ज्ञान बाँटने जो बैठे थे, बाँट रहे पाखंड।
महिमामंडन अंधकार का, मिलना तय है दंड।
कामी कपटी ढोंगी लोभी, ख़ुद को कहें महंत।
जातिवाद का ज़हर घोलते, झूठे हैं ये संत।।
कुछ तो कहते ख़ुद को ईश्वर, कोई भूत भगाये।
कुछ सत्ता के गलियारों में, बैठे धुनी रमाये।
बीज विषमता के कुछ बोते, करते हेराफेरी।
कुछ विनाश की काली छाया, फूँक रहे रणभेरी।।
कोई यहाँ कबीर नहीं है, और नहीं है दादू।
कोई कथा झूठ की बाँचे, करता कोई जादू।
कुछ शासन के एजेंडे की, खिला रहे हैं गोली।
घूम रहे कुछ राज भवन में, कुछ की बिगड़ी बोली।।
झूठी टीका करें शास्त्र की, नहीं जानते मर्म।
ख़ुद को कहते हैं संन्यासी, करते सदा कुकर्म।
करें अधर्मी रोज़ धर्म को, सरेआम बदनाम।
नोटों की गड्डी से जिनके, भरे पड़े गोदाम।।
इधर-उधर की बातें करते, तर्क गढ़ें मनमानी।
छुआछूत को प्रश्रय देते, कहते ख़ुद को ज्ञानी।
उजले वस्त्र पहनकर बैठे, लेकिन मन है काला।
समरसता के शत्रु घूमते, लेकर कंठी माला।।
भेदभाव का पाठ पढ़ाते, चौड़ी करते खाई।
ख़ुद को कहते पर्वत लेकिन, बाकी सबको राई।
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है, सबमें वही समाया।
एक रक्त है हर प्राणी का, एक सभी की काया।।
● डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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Wednesday, 17 June 2026
कौन श्रेष्ठ है कौन नीच है/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविता (सरसी और सार छन्द)
Thursday, 14 May 2026
'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : अनकहे प्रश्नों को शब्द देता दोहा-संग्रह/समीक्षक- गरिमा सक्सेना
Tuesday, 21 April 2026
दोहों में ढला युगबोध: 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' का समीक्षात्मक पाठ/समीक्षक- डॉ. नीलू अग्रवाल
इन दिनों समकालीन दोहों की एक पुस्तक प्राप्त हुई। नाम है "कब टूटेंगी चुप्पियाँ।" समकालीन दोहा के सुधी साधक डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का यह संग्रह इतना सुगठित और मारक लगा कि हर दोहे पर पाठक की 'वाह' निकलना लाज़मी है। दोहा विधा की विशेषता है कि यह अपने सूक्ष्म रूप में भी पूर्ण होती है और शैलेष जी ने अपने साहित्य सृजन में इसका प्रयोग करके जीवन के हर पहलू को बड़ी ही साफ़गोई के साथ उजागर किया है।
यों तो दोहा बहुत पुरानी विधा है। साहित्य के प्रत्येक कालखंड में कवियों ने इसका प्रयोग किया है। कबीर, रहीम, बिहारी जैसे कई महान कवि हुए जो अपने दोहों के कारण जनमानस की ज़ुबान पर आज भी बैठे हैं। शैलेष जी के दोहों में भी वही गहराई है, वही बुनाई है, वही लय है, वही लगन है, वही प्रासंगिकता है। पुस्तक में जो दोहे संग्रहीत किये गये हैं, उन्हें समकालीन समय का आईना कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' जी ने आधुनिक समय की बुराइयों पर बहुत बारीकी से क़लम चलाई है। आज के अर्थतंत्र में हर कुछ बिकाऊ है, पैसों की महिमा इतनी है कि इसके आगे हर जन नतमस्तक नज़र आता है। एक बानगी देखिए -
"बदले में ईमान के, उसको मिला इनाम।
ख़ुद्दारी को बेचकर, कमा रहा है दाम।।"
एक समय ईमानदारी मनुष्य का गहना था और 'ईश्वर के यहाँ जवाब देना है’ वाला डर था। अब वह डर जाता रहा है। उसूल जो कभी आत्मा से उपजते थे, अब मशीन की तरह निष्प्राण हो गये हैं। देखिए-
"नैतिकता बौनी हुई, यांत्रिक हुए उसूल।
आज द्वारकाधीश को, गया सुदामा भूल।।"
अपना अंतस जब कमज़ोर हो जाता है तो व्यक्ति बाहरी दौड़ में ख़ुद को उलझाता है। आज पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण इसी दौड़ का परिणाम है और इसका कुपरिणाम यह हुआ कि आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगी। दोहे के रूप में इसे देख सकते हैं-
"इसको तुम उन्नति कहो, मैं बोलूँ अवसान।
बाबा पोते पी रहे, बैठे एक मचान।।"
गाँव से कवि को अतिरिक्त प्रेम है। शहरीकरण का दुष्परिणाम भी कवि को सालता है। गाँव में वृद्ध माता-पिता अकेले हैं-
"संतानों से मिल सकें, तरस रहे माँ-बाप।
व्यस्त दौर ने कर दिया, जीवन को अभिशाप।।"
शहरीकरण ने गाँव के पर्यावरण को जो क्षति पहुँचाई है, वह कवि को लिखने पर मज़बूर करता है-
"ज़हर हवाओं में घुला, पनपे लाखों रोग।
पेड़ काटते जा रहे, नयी सदी के लोग।।"
छोटे आकार में बड़ा विमर्श — यही दोहे की ताक़त है, और शैलेष जी ने इसे बख़ूबी साधा है-
"जब से देखा मॉल को, दद्दू हैं बेहाल।
पोते को बतला रहे, कभी यहाँ था ताल।।"
दिलचस्प यह है कि समाज में फैली इन विद्रूपताओं को सँभालने वाले ख़ुद ही पाखंड का चोला ओढ़कर बैठे हैं। 'अंधेर नगरी, चौपट राजा'। धर्म के ठेकेदार, सरकार, न्यायालय, पत्रकारिता सभी तरफ़ से व्यक्ति आज निराशा ही महसूस करता है। दोहा विधा के कुशल शिल्पी डॉ. शैलेष हतप्रभ होकर लिखते हैं-
"देश निकाला सत्य को, मिला झूठ को मंच।
पाकर गद्दी न्याय की, करता गिद्ध प्रपंच।"
कहते हैं वह समाज मृतप्राय है, जहाँ क्रांति नहीं होती। तभी तो शैलेष जी लिखते हैं-
"बुझी क्रांति की लालिमा, सच हारा पुरज़ोर।
जिनके हाथ मशाल थी, वे ही निकले चोर।।"
पत्रकारिता की वस्तुस्थिति को समर्पित उनका यह दोहा भी पुरस्कारों की चयन प्रणाली की कलई खोलता है-
"शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग।
राजा के गुणगान का, लगा क़लम को रोग।।"
दोहा, पहले भक्ति और श्रृंगार के लिए लिखा जाता था, परन्तु इस लोकतंत्र में लोक की पीड़ा उजागर करना समय की माँग है और गुप्त जी के दोहे इसमें सफल भी हुए हैं। अन्नदाताओं की पीड़ा कवि-हृदय अनदेखा नहीं कर पाता। तभी तो वे लिखते हैं -
"वादे सारे तोड़कर, भरतीं अपनी जेब।
भूमिपुत्र से कुर्सियाँ, करतीं सदा फ़रेब।।"
किसान यह सोचकर अपने खेत बेचकर बच्चों को पढ़ाता है कि खेती में अब कुछ नहीं धरा, पर फिर यहाँ भी हारा महसूस करता है; जब उसके बच्चों को रोज़गार नहीं मिलता और समाज का एक और विकृत चेहरा सामने आता है-
"बात चली जब धर्म की, बहा बहुत आक्रोश।
रोज़गार के नाम पर, ग़ायब सारा जोश।।"
कम शब्दों में ज़्यादा बातें वही कह सकता है जो समाज और परिवेश के प्रति जागरूक हो।
शैलेष जी अगर समस्याओं पर उँगली रखते हैं तो समाधान भी सुझाते चलते हैं। जैसे -
"अम्बर में ऊँचे उड़ूँ, तो भी रहूँ कबीर।
पैरों तले ज़मीन हो, ज़िन्दा रहे ज़मीर।।"
या फिर यह देख सकते हैं कि-
"श्रम की तीखी गोलियाँ, कहतीं सीना तान।
खाया जिसने बेहिचक, चढ़ा सदा सोपान।।
ऐसा कोई विषय नहीं जो शैलेष जी के दोहों से अछूता हो। कवि की भाषा, भाव, बिम्ब आदि भी समय के साथ-साथ चलते हैं। समसामयिक हैं। कथ्य के साथ शिल्प भी अव्वल दर्ज़े का है। शब्दों का चयन ध्यान खींचता है। बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करते हुए पाठकों को ज्यादा समीप लाते हैं। ज़रूरत के हिसाब से गम्भीर से सरल शब्दों का प्रयोग इनके दोहों में मिलता है। वे आम आदमी की विवशता और आधुनिक उपभोक्तावाद के द्वन्द्व पर तीखा व्यंग्य करते हैं। बुनियादी ज़रूरत रोटी है, पर मीडिया-विज्ञापन ने इच्छा को भटका दिया है-
"फत्तू मन में सोचता, बदलेगी तस्वीर।
रोटी तो मिलती नहीं, सपने चिलीपनीर।।"
एक प्रयोग जो ज़ुबान पर अनायास मुस्कुराहट ला देता है-
"फागुन में आये नहीं, नहीं करुँगी बात।
अवनी चैटिंग कर रही, अम्बर से दिन-रात।।"
तो धरती की आसमान से चैटिंग करने की कल्पना ही अपने आप में नयी-सी जान पड़ती है। चिलीपनीर, चैटिंग, फिल्टर जैसे शब्दों का प्रयोग दोहे जैसी पुरातन विधा में नवीनता तो लाता ही है, साथ ही नये अर्थ भी जोड़ता है।
अपने समय के यथार्थ को बेबाकी से गढ़ता डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का दोहा-संग्रह 'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' अपने शीर्षक को पूरी तरह सार्थक करता है। यह संग्रह परत-दर-परत समाज की पोल खोलता चलता है और उन मौन सहमतियों पर चोट करता है जिनके पीछे विसंगतियाँ पलती हैं। भाषा की सहजता और व्यंग्य की धार से कवि ने समकालीन विद्रूपताओं, नैतिक गिरावट और आम आदमी की पीड़ा को मुखर स्वर दिया है। एक सजग साहित्यकार के रूप में डॉ. 'वीर' की यह प्रस्तुति सचमुच अनुपम है। उनके इस महत्त्वपूर्ण दोहा-संग्रह के लिए मैं उन्हें हार्दिक एवं अनन्त बधाइयाँ प्रेषित करती हूँ।
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कृति: कब टूटेंगी चुप्पियाँ (दोहा-संग्रह)
दोहाकार: डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
ISBN: 978-81-984164-8-3
मूल्य: ₹ 299
पृष्ठ: 104 (हार्ड बाउंड)
संस्करण: प्रथम (2025)
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■ समीक्षक सम्पर्क-
डॉ. नीलू अग्रवाल
ब्लॉक बी, 501, हैप्पी होम रेजिडेंसी, जागृति नगर, मजिस्ट्रेट कॉलोनी रोड, पटना (बिहार)
पिन कोड- 800014
मोबाइल- 9431081094
Wednesday, 25 February 2026
मेरी प्यारी बिटिया रानी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
दीवारों पर चित्र बनाये,
मुझको अपना मित्र बताये।
बातें करती बनकर नानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।
तुतली बोली मन को भाती,
गोदी में आ प्यार जताती।
फ्रॉक पहनती अक्सर धानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।
जाती रहती सर्कस-मेला,
ख़ूब मज़े से खाती केला।
मुझसे सुनती रोज़ कहानी,
मेरी प्यारी बिटिया रानी।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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घर-आँगन महकाती बिटिया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता
फाइटर प्लेन उड़ाऊँगी/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की बाल कविता
Sunday, 15 February 2026
मालपुआ खाकर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की क्षणिकाएँ
Tuesday, 20 January 2026
मही मिली यों व्योम से/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे
धूप गुनगुनी कर रही, यादों से संयुक्त।
मन सरसों के बाग़ में, घूम रहा उन्मुक्त।।
ऋतुपति के सान्निध्य में, नयन करें संवाद।
आहट अन्तर में हुई, एक सदी के बाद।।
दृष्टि पड़ी ऋतुराज की, उर ने गाये गीत।
पृष्ठ-पृष्ठ अनुभूति का, हुआ गुलाबी मीत।।
मही मिली यों व्योम से, मुस्काये रतिराज।
उर में गहरी प्रीति के, उड़ने लगे जहाज।।
कहे प्रिया से 'वीर' कब, अपने मन की बात।
जादू किया वसंत ने, प्रति पल हुआ प्रभात।।
कुसुमाकर कौतुक करे, चले अनोखी चाल।
छुआ नहीं हमने उन्हें, हुए गुलाबी गाल।।
पीतवसन धरती हुई, धवल हुआ आकाश।
पिकानन्द की छाँव में, थिरक रहे भुजपाश।।
जीवन रहते कब हुआ, इच्छाओं का अंत।
उमड़े बादल नेह के, छाया हृदय वसंत।।
धूप सुहानी पूछती, बीते कल की बात।
छेड़ रहा मधुमास फिर, देकर नया प्रभात।।
परिवर्तन की चाह में, आया है मधुमास।
धरती से आकाश तक, छाया है उल्लास।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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Monday, 29 December 2025
जैसे फिरकी नाचती/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे
जिप्सी कर्फ़्यू सायरन, आज़ादी का जश्न।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्न।।
बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।
बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।
तब पासे का खेल था, अब गोली-बन्दूक।
मदद माँगती द्रौपदी, सभा आज भी मूक।।
देह बिकाऊ ब्राण्ड है, देह गणित का जोड़।
विज्ञापन के दौर में, मची हुई है होड़।।
कोस रहे हैं देश को, बात-बात पर क्रुद्ध।
'आज़ादी' के नाम पर, बैठे हुए 'प्रबुद्ध'।।
कल तक बैठे साथ जो, आज हुए उस ओर।
कितनी मैली हो गयी, राजनीति की डोर।।
किये बहाना ठण्ड का, साहब पड़े अचेत।
फत्तू फटी कमीज़ में, जोत रहा है खेत।।
वोटतंत्र ने जड़ दिया, लोकतंत्र पर कील।
हंसों का हक़ ले उड़े, बाज़ गिद्ध औ' चील।।
सुधरेंगे हालात कब, पूरे होंगे स्वप्न।
कुर्सी का मुख बन्द था, जब-जब पूछा प्रश्न।।
छीना मुख का कौर फिर, जंगल और ज़मीन।
अब कुर्सी बतला रही, हलधर बेबस दीन।।
ज़ालिम उनके हाथ से, रहे निवाला छीन।
जिनके बल पर हो गये, सत्ता पर आसीन।।
देखे महलों की तरफ़, आते हुए किसान।
कील ठोंककर छिप गये, सभी सियासतदान।।
मगन रहे हम जश्न में, सिर पर चद्दर तान।
दुविधा में जीते मिले, पल-पल यहाँ किसान।।
फन्दे में फिर चढ़ गया, बेबस एक किसान।।
सूदख़ोर ने जब धरे, गिरवी खेत-मकान।।
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, कहीं तुषारापात।
मौसम भी अक्सर करे, हलधर के सँग घात।।
काश गेह के वास्ते, ला सकता परचून।
हरिया खाकर सो गया, फिर से रोटी-नून।।
हल से हलधर ने लिखे, जीवन के उत्कर्ष।
संकल्पों के सामने, बौने सब संघर्ष।।
बेमौसम बारिश हुई, फ़सल हुई बेकार।
टूट सगाई फिर गयी, बिटिया की इस बार।।
पीतवसन में देखकर, दुनिया समझे भक्त।
अत्याचारी पी रहा, निर्दोषों का रक्त।।
जिया अभावों में सदा, रहा उगाता अन्न।
लाश झूलती देखकर, हुए पड़ोसी सन्न।।
हलधर क़ीमत वोट की, शायद पायें जान।
पाँच बरस पूरे हुए, बँटा नहीं अनुदान।।
जैसे कोई भीख हो, देते यों अनुदान।
सत्ता करती मसख़री, हम रहते अंजान।।
वोटतंत्र ने फिर किये, वादे एक हज़ार।
कृषक ठगे-से रह गये, बनी नयी सरकार।।
उधर सड़क पर लाठियाँ, इधर प्रीत के बोल।
समाधान के नाम पर, केवल टाल-मटोल।।
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
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Sunday, 21 December 2025
भीत में चुना गया/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के हाइकु
आपाधापी में
बार-बार बचा 'मैं'
खोये 'अपने'।
□
ज्यों का त्यों 'राँझा'
बदल गयी 'हीर'
पीर ही पीर।
□
बालू में ढेर
नहा कर निकले
कागजी शेर।
□
मासूम चूहे
बिल्ली पर झपटे
जान के लाले।
□
वक़्त ने कूटा
टक्कर पहाड़ से
पसीना छूटा।
□
कौन अपना?
भीत में चुना गया
हर सपना।
□
मिली है सीख
पर हो गया जब
लाख से लीख।
□
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
सम्पर्क: 18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उ. प्र.)
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Sunday, 23 November 2025
बुद्धू/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की लघुकथा
"पुस्तक मेले में तुम आज जा रहे हो न।"
"हाँ! उर्वशी।"
"गिरीश! मैं नहीं आ पाऊँगी, पर अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहूँगी वहाँ।"
"वह कैसे?"
"अपना दिल लेकर नहीं जा रहे क्या?"
"नहीं। वह तो तुम्हारे पास है।"
"पर मेरा तो तुम्हारे पास है न, तो मैं तो वहीं रहूँगी।"
कुछ देर तक खिलखिलाहट दोनों ओर अपना डेरा जमाये बैठी रही। फिर उर्वशी बुदबुदायी, "बुद्धू! अब तुम्हें तैयार नहीं होना क्या? फोन रक्खो और जाओ।"
□
© डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
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Wednesday, 29 October 2025
'कब टूटेंगी चुप्पियाँ' : दोहों में बोलता यथार्थ/समीक्षक- हरकीरत हीर
Tuesday, 28 October 2025
डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' : संक्षिप्त परिचय
■ नाम:- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
■ जन्म:- 18 जनवरी, 1981
ग्राम- जमेनी, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
■ माता/पिता:-
श्रीमती रामा गुप्ता/श्री राम रतन गुप्त
■ शिक्षा:-
परास्नातक (प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विज्ञान), पी-एच.डी. (पुरातत्व विज्ञान), यूजीसी-नेट, एम.जे.एम.सी., बी.एड., डिप्लोमा इन रसियन लैंग्वेज़, डिप्लोमा इन उर्दू लैंग्वेज़, ओरियन्टेशन कोर्स इन म्यूज़ियोलॉजी एण्ड कन्ज़र्वेशन।
■ प्रकाशन/सम्पादन :-
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, बिन्दु में सिन्धु, उन पलों में, शब्द-शब्द क्षणबोध, आर-पार, कई फूल - कई रंग, बार्ड्स ऑफ इलूमिनेश्न्स, कविता दस्तावेज़ है, डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य, रघुविन्द्र यादव के दोहा-सृजन के विविध आयाम, फतेहपुर जनपद के हाइकुकार, व्यंग्य-क्षणिका काव्य के पुरोधा डॉ. परमेश्वर गोयल उर्फ़ काका बिहारी, डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के सौ शेर, समकालीन क्षणिकाकार, नयी सदी के दोहे, समकालीन दोहा, प्रतिरोध के दोहे, सोनचिरैया मौन है, क्षणिका काव्य के हस्ताक्षर, इस दुनिया में तीसरी दुनिया, दि अण्डरलाइन क्षणिका विशेषांक, दि अण्डरलाइन पर्यावरणीय दोहा विशेषांक, समकालीन सांस्कृतिक प्रस्ताव दोहा विशेषांक, अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक, अन्वेषी के कई वार्षिकांक तथा कुछ अन्य।
■ अनुवाद:-
अब तक तीस से अधिक भाषाओं में आपकी कविताओं का अनुवाद हो चुका है। अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं यथा ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, चाइनीज, रसियन, स्पेनिश, अज़रबैजानी, हिब्रू, पुर्तगीज, इटैलियन, अल्बानियन, तुर्किश, अरेबिक, पर्शियन, सर्बियन, क्रोशियन, नेपाली, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी, असमिया तथा राजस्थानी आदि में कविताओं का निरन्तर अनुवाद।
■ प्रसारण:-
रेडियो 103 एफएम, इज़राइल और द डियर जाॅन शो, वारिंगटन, इंग्लैंड में कविता का प्रसारण और स्टोरीफेस्ट 2023, मैक्सिको, ग्रीस, रसिया में लघुकथा का प्रसारण।
■ सृजन-विधा:-
* हिन्दी में- गीत, ग़ज़ल, कविता, दोहा, क्षणिका, हाइकु, ताँका, सरसी, सार, लघुकथा तथा समीक्षा आदि।
* अंग्रेज़ी में- हाइकु, ताँका, फ्रीवर्स, क्वेश्चनकु, मिरर पोयम, माइक्रोपोयम्स, जनाकु, शार्ट स्टोरी आदि।
■ कुछ अन्य विशेष तथ्य:-
* विभिन्न पत्रिकाओं यथा अन्वेषी, गुफ़्तगू, अनुनाद, अरण्य वाणी, तख़्तोताज, मौसम, शब्द-गंगा आदि के लिए पूर्व/वर्तमान में सम्पादन, सहसम्पादन एवं कार्यकारी सम्पादन।
* स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की पत्रिका 'जन स्वास्थ्य धारणा' के परामर्श मंडल में शामिल।
* हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा उर्दू की देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं, वेबपत्रिकाओं आदि में और विविध संकलनों में पद्य एवं गद्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
* हिन्दी और अंग्रेज़ी की दो सौ से अधिक पुस्तकों के लिए भूमिका/विमर्श/समीक्षा/आलोचना आदि प्रकाशित।
* चर्चित लघुकथा 'छंगू भाई' पर इसी नाम से एफ. बी. इन्टरनेशनल मूवीज द्वारा लघु फ़िल्म का निर्माण।
* जून-2024 में कविता 'बीकम फायरफ्लाई' को इज़राइल की दि एयरफोर्स गैलरी में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी 'बटरफ्लाइज ऑफ पीस' में विश्व के इक्कीस समकालीन प्रतिष्ठित एवं प्रतिभावान कवियों की कविताओं के साथ प्रस्तुत किया गया।
* विभिन्न सामयिक साहित्यिक मुद्दों पर देश के अनेक शीर्ष साहित्यकारों/विद्वानों के साथ परिचर्चाएँ/चौपालों का संयोजन/प्रकाशन भी आप के माध्यम से किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त आपने साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न नामचीन हस्तियों के साक्षात्कार भी किये हैं, जिनमें गोपालदास 'नीरज', बेकल उत्साही, शम्सुर्ररहमान फारुकी, संजय मासूम, अनवर जलालपुरी, माहेश्वर तिवारी, डॉ. मिथिलेश दीक्षित, ज़फ़र इक़बाल 'ज़फ़र', रघुविन्द्र यादव तथा दिनेश शुक्ल आदि के साक्षात्कार प्रमुख हैं।
* सृजन, सम्पादन, समीक्षा, ब्लॉगिंग तथा साक्षात्कार लेखन के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता, इतिहास तथा पुरातत्व विषयक विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों, संगोष्ठियों, शोध-संगोष्ठियों, सम्मेलनों तथा कार्यशालाओं में सहभागिता और प्रस्तुतीकरण।
* एक अनुवादक के रूप में अंग्रेज़ी के कुछ कवियों की कविताओं का हिन्दी में अनुवाद।
* विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से हिन्दी एवं अंग्रेज़ी माइक्रोपोएट्री पर विशेष कार्य।
* अनेक साहित्यिक संस्थाओं/ पत्रिकाओं आदि में सम्मानित उत्तरदायी पदों पर आसीन।
■ सम्मान/पुरस्कार:-
बेकल उत्साही सम्मान 2017, साहिर लुधियानवी सम्मान 2021, प्रदेश गौरव सम्मान 2023, टीवी प्रोग्राम यू एण्ड लिटरेचर टूडे, नाइजीरिया द्वारा लिटरेरी आइकॉन 2018, अवधी सांस्कृतिक प्रतिष्ठान, नेपाल द्वारा अवधी गौरव सम्मान 2025, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत सम्मान 2019, आईएफसीएच, किंगडम ऑफ मोरक्को, द्वारा 'एम्बेसेडर ऑफ़ पीस एण्ड ह्यूमैनिटी' 2024, अकबर इलाहाबादी स्मृति सम्मान 2021, साहित्य श्री सम्मान 2022, द डेली ग्लोबल नेशन समाचार पत्र, बांग्लादेश द्वारा 'पीस एम्बेसेडर' 2024, कलारत्न एवार्ड 2012, सारस्वत सम्मान 2018, बाल मित्र साहित्यकार अवार्ड 2019 तथा सृजनशीलता सम्मान 2017 सहित कुछ अन्य सम्मान।
■ सम्प्रति:-
उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन शिक्षण-कार्य और क्षणिकाकार, माइक्रोपोएट्री कॉस्मॉस तथा द फतेहपुर रिजोल्यूशन का अव्यावसायिक सम्पादन।
■ सम्पर्क:-
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ब्लॉग- http://aadmikeaarpaar.blogspot.com और https://poetryshailesh.blogspot.com
Sunday, 12 October 2025
सुबह की तस्वीर/डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
मेरे ह्वाट्सएप इनबाॅक्स पर
सुबह की एक
प्यारी-सी तस्वीर
चली आयी
खिलखिलाते हुए,
उसका जादुई चेहरा
और उसकी आँखों में बसा मैं
प्रभात को दे रहे थे
एक नया आकार,
उसने फिर लिखे
कुछ गुलाबी शब्द
और बढ़ गयीं
दिल की धड़कनें,
वह निहार रही थी
बस मुझे और मुझे,
मैं जानता हूँ कि उसका यों निहारना
मही में भर देगा
ग़ज़ब का आत्मविश्वास
आकाश को कर देगा सतरंगी...
लो! शुरू हो गयी
बादलों की
आवाजाही,
यह सुबह की तस्वीर भी न!
- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
18/17, राधा नगर, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
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