने इस संग्रह में एक नया सामाजिक-राजनीतिक स्वर दिया है-
"चार-चार एसी चलें, शातिर कटियाबाज़।
'बिल' भरने के नाम पर, दब जाती आवाज़।।"

ऐसे दोहे व्यवस्था की उन दरारों पर प्रश्न उठाते हैं, जिन्हें अक्सर शाब्दिक सौन्दर्य के नीचे दबा दिया जाता है। संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका विषय चयन है। राजनीतिक विसंगतियाँ, स्त्री-विरोधी मानसिकता, धार्मिक कठमुल्लापन, भ्रष्टतंत्र, सामाजिक असमानताएँ और जन-अधिकार — सभी पर गहरी पकड़ और स्पष्ट दृष्टि दिखती है-
"माँ अक्सर तब सोचती, ले जायें यमदूत।
जब औरत के सामने, झिड़की देता पूत।।"

यह दोहा नारी के आत्मसम्मान पर होने वाले मौन आघातों की मार्मिक प्रस्तुति है। डॉ. शैलेष के दोहे कोई आदर्शवादी कल्पनालोक नहीं रचते। वे सच्चाई की कड़वी परतें खोलते हैं-
"बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।"

दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' की कलात्मक उपलब्धि यह है कि यहाँ दोहे केवल तथ्य नहीं गिनाते, बल्कि भाव जगा कर पाठक के भीतर बेचैनी और चेतना दोनों उत्पन्न करते हैं; कभी चुटीले व्यंग्य में, कभी गहरी संवेदनाओं में, और कभी एक निर्भीक प्रतिरोध में। ये दोहे मौन समाज को झकझोरने की चेष्टा हैं-
"बापू जाता बार में, बेटा करता डेट।
नयी सभ्यता कर रही, हमको मटियामेट।।"

"गिद्धों ने की पैरवी, बाज़ गये फिर जीत।
फिर नोचेंगे पंख अब, चिड़िया है भयभीत।।"

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' केवल दोहे नहीं लिखते, वे एक सांस्कृतिक कर्मयोगी हैं। तीस से अधिक भाषाओं में अनुवाद, अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी, और साहित्य को जनचेतना से जोड़ने का यह प्रयास उन्हें समकालीन हिन्दी साहित्य में विशिष्ट बनाता है। उनकी कविता "बीकम फायरफ्लाई" का इज़राइल की शान्ति प्रदर्शनी में चयन इस बात का संकेत है कि उनका लेखन देशकाल की सीमाओं से परे जाकर मानवता की आवाज़ बनता है।

"कब टूटेंगी चुप्पियाँ" एक ऐसा संग्रह है; जो बताता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सच्चाई को उजागर करने की ज़िम्मेदारी भी निभा सकता है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए अमूल्य है, जो आज के भारत को उसके असली चेहरे के साथ जानना चाहते हैं। जो दोहों में केवल छन्द नहीं, बल्कि विचार और विरोध भी तलाशते हैं। जो साहित्य को एक सामाजिक हस्तक्षेप मानते हैं, न कि केवल एक व्यक्तिगत रचनात्मकता। दोहाकार डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि जब साहित्य चुप नहीं रहता, तभी समाज की चुप्पियाँ टूटती हैं। मैं इस संग्रह के लिए उन्हें हार्दिक बधाई देती हूँ।

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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
हरकीरत हीर
18 ईस्ट लेन, सुन्दरपुर
हाउस न. 5, गुवाहाटी (असम)
पिन कोड- 781005
मोबाइल- 8638761826

Tuesday, 28 October 2025

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' : संक्षिप्त परिचय

■ नाम:- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

■ जन्म:- 18 जनवरी, 1981
ग्राम- जमेनी, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

■ माता/पिता:-
श्रीमती रामा गुप्ता/श्री राम रतन गुप्त 

■ शिक्षा:-
परास्नातक (प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विज्ञान), पी-एच.डी. (पुरातत्व विज्ञान), यूजीसी-नेट, एम.जे.एम.सी., बी.एड., डिप्लोमा इन रसियन लैंग्वेज़, डिप्लोमा इन उर्दू लैंग्वेज़, ओरियन्टेशन कोर्स इन म्यूज़ियोलॉजी एण्ड कन्ज़र्वेशन।

■ प्रकाशन/सम्पादन :- 
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, बिन्दु में सिन्धु, उन पलों में, शब्द-शब्द क्षणबोध, आर-पार, कई फूल - कई रंग, बार्ड्स ऑफ इलूमिनेश्‌न्‌स, कविता दस्तावेज़ है, डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य, रघुविन्द्र यादव के दोहा-सृजन के विविध आयाम, फतेहपुर जनपद के हाइकुकार, व्यंग्य-क्षणिका काव्य के पुरोधा डॉ. परमेश्वर गोयल उर्फ़ काका बिहारी, डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के सौ शेर, समकालीन क्षणिकाकार, नयी सदी के दोहे, समकालीन दोहा, प्रतिरोध के दोहे, सोनचिरैया मौन है, क्षणिका काव्य के हस्ताक्षर, इस दुनिया में तीसरी दुनिया, दि अण्डरलाइन क्षणिका विशेषांक, दि अण्डरलाइन पर्यावरणीय दोहा विशेषांक, समकालीन सांस्कृतिक प्रस्ताव दोहा विशेषांक, अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक, अन्वेषी के कई वार्षिकांक तथा कुछ अन्य।

■ अनुवाद:-
अब तक तीस से अधिक भाषाओं में आपकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं यथा ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, चाइनीज, रसियन, स्पेनिश, अज़रबैजानी, हिब्रू, पुर्तगीज, इटैलियन, अल्बानियन, तुर्किश, अरेबिक, पर्शियन, सर्बियन, क्रोशियन, नेपाली, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी, असमिया तथा राजस्थानी आदि में कविताओं का निरन्तर अनुवाद।

■ प्रसारण:-
रेडियो 103 एफएम, इज़राइल और द डियर जाॅन शो, वारिंगटन, इंग्लैंड में कविता का प्रसारण और स्टोरीफेस्ट 2023, मैक्सिको, ग्रीस, रसिया में लघुकथा का प्रसारण।

■ सृजन-विधा:-
* हिन्दी में- गीत, ग़ज़ल, कविता, दोहा, क्षणिका, हाइकु, ताँका, सरसी, सार, लघुकथा तथा समीक्षा आदि।
* अंग्रेज़ी में- हाइकु, ताँका, फ्रीवर्स, क्वेश्चनकु, मिरर पोयम, माइक्रोपोयम्स, जनाकु, शार्ट स्टोरी आदि।

■ कुछ अन्य विशेष तथ्य:-
* विभिन्न पत्रिकाओं यथा अन्वेषी, गुफ़्तगू, अनुनाद, अरण्य वाणी, तख़्तोताज, मौसम, शब्द-गंगा आदि के लिए पूर्व/वर्तमान में सम्पादन, सहसम्पादन एवं कार्यकारी सम्पादन।
* स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की पत्रिका 'जन स्वास्थ्य धारणा' के परामर्श मंडल में शामिल।
* हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा उर्दू की देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं, वेबपत्रिकाओं आदि में और विविध संकलनों में पद्य एवं गद्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 
* हिन्दी और अंग्रेज़ी की दो सौ से अधिक पुस्तकों के लिए भूमिका/विमर्श/समीक्षा/आलोचना आदि प्रकाशित। 
* चर्चित लघुकथा 'छंगू भाई' पर इसी नाम से एफ. बी. इन्टरनेशनल मूवीज द्वारा लघु फ़िल्म का निर्माण।
* जून-2024 में कविता 'बीकम फायरफ्लाई' को इज़राइल की दि एयरफोर्स गैलरी में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी 'बटरफ्लाइज ऑफ पीस' में विश्व के इक्कीस समकालीन प्रतिष्ठित एवं प्रतिभावान कवियों की कविताओं के साथ प्रस्तुत किया गया।
* विभिन्न सामयिक साहित्यिक मुद्दों पर देश के अनेक शीर्ष साहित्यकारों/विद्वानों के साथ परिचर्चाएँ/चौपालों का संयोजन/प्रकाशन भी आप के माध्यम से किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त आपने साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न नामचीन हस्तियों के साक्षात्कार भी किये हैं, जिनमें गोपालदास 'नीरज', बेकल उत्साही, शम्सुर्ररहमान फारुकी, संजय मासूम, अनवर जलालपुरी, माहेश्वर तिवारी, डॉ. मिथिलेश दीक्षित, ज़फ़र इक़बाल 'ज़फ़र', रघुविन्द्र यादव तथा दिनेश शुक्ल आदि के साक्षात्कार प्रमुख हैं।
* सृजन, सम्पादन, समीक्षा, ब्लॉगिंग तथा साक्षात्कार लेखन के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता, इतिहास तथा पुरातत्व विषयक विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों, संगोष्ठियों, शोध-संगोष्ठियों, सम्मेलनों तथा कार्यशालाओं में सहभागिता और प्रस्तुतीकरण।
* एक अनुवादक के रूप में अंग्रेज़ी के कुछ कवियों की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद।
* विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से हिन्दी एवं अंग्रेज़ी माइक्रोपोएट्री पर विशेष कार्य।
* अनेक साहित्यिक संस्थाओं/ पत्रिकाओं आदि में सम्मानित उत्तरदायी पदों पर आसीन। 

■ सम्मान/पुरस्कार:-
बेकल उत्साही सम्मान 2017, साहिर लुधियानवी सम्मान 2021, प्रदेश गौरव सम्मान 2023, टीवी प्रोग्राम यू एण्ड लिटरेचर टूडे, नाइजीरिया द्वारा लिटरेरी आइकॉन 2018, अवधी सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, नेपाल द्वारा अवधी गौरव सम्मान 2025, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत सम्मान 2019, आईएफसीएच, किंगडम ऑफ मोरक्को, द्वारा 'एम्बेसेडर ऑफ़ पीस एण्ड ह्यूमैनिटी' 2024, अकबर इलाहाबादी स्मृति सम्मान 2021, साहित्य श्री सम्मान 2022, द डेली ग्लोबल नेशन समाचार पत्र, बांग्लादेश द्वारा 'पीस एम्बेसेडर' 2024, कलारत्न एवार्ड 2012, सारस्वत सम्मान 2018, बाल मित्र साहित्यकार अवार्ड 2019 तथा सृजनशीलता सम्मान 2017 सहित कुछ अन्य सम्मान।

■ सम्प्रति:-
उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन शिक्षण-कार्य और क्षणिकाकार, माइक्रोपोएट्री कॉस्मॉस तथा द फतेहपुर रिजोल्यूशन का अव्यावसायिक सम्पादन।

■ सम्पर्क:-
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- editorsgveer@gmail.com
ब्लॉग- http://aadmikeaarpaar.blogspot.com और https://poetryshailesh.blogspot.com

Sunday, 12 October 2025

सुबह की तस्वीर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'

मेरे ह्वाट्सएप इनबाॅक्स पर 
सुबह की एक 
प्यारी-सी तस्वीर
चली आयी 
खिलखिलाते हुए,

उसका जादुई चेहरा 
और उसकी आँखों में बसा मैं
प्रभात को दे रहे थे
एक नया आकार,
उसने फिर लिखे
कुछ गुलाबी शब्द
और बढ़ गयीं
दिल की धड़कनें,
वह निहार रही थी
बस मुझे और मुझे,

मैं जानता हूँ कि उसका यों निहारना
मही में भर देगा
ग़ज़ब का आत्मविश्वास
आकाश को कर देगा सतरंगी...
लो! शुरू हो गयी
बादलों की 
आवाजाही,

यह सुबह की तस्वीर भी न!

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
पिन कोड- 212601
मोबाइल- 9839942005
ईमेल- editorsgveer@gmail.com

Tuesday, 7 October 2025

विद्युत गति से बिम्ब रचते दोहों का संग्रह है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ"/समीक्षक- इन्दिरा किसलय


लघु कलेवर में महत्तम भावबोध को ध्वनित करती हुई दोहा विधा हिन्दी साहित्येतिहास के विशाल कालखण्ड पर छायी रही और आज भी ऐश्वर्य से प्रदीप्त है। इसकी उपस्थिति के आदि क्षण को कालिदास कृत विक्रमोर्वशीयम् में चिह्नित किया गया। कथितव्य है कि सिद्ध कवि सरहपा ने नौवीं शताब्दी ई. में प्रमुखता से प्रयुक्त किया। बौद्ध, जैन और शैवों ने भी दोहे रचे। सरलतम मात्रात्मक द्विपदी छन्द दोहा अपने विषय वैविध्य, विस्तृत भावभूमि, लयात्मकता, और कथ्य पर अचूक शर-संधान के कारण बेहद लोकप्रिय रहा। कबीर के परवर्ती काल में दोहे में सामन्ती तत्त्वों ने प्रवेश किया। मध्यकाल में इसे नीति और उपदेश के अनुरूप पाया गया। सूफ़ी-फ़क़ीर भी इसके मोह से बच न सके। सूर, तुलसी, रहीम, रसखान, जायसी, मीरा, बिहारी ने भी इसे पूर्ण अर्थवत्ता के साथ ग्रहण किया।

इसी क्रम में समकालीन दोहों के चरित्र की चर्चा करें तो समीक्ष्य कृति "कब टूटेंगी चुप्पियाँ" के प्रणेता डाॅ. शैलेष गुप्त 'वीर' ने युगधर्म का आह्वान स्वीकारा है। वे समय की प्रतिगामिता पर बारीक नज़र रखते हैं। मजाल है कोई विसंगति उनकी पैनी दृष्टि से छूट जाये। उनके दोहों में तीन पार्श्व तीव्रता से शब्दायित हुए हैं। पहला है अराजक व्यवस्था, दूसरा है किसान और सर्वहारा, तीसरा तकनीकी क्रान्ति से समाज में होनेवाले अयाचित बदलाव। मूल्यहीन राजनीति को लेकर उन्होंने कतिपय दोहों को आवाज़ दी। नारी अस्मिता, वृद्धाश्रम, गुमराह युवा पीढ़ी, मसख़रे मंच, पर्यावरण ध्वंस, रिश्तों का विघटन भी उनकी परिधि में समाया है।

चित्रात्मक बिम्ब विधान वीर जी की विशेषता है। शब्दों की मितव्ययिता, मार्मिकता, अलंकारिकता और सबसे महत्वपूर्ण गुण है स्पष्टता।उनकी हंस मेधा प्रतीक प्रतिमानों के चयन में पूर्णतः सक्षम है। दोहे पढ़ते ही विद्युत गति से बिम्ब उभरते हैं।साहित्यिक अपसंस्कृति को वे कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं-
"पढ़कर उसने चुटकुले, दे दी सबको मात।
फूट-फूट रोती रही, कविता सारी रात।।"

कृषि प्रधान राष्ट्र में कृषक आत्महत्या ऐसी शोकांतिका है, जो अनुदिन बढ़ती ही जा रही है। यह हृदयद्रावक दृश्य अगतिकता का चरम उपस्थित करता है-
"फंदे पर हलधर मिला, उड़े न्याय के होश।
बादल पाला बिजलियाँ, हुए सभी ख़ामोश।।"

"न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्", जो मानवता के हक़ में नहीं; वह वाद, विचार, विधि, या दृश्य उन्हें मंज़ूर नहीं।सूक्ष्मतम विद्रूप भी उन्हें आवेशित करता है। एक गहन भावदशा द्रष्टव्य है-
"सत्ता गांधारी हुई, अंधा सारा तंत्र।
दोनों मिलकर पढ़ रहे, बेकारी के मंत्र।।"

सहज सम्प्रेषण उनके दोहों का अलंकार है। उनकी तीव्रता का अनुभव करवाने के लिए उन्होंने, मीन, चील, बकरी, शेर, भेड़, भेड़िए, गैंडे, हिरनी, लोमड़, हंस, ऊँट, चिम्पैंजी, सीहार्स, गिरगिट, बाज, चूहे, बिल्ली जैसे कितने ही प्राणियों का प्रतीक बतौर इस्तेमाल किया है। शेर मदान्ध सत्ता का प्रतीक है और बकरी यानी आम आदमी।

चुनाव तंत्र में तब्दील होते लोक तंत्र और चाटुकार मीडिया की कुछ ऐसी छवि अंकित की है उन्होंने-
"लोकतंत्र को भेड़िये, देते गहरी चोट।
डरी हुई हैं बकरियाँ, डाल रही हैं वोट।।"

"डरे हुए हैं लोग क्यों, क्यों छाया है मौन।
डरा हुआ है मीडिया, प्रश्न करेगा कौन।।"

जाति धर्म के नाम पर विभाजनकारी ताक़तें उदग्र हैं।वीडियो गेम में मसरूफ़ बचपन, पाखण्डी बाबा, खाप पंचायतें, एसिड अटैक, महँगाई, बेरोज़गारी जैसे मुद्दे भाँय-भाँय कर रहे हैं और अन्तरिक्ष में छलाँग लगाती वैज्ञानिक उपलब्धियों का ढोल पीटा जा रहा है। अवसरवाद ने चुप्पियों को शह दी है। कृति का शीर्षक दोहा इसकी बानगी पेश करता है।
"जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।"

भारत युवाओं का देश है, पर क्या उनकी प्रचण्ड ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग हो रहा है?
ऐसे कितने ही प्रश्न अनुत्तरित रहने को अभिशप्त हैं-
"दारू सट्टा छोकरी, गुटका और सिग्रेट।
मोबाइल पर व्यस्त है, यंग इंडिया ग्रेट।।"

एक अपेक्षित एवं अनुकरणीय विशेषता उनके सृजन में पायी जाती है वह है "तकनीकी नवाचार" को स्थान देना। इनमें समकालीनता की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है-
"नज़र पड़ी इनबाॅक्स पर, ख़ुशी मिली बेमाप।
एक इमोजी हार्ट का, आया है चुपचाप।।"

पंगु प्रशासन हो गया, मानवता भी फ्यूज़।
चैनलवालों को मिली, फिर से ब्रेकिंग न्यूज़।।"

"फागुन में आये नहीं, नहीं करूँगी बात।
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"

बेशक उनके दोहों का आचरण शास्त्रीय है पर तेवर कबीराना।सोने में सुहागा ही कहेंगे इसे।प्रतीक, प्रतिमान भाषा, उपजीव्य सब ताज़ा सदी के। चूँकि वीर जी सम्पादक, कवि, लेखक तो हैं ही; बहुभाषाविद् भी हैं। दोहों में उनका भाषायी संस्कार प्रभावित करता है। बेख़ौफ़ होना किसी भी सच्चे साहित्यकार की एकमात्र कसौटी है, जिस पर वे चौबीस कैरेट स्वर्ण जैसे सिद्ध हुए हैं।

निर्दोष मुद्रण एवं विचारों को आन्दोलित करते हुए आकर्षक मुखपृष्ठ के लिए श्वेतवर्णा प्रकाशन श्रेयार्थी है। दोहा विधा की समृद्धि में डाॅ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी का योगदान चिरकाल तक स्मरण किया जायेगा। हाथ कंगन को आरसी क्या। "कब टूटेंगी चुप्पियाँ" पढ़िए, चुप्पी न टूटे तो कहिएगा। 
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
इन्दिरा किसलय
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